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सामरिक सुरक्षा का कवच

पूर्वोत्तर में ढांचागत सुविधाओं का अभाव भारतीय सेना के लिए बड़ी चुनौती रहा है और चीन से इसका फायदा उठा कर भारत पर लगातार दबाव बनाया है। भारत-चीन सीमा की सुरक्षा में तैनात भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस ने इस साल गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें चीनी घुसपैठ के चौकाने वाले आंकड़े सामने आए थे। भारत और चीन के बीच 1962 का युद्ध सीमा विवाद पर ही हुआ था।

Author December 29, 2018 3:55 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

ब्रह्मदीप अलूने

राष्ट्रीय सुरक्षा की सुदृढ़ता और संतुलित सुरक्षा नीति निर्धारण में भौगोलिक कारकों की निर्णायक भूमिका होती है। भौगोलिक कारक न केवल राष्ट्र के चहुंमुखी विकास में सहायक होते हैं, बल्कि प्रतिरोधक क्षमता का सृजन भी करते हैं। भारत की सामरिक स्थिति भौगोलिक दृष्टि से बेहद खतरनाक है और इसका प्रभाव देश की आंतरिक सुरक्षा को भी प्रभावित करता रहा है। इसमें सबसे ज्यादा प्रतिकूलताएं भारत के पूर्वोत्तर में हैं और इसके नतीजे भारत के लिए अत्यंत घातक रहे हैं। चीन से सीमा विवाद के चलते और पूर्वोत्तर की सुरक्षा चुनौतियों से जूझते भारत ने अब अपनी सामरिक स्थिति को मजबूत किया है और रणनीतिक परियोजना के जरिए ब्रह्मपुत्र नदी पर बोगीबिल पुल का निर्माण पूर्ण कर लिया है। यह पुल ब्रह्मपुत्र नदी के दक्षिण तट को अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती धेमाजी जिले में सिलापथार के साथ जोड़ेता है। सुरक्षा के लिहाज से यह अति महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि भारतीय सेना इस पुल के जरिए कम समय में अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती हिस्सों में पहुंच सकेगी। असम के डिब्रूगढ़ शहर के पास बोगीबिल में ब्रह्मपुत्र नदी पर बने इस पुल की लंबाई तकरीबन पांच किलोमीटर है। पुल के नीचे की तरफ दो रेल लाइनें भी बिछाई गई हैं और उसके ऊपर तीन लेन की सड़क बनाई गई है, जिस पर से टैंक भी आसानी से गुजर सकेंगे। जाहिर है, यह पुल न केवल पूर्वोत्तर के विकास में मददगार होगा, बल्कि सैन्य शक्ति के पर्याप्त उपयोग को भी सुनिश्चित करने में सहायक होगा।

गौरतलब है कि तिब्बत से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में बहती है और अपनी व्यापकता से उन्हें अलग-थलग भी करती है। पूर्वोत्तर के राज्यों को जोड़ने वाले ऐसे मार्ग की आवश्यकता 1962 में भारत-चीन युद्ध के समय महसूस की गई थी जब भौगोलिक अनुकूलताओं का फायदा उठा कर चीन की सेना असम के तेजपुर तक आ गई थी और भारत के राज्यों के बीच ही पहुंच मार्ग न होने से भारतीय सेना समय रहते इसका प्रतिकार नहीं कर सकी थी। 1962 के चीन युद्ध की बेहद कड़वी यादें हैं और देश की सैन्य विफलता का कारण सीमाई क्षेत्रों में हमारी सेना का सही समय पर नहीं पहुंच पाना माना जाता है। आजादी के बाद कम समय में इस इलाके में सड़क और पुल की सुविधाओं का समुचित विकास नहीं हो पाया था, जिसे बाद में विभिन्न सरकारों ने प्राथमिकता से अंजाम दिया, और उसके परिणाम अब सामने आ रहे हैं।

पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच अब बोगीबिल पुल के बनने से सेना देश के किसी भी हिस्से से बहुत कम समय में चीन से लगती सीमा पर पहुंच जाएगी। सेना की लामबंदी और अग्रिम क्षेत्रों में रक्षा आपूर्ति का काम आसान हो जाएगा, क्योंकि बोगीबिल पुल पर बनी सड़क जब अरुणाचल प्रदेश की सड़कों से जुड़ जाएगी तो सेना सीमा की अंतिम छोर तक बहुत ही कम समय में पहुंचने में कामयाब हो सकेगी। पहले इसमें काफी वक्त लगता था। दरअसल, पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार असम के उत्तर में तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश है और भारत की असल सामरिक समस्या चीन से लगता हुआ यही इलाका माना जाता है। अरुणाचल के पश्चिम में भूटान, उत्तर में चीन, उत्तर-पूर्व में तिब्बत और पूर्व में म्यांमा है।

चीन के माओ की क्षेत्रीय सामरिक नीति पांच उंगलियों के सिद्धांत पर आधारित है। माओ के अनुसार चीन हाथ है तो तिब्बत हथेली। उस तिब्बत की पांच उंगलियां हैं, नेपाल, भूटान, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश। नेपाल और भारत की सुरक्षा एक दूसरे पर निर्भर है, भूटान की सुरक्षा को लेकर भारत अग्रगामी नीति पर रहा है और डोकलाम विवाद में भारत ने उसका पालन भी किया। लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश भारत के भाग हैं। चीन इस स्थिति को बदलने पर आमादा है। चीन की विदेश नीति में यथार्थवाद अत्यधिक प्रभावी रहा है। अंग्रेजी राज में 1914 में बनी मैक मोहन रेखा को खारिज कर चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना हिस्सा बताते हुए उसे दक्षिण तिब्बत का भाग बताता रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद बदलते राजनीतिक परिदृश्य में ब्रिटेन की दक्षिण एशिया से विदाई के बाद माओ ने इस इलाके को कब्जाने की साजिश को बेहद चुपके से अंजाम दिया था। माओ ने सबसे पहले 1949 में तिब्बत को अपना निशाना बनाया और फिर भारत-चीन सीमा पर अपनी स्थिति मजबूत करते हुए 1956-57 में कराकोरम राजमार्ग भी बना लिया था। जल्दी ही चीन ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा भी कर दी कि भारत और चीन सीमा का स्पष्ट विभाजन नहीं हुआ है।

चीन की भारत के साथ तकरीबन चार हजार किलोमीटर से भी लंबी सीमा रेखा है, लेकिन चीन ने अपनी सीमा को कभी रेखांकित नहीं किया है। इस समय चीन ने जम्मू-कश्मीर की अड़तीस हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर अवैध कब्जा कर रखा है साथ ही पाक अधिकृत कश्मीर का 5180 वर्ग किलोमीटर भूमि पाकिस्तान से अवैध रूप से प्राप्त कर रखा है। अरुणाचल प्रदेश को वह दक्षिण तिब्बत बताता है, वह अरुणाचल प्रदेश के नब्बे हजार वर्ग किलोमीटर पर अपना दावा करता है और भारत के अंग के रूप में अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं देता है। अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन ने अपनी विस्तारवादी आकांक्षाओं को तेज करते हुए अरुणाचल प्रदेश की छह जगहों के नाम बदल कर वोग्यैनलिंग, मिला री, काईनदेन गाब री, मेन क्यू का, बूमो ला और नामका पुब री रखा है। चीनी विशेषज्ञ इसे चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता को सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया बड़ा कदम बता चुके हैं।

पूर्वोत्तर में ढांचागत सुविधाओं का अभाव भारतीय सेना के लिए बड़ी चुनौती रहा है और चीन से इसका फायदा उठा कर भारत पर लगातार दबाव बनाया है। भारत-चीन सीमा की सुरक्षा में तैनात भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस ने इस साल गृह मंत्रालय को एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें चीनी घुसपैठ के चौकाने वाले आंकड़े सामने आए थे। भारत और चीन के बीच 1962 का युद्ध सीमा विवाद पर ही हुआ था। लेकिन इसके बाद चीनी नेता डेंग शियाऊ पिंग ने चीनी विदेश नीति में आर्थिक मुद्दों पर सर्वाधिक बल दिया था और उन्होंने कहा था कि सीमा विवाद जैसे मुद्दों को आने वाली पीढ़ी के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों के बीच अलगाव करने का प्रयत्न किया। इस नीति को बाद में भारत ने भी स्वीकार किया। इस बीच भारत ने यह महसूस किया कि राजनीतिक औचित्यों और आर्थिक अनिवार्यताओं के मध्य पूर्ण अलगाव चीन के अहंकार को बढ़ा रहा है और इससे भारत की सामरिक समस्या बढ़ रही है। चीन की रणनीति सीमा विवाद को निपटाने की नहीं, उसे जारी रखने की है ताकि इस बहाने वह भारत को बचाव की मुद्रा में और अस्थिर रखा जा सके।

चीनी हिमाकतों से निपटने के लिए इस समय भारत को लगातार सैन्य योजनाओं पर काम करने की जरूरत है। डोकलाम और ओबीआर पर भारत के सख्त तेवर चीन देख चुका है और अब पूर्वोत्तर में बोगीबिल पुल के निर्माण के बाद भारत की चीन सीमा पर स्थिति और मजबूत होगी। भारत को यह समझना होगा कि चीनी नीति में विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षा सदैव विद्यमान रही है, इसलिए सीमा विवाद को दरकिनार कर चीन से स्थिर संबंधों की अपेक्षा करना देश की संप्रभुता के लिए आत्मघाती है। फिलिपीन के पूर्व राष्ट्रपति बेनिग्रो एक्विनो ने एक बार कहा था यदि चीन आपको दबाता है और यदि आप झुके तो और अधिक दबाएगा। इसलिए चीन से ताकत से ही निपटा जा सकता है। इसलिए भारत का सामरिक रूप से अग्रगामी नीति पर चलना ही बेहतर होगा।

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