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प्रदूषित वायु और खतरे

भारत की आधी आबादी यानी छियासठ करोड़ लोग उन इलाकों में रहते हैं जहां सूक्ष्म कण पदार्थ (पार्टिकुलेट मैटर) प्रदूषण भारत के सुरक्षित मानकों कई गुना ज्यादा है। यह बेहद खतरनाक है। ऐसे में अगर भारत वायु प्रदूषण पर शीघ्र ही काबू नहीं कर पाता है तो 2025 तक अकेले राजधानी दिल्ली में ही वायु प्रदूषण से हर साल छब्बीस हजार से ज्यादा लोगों की मौत होगी।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Express Photo by Karma Sonam Bhutia)

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) का यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि जागरूकता का अभाव और कठोर मानकों की कमी के कारण भारत में हर आठवें व्यक्ति की मौत का कारण वायु प्रदूषण बन रहा है। अनुसंधान में पाया गया है कि वर्ष 2017 में ही करीब साढ़े बारह लाख भारतीयों की मौत वायु प्रदूषण से हुई, जिसमें साढ़े छह लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर प्रदूषित हवा के शिकार बने। अन्य करीब पांच लाख लोगों की मौत का कारण घरों के अंदर की हवा जहरीली बन जाने से हुई। यह खुलासा देश के 369 निगरानी केंद्रों और अस्पतालों से मिले आंकड़ों पर आधारित है, लिहाजा इसकी विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। अनुसंधान में पाया गया है कि वायु प्रदूषण से देश में औसत जीवनकाल डेढ़ से पौने दो साल घट गया है। अनुसंधान के मुताबिक अधिकतर मौतें प्रदूषण के कारण फेफड़ों में कैंसर, दिल के दौरे और पुरानी बीमारियों से हो रही हैं।

एक मोटे अनुमान के मुताबिक प्रति लाख आबादी की मृत्यु में वायु प्रदूषण की हिस्सेदारी 89.9 फीसद है। भारतीय आयुर्विज्ञान आइसीएमआर के वैज्ञानिकों की मानें तो वायु प्रदूषण का कहर का सबसे ज्यादा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार में है। यही वजह है कि वर्ष 2017 में वायु प्रदूषण से सबसे अधिक ढाई लाख से ज्यादा मौतें अकेले उत्तर प्रदेश में हुर्इं। इसी तरह महाराष्ट्र में एक लाख आठ हजार, बिहार में 96967 और दिल्ली में 12322 लोग वायु प्रदूषण की भेंट चढ़े। हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि प्रदूषित हवा की चपेट में भारत में वर्ष 2016 में लगभग एक लाख मासूम बच्चों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि दुनिया भर में घर के अंदर और घर के बाहर दोनों ही जगहों पर प्रदूषित हवा से पंद्रह साल से कम उम्र के लगभग छह लाख बच्चों की मौत हुई और इसमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की है। डब्ल्यूएचओ ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा था कि दक्षिण पूर्व एशिया क्षेत्र में वायु प्रदूषण की वजह से हर साल आठ लाख जानें जा रही हैं जिसमें पचहत्तर फीसद से ज्यादा मौतें भारत में हो रही है।

रिपोर्ट पर गौर करें तो भारत के कई शहरों में प्रदूषक तत्व डब्ल्यूएचओ के तय मापदंड दस माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक पाया गया। देश की राजधानी दिल्ली की ही बात करें तो यह सबसे अधिक प्रदूषित शहर है जिसका पीएम-10 का स्तर अधिक है। भारत में वायु प्रदूषण किस तरह जानलेवा साबित हो रहा है, यह कुछ साल पहले यूनिवर्सिटी आफ शिकागो, हार्वर्ड और येल के अथर्शास्त्रियों की उस रिपोर्ट से उद्घाटित हुआ जिसमें कहा गया कि भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शुमार है जहां सबसे अधिक वायु प्रदूषण है। खतरनाक स्तर पर पहुंच चुके प्रदूषण की वजह से यहां के लोगों को समय से तीन साल पहले काल का ग्रास बनना पड़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक अगर भारत अपने वायु मानकों को पूरा करने के लिए इस आंकड़े को उलट देता है यानी वायु प्रदूषण पर नियंत्रण कर लेता है तो इससे छियासठ करोड़ लोगों का जीवन औसत तीन साल और बढ़ जाएगा। इसमें यह भी कहा गया कि भारत की आधी आबादी यानी छियासठ करोड़ लोग उन इलाकों में रहते हैं जहां सूक्ष्म कण पदार्थ (पार्टिकुलेट मैटर) प्रदूषण भारत के सुरक्षित मानकों कई गुना ज्यादा है। यह बेहद खतरनाक है। ऐसे में अगर भारत वायु प्रदूषण पर शीघ्र ही काबू नहीं कर पाता है तो 2025 तक अकेले राजधानी दिल्ली में ही वायु प्रदूषण से हर साल छब्बीस हजार से ज्यादा लोगों की मौत होगी।

वायु प्रदूषण से सबसे अधिक मौत दक्षिण और पूर्व एशिया में होती हैं और इसमें भी भारत शीर्ष पर है। आंकड़े बताते हैं कि हर साल मानव निर्मित वायु प्रदूषण से चार लाख सत्तर हजार और औद्योगिक इकाइयों से उत्पन प्रदूषण से इक्कीस लाख लोग दम तोड़ते हैं। अगर जहर फैला रही इन औद्योगिक इकाइयों पर नियंत्रण लगे तो हालात सुधर सकते हैं। कुछ साल पहले ‘नेचर’ पत्रिका ने भी खुलासा किया था कि अगर शीघ्र ही वायु की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ तो वर्ष 2050 तक हर साल छियासठ लाख लोगों की जान जा सकती है। गौरतलब है कि यह रिपोर्ट जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट आफ केमिस्ट्री के प्रोफेसर जोहान लेलिवेल्ड और उनके शोध दल ने तैयार की थी। इसमें प्रदूषण फैलने के दो प्रमुख कारण गिनाए गए थे। एक पीएम 2.5-एस विषाक्त कण और दूसरा वाहनों से निकलने वाली गैस नाइट्रोजन आक्साइड। रिपोर्ट में आशंका जाहिर की गई कि भारत और चीन में वायु प्रदूषण की समस्या गंभीररूप ले सकती है, क्योंकि इन देशों में खाना पकाने के लिए कच्चे र्इंधन का इस्तेमाल होता है जो वायु प्रदूषण का बड़ा स्रोत है। विशेषज्ञों ने चेताया है कि अगर इससे निपटने की तत्काल वैश्विक रणनीति तैयार नहीं की गई तो दुनिया की आबादी का बड़ा हिस्सा वायु प्रदुषण की चपेट में होगा। अच्छी बात है कि डब्ल्यूएचओ ने वायु प्रदूषण से होने वाले स्वास्थ्य जोखिम के बारे में जागरूकता बढ़ाने की अपील की है। लेकिन विडंबना है कि इस पर अमल नहीं हो रहा है।

भारत की बात करें तो चार साल पहले ‘क्लीन एयर एक्शन प्लान’ के जरिए वायु प्रदूषण से निपटने का संकल्प किया गया था। लेकिन उस पर कोई काम नहीं हुआ। भारत के विभिन्न शहर वायु प्रदूषण की चपेट में हैं। खतरनाक बात यह कि शहरों के वायुमंडल में गैसों का अनुपात बिगड़ता जा रहा है और उसे लेकर किसी तरह की सतर्कता नहीं बरती जा रही। आंकड़ों पर गौर करें तो हाल के वर्षों में वायुमंडल में आॅक्सीजन की मात्रा घटी है और दूषित गैसों की मात्रा बढ़ी है। कार्बन डाई आॅक्साइड की मात्रा में तकरीबन पच्चीस फीसद की वृद्धि हुई है। इसका मुख्य कारण कारखानों और उद्योग-धंधों में कोयले व खनिज तेल का उपयोग है। इनके जलने से सल्फर डाई आॅक्साइड निकलती है जो मानव जीवन के लिए बेहद खतरनाक है। शहरों का बढ़ता दायरा, कारखानों से निकलने वाला धुंआ, वाहनों की बढ़ती तादाद एवं मेट्रो का विस्तार तमाम ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से प्रदूषण बढ़ रहा है। वाहनों के धुएं के साथ सीसा, कार्बन मोनोक्साइड और नाइट्रोजन आॅक्साइड के कण निकलते हैं। ये दूषित कण कई तरह की बीमारियां पैदा करते हैं।

कारखानों, बिजली घरों की चिमनियों और स्वचालित मोटरगाड़ियों में विभिन्न र्इंधनों के पूर्ण और अपूर्ण दहन भी प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं। वायु प्रदूषण से न केवल मानव समाज को ही नहीं, बल्कि प्रकृति को भी भारी नुकसान पहुंच रहा है। प्रदूषित वायुमंडल से जब भी वर्षा होती है, प्रदूषक तत्व वर्षा जल के साथ मिल कर नदियों, तालाबों, जलाशयों और मृदा को प्रदूषित कर देते हैं। अम्लीय वर्षा वनों को भी बड़े पैमाने पर नष्ट कर रहा है। यूरोपीय महाद्वीप में अम्लीय वर्षा के कारण साठ लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वन नष्ट हो चुके हैं। ओजोन परत, जो पृथ्वी के लिए एक रक्षाकवच का काम करती है, में वायुमंडल के दूषित गैसों के कारण उसे काफी नुकसान पहुंचा है। ध्रुवों पर इस परत में एक बड़ा छिद्र हो गया है जिससे सूर्य की खतरनाक पराबैगनीं किरणें भूपृष्ठ पर पहुंच कर ताप में वृद्धि कर रही है। इससे कैंसर जैसे असाध्य रोगों में वृद्धि हो रही है और पेड़ों से कार्बनिक यौगिकों के उत्सर्जन में बढ़ोत्तरी हुई है। इससे ओजोन एवं अन्य तत्वों के बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। ऐसे में सवाल है कैसे हम धरती के वायुमंडल को बचा पाएंगे।

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