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राजनीति: जल प्रबंधन की चुनौती

देश के तमाम शहरों में झीलों और तालाबों के साथ यही हुआ और जल स्रोत खत्म होते चले गए और जलभराव जैसी समस्या विकराल रूप धारण करती गई। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले पैंसठ सालों में सत्तर हजार से अधिक तालाबों और कुंओं ने दम तोड़ दिया है, जबकि वस्तुस्थिति तो इससे भी भयावह हो सकती है।

Author July 15, 2019 1:43 AM
बरसात के पानी को निकास का अपेक्षित मार्ग नहीं मिलता।

अतुल कनक

मानसून की शुरुआती बरसात के साथ ही देश के अनेक नगरों में सैलाब के से दृश्य उपस्थित हो गए। देश की आर्थिक राजधानी कहे जाने वाले महानगर मुंबई को शुरुआती बरसात के बाद ही सड़कों पर जमा पानी ने अस्त-व्यस्त कर दिया। राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, बिहार, असम और झारखंड के अनेक शहरों में बस्तियों में पानी घुस गया और महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि अधिकांश शहरों में यह सैलाब जैसा दृश्य अतिवृष्टि के कारण नहीं उपस्थित हुआ था, बल्कि इसलिए उपस्थित हुआ क्योंकि बरसात के पानी को निकास का अपेक्षित मार्ग नहीं मिला। मुंबई शहर में बारिश ने पिछले कई सालों का रेकॉर्ड तोड़ा। लेकिन क्या एक ऐसे महानगर को जो कभी ठहरता नहीं, ऐसे हालात से निपटने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए कि यदि सामान्य से अधिक मात्रा में बारिश का पानी गिरे तो उसकी निकासी या उसके संग्रहण का पर्याप्त प्रबंधन हो?

पानी जब अपने उद्दाम वेग पर आता है तो उसे रोक पाना संभव नहीं है। कोई भी दीवार उसके वेग को कितनी देर तक थाम सकती है? इसीलिए तो बड़े-बड़े बांधों में भी दरवाजे बनाए जाते हैं ताकि अधिक मात्रा में पानी की आवक हो तो अतिरिक्त पानी को बाहर निकाला जा सके। राजस्थानी कहावत है कि आग, पानी, राजा और सांप अपना स्वभाव नहीं बदलते। पानी का स्वभाव प्रवाहित होना है। उसके प्रवाह के मार्ग में यदि अवरोध खड़े किए जाएंगे तो वह या तो उस अवरोध को तोड़ देगा या फिर किसी अन्य रास्ते से बह निकलेगा।

आजादी के बाद नगरीय विकास की महत्त्वाकांक्षाओं ने परंपरागत जल स्रोतों का मानो गला ही घोंट दिया। बिहार के दरभंगा शहर को झीलों का शहर कहा जाता था, लेकिन वहां अधिकांश झीलें रिहायशी बस्तियों के लिए जमीन की जरूरत के जुगाड़ की भेंट चढ़ गर्इं। देश की राजधानी दिल्ली में दो-ढाई दशक पहले तक अपने जल भराव के कारण सामान्य आकर्षण का कारण रही झीलें सतत उपेक्षा और देखरेख के अभाव में अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाती प्रतीत होती हैं। पर्यटन के प्रमुख आकर्षण नैनीताल की झील कभी बाईस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली थी। लेकिन अब इसका अस्तित्व आठ किलोमीटर क्षेत्र में सिमट गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मौजूदा स्थिति कायम रही तो करीब तीन सौ साल बाद इस झील का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। लखनऊ के नास स्थित चदवक या करेला झील, सौतल झील, सोतवा झील तिदवा झील अतिक्रमण के कारण दुर्दशा को प्राप्त हो रही हैं। राजस्थान के कोटा शहर में तो तालाबों को पाट कर या तो बाजार बना दिए गए हैं या रिहायशी बस्तियां। देश के तमाम शहरों में झीलों और तालाबों के साथ यही हुआ और जल स्रोत खत्म होते चले गए और जलभराव जैसी समस्या विकराल रूप धारण करती गई। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि पिछले पैंसठ सालों में सत्तर हजार से अधिक तालाबों और कुंओं ने दम तोड़ दिया है, जबकि वस्तुस्थिति तो इससे भी भयावह हो सकती है।

तालाबों और कुंओं को ही नहीं, छोटी-छोटी नदियों को भी सतत उपेक्षा और जमीन के लिए हवस की हद तक पहुंच सकी जरूरत ने मार दिया। बिहार के मिथिलांचल को छोटी नदियों की बड़ी संख्या के कारण आज भी नदियों का मायका कहा जाता है। लेकिन इस गर्मी में मिथिलांचल की अधिकांश नदियां बेबस दिखीं। अधिकांश बड़े शहरों की रिहाइशी बस्तियों के नीचे कोई न कोई छोटी नदी सिसक रही है। सरस्वती नदी के लुप्त होने के पीछे तो एक आख्यान है कि जब देवताओं ने सरस्वती को पृथ्वी पर जाने का निर्देश दिया तो यह वरदान भी दिया था कि जब उसे लगने लगे कि पृथ्वी उसके रहने लायक नहीं रही तो वह स्वयं को समेटना शुरू कर दे। कहते हैं कि महाभारत के युद्ध के साथ ही पृथ्वी पर कलयुग ने प्रवेश किया और तब से ही सरस्वती नदी लुप्त होना शुरू हुई थी। लेकिन स्वार्थ के सतत चिंतन के कारण जिन नदियों को इंसानों ने गंदे नालों में तब्दील कर दिया, उन नदियों का कसूर क्या था? वे तो अपनी सामर्थ्य के अंतिम क्षण तक मनुष्य को शुद्ध जल उपलब्ष्ध कराने के लिए संकल्पित थीं।

अब यदि पानी के प्रवाह के मार्ग में ही दीवारें खड़ी कर दी जाएंगी तो पानी प्रवाहित होने के लिए बस्तियों में ही प्रवेश करेगा। यही स्थिति हर बार मानसून के दिनों में आधुनिक होते शहरों में सैलाब जैसे दृश्य पैदा करती है। प्राचीन काल में हमारे यहां बरसाती पानी के संग्रहण के लिए तालाब या कुंए बनवाए जाते थे। इन जल संसाधनों की सामाजिक उपयोगिता देखते हुए इनके निर्माण को अत्यंत पुण्यकारी माना गया। राजपरिवार से जुड़े लोग ही नहीं, समाज के अन्य सामर्थ्यवान लोग भी जीवन के किसी विशेष अवसर की स्मृति को बनाए रखने के लिए कुंए, बावड़ी, झील, तालाब, टांके या जोहड़ बनवाते थे। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के हिंडोली कस्बे में बने दो तालाबों के बारे में बड़ी ही रोचक कहानी है। हिंडौली में रहने वाली एक स्त्री को उसकी सास ने ताना दिया कि कौन से तेरे पीहर वालों ने हमारे यहां पानी का इतना इंतजाम कर रखा है कि मैं घर में पांव धोकर घुसूं। दरअसल, सासू मां गंदे पांव लेकर दालान में आ गई थी तो बहू ने उनसे आग्रह किया था कि वह पांव धो लें। यह बात जब बहू के पिता को पता चली, जो एक बंजारा था, तो उसने अपनी बेटी के ससुराल वाले गांव में दो विशाल तालाब बनवा दिए। ये तालाब आज भी एक पिता के स्वाभिमान और बेटी के प्रेम की कहानी तो कह रहे हैं, लेकिन समाज की अनदेखी ने इस कहानी पर मानो धूल की परतें चढ़ा दी हैं।

दरअसल तालाब, कुंए या अन्य परंपरागत जल स्रोत बरसात के पानी का संग्रहण कर न केवल लोगों को वर्ष पर्यंत जरूरत का जल उपलब्ध करवाते थे, अपितु भूजल स्तर को बनाए रखने में भी मदद करते थे। लेकिन जब से पानी नलों के माध्यम से घरों में पहुंचा है, लोगों ने इन परंपरागत जल स्रोतों की चिंता करनी बंद कर दी। हालत यह है कि कई प्रमुख नदियों के किनारे बसे शहर भी भूजल स्तर की दृष्टि से ‘डार्क जोन’ में चले गए हैं। एक तरफ पानी की उपलब्धता को लेकर हाहाकार है तो दूसरी ओर बरसात के पानी को सहेजने के प्रति हम अब भी संवेदनशील नहीं है। क्या यह पानी के साथ समाज का पंगा है?

लेकिन पानी से पंगा लेना मनुष्य जाति के लिए कभी शुभ साबित नहीं हो सकता। बांध या पनबिजलीघर बना कर मनुष्य पानी की शक्ति का सर्जनात्मक और सकारात्मक उपयोग तो कर सकता है। लेकिन सुनामी और बाढ़ जैसी घटनाएं साबित करती हैं कि पानी की शक्ति पर अपरिमित नियंत्रण अभी भी मनुष्य की सामर्थ्य के बाहर है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि भविष्य पुराण और बाइबिल से लेकर कुरान और अवेस्ता तक जैसे ग्रंथों में प्रलय की जो कल्पना है, उसका परिदृश्य जलप्लावन ही है। समाज की झोली पानी से रीती हो या पानी का प्लावन सबकुछ स्वयं में समेट ले- दोनों ही स्थितियां मानवता के लिए शुभ नहीं है। इसीलिए आवश्यक है कि हम पानी की प्रत्येक बूंद के सदुपयोग के प्रति सचेत हों और पानी के प्रबंधन के लिए संवेदनशील, ताकि परिस्थितियां कभी हमें यह चुनौती देती प्रतीत नहीं हों कि- पानी से पंगा मत लेना।

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