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राजनीति: कैंसर का कहर

बीते कई सालों से पर्यावरणविद और कृषि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जल्दी ही रासायनिक खाद और दवाओं को हटा कर जैविक खेती को नहीं अपनाया गया तो हालात गंभीर हो सकते हैं। फिर भी अब तक जैविक खेती को लेकर सिर्फ नारेबाजी ही हो रही है। हमारे यहां जैविक खेती की अवधारणा नई नहीं है, परंपरा से हमारे पूर्वज इसे करते रहे हैं। आसन्न चुनौतियों से निपटने का एकमात्र विकल्प है-अपनी जड़ों की ओर लौटना।

Author नई दिल्ली | Published on: August 30, 2019 1:39 AM
तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (फोटोः Unsplash)

मनीष वैद्य

रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल ने पूरी दुनिया की धरती में खेती के उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और मनुष्य की सेहत के लिए गंभीर खतरे खड़े कर दिए हैं। यहां तक कि शिशु के लिए अब अपनी मां का दूध भी सुरक्षित नहीं रह गया है। दूषित पेय और खाद्य पदार्थों के कारण मां का दूध भी प्रदूषित हो जाता है। यह बात विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन की एक रिपोर्ट में कही गई है। भारत में भी हरित क्रांति के बाद उत्पादन बढ़ाने के नाम पर किसानों को परंपरागत खेती छोड़ कर कीटनाशकों और रासायनिक खादों की सलाह दी गई। इसका अंधाधुंध इस्तेमाल हुआ और जोरदार पैदावार से किसान मालामाल भी हुए, परंतु तब इसके दूरगामी दुष्परिणामों पर गौर नहीं किया गया था। पंजाब को इसकी प्रयोगशाला की तरह देखा गया लेकिन खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों ने यहां के पानी, हवा और जमीन को बुरी तरह प्रदूषित कर दिया और किसानों को कैंसर की बीमारी तोहफे में दे दी। पंजाब के बठिंडा से बीकानेर जाने वाली ट्रेन को कैंसर ट्रेन के नाम से जाना जाता है। इससे हर दिन दो सौ से ज़्यादा कैंसर के मरीज बीकानेर के कैंसर अस्पताल पहुंचते हैं। बीस स्टेशनों से गुजरते हुए यह हर दिन सवा तीन सौ किलोमीटर का सफर तय कर कैंसर मरीजों की बुझी हुई उम्मीदों को जिंदा करने की कोशिश करती है।

पंजाब के बाद देश के कुछ और हिस्से भी अब तेजी से कैंसर की चपेट आते जा रहे हैं। सबसे बड़ा खतरा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, ओड़िशा और राजस्थान को है। देश में अब तक कैंसर मरीजों का आंकड़ा साढ़े बाईस लाख का है जो अगले बीस सालों यानी 2040 तक दुगना हो जाने की आशंका जताई जा रही है। कीटनाशकों के प्रयोग में ये राज्य देश के सर्वाधिक उपयोगकर्ताओं में शामिल हैं और यही कारण है कि अब इन राज्यों में कैंसर मरीजों का आंकड़ा तेजी से बढ़ रहा है। कैंसर से बीते साल सात लाख चौरासी हजार लोगों की मौत हो गई और साढ़े ग्यारह लाख नए मामले सामने आए थे।

कभी अपनी खास तरह की समृद्ध खेती-बाड़ी और प्राकृतिक सुंदरता के लिए पहचाने जाने वाले इन आठ राज्यों में लोग अब कैंसर के खौफनाक कहर से रूबरू हो रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में तो यह जानलेवा बीमारी तेजी से पांव पसाररही है। तंबाकू और बीड़ी पीने वालों को यह बीमारी आम है लेकिन यहां कई ऐसे लोग भी इस लाइलाज बीमारी के चंगुल में फंस चुके हैं जिन्होंने कभी तंबाकू का इस्तेमाल नहीं किया। विशेषज्ञों के मुताबिक इसका बड़ा कारण खेतों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक हैं। मध्यप्रदेश में इंदौर के पास घने जंगलों और हरे-भरे खेतों के बीच बसा गांव हरसोला आलू और सब्जियों की पैदावार के लिए मशहूर है। यहां के कम स्टार्च वाले आलू की विदेशों सहित देशभर में मांग रहती है और इस आलू का उपयोग चिप्स बनाने वाली कंपनियां ज्यादा करती हैं। लेकिन चौंकाने वाला तथ्य यह है कि बीते सालों में यहां कैंसर के पैंतीस से ज्यादा मरीज चिन्हित हुए थे, जिनमें से पंद्रह की मौत हो चुकी है। यह साफ है कि इस गांव के ज्यादातर लोग किसान हैं और अपने खेतों में काम करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों का कीटनाशक बारिश के पानी के साथ जमीन में पहुंचता है और जमीन के साथ जमीनी पानी के भंडार को भी प्रदूषित करता है। खेती-बाड़ी वाले गांवों में बीते चालीस सालों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करीब चार से पांच गुना तक बढ़ा है। इसी ने हमारे परिवेश में जहर और हवा में कड़वाहट घोल दी है। ये बीमारियां इन्हीं की देन हैं।

कुछ सालों पहले तक पैंतालीस साल या इससे अधिक उम्र की महिलाओं में ही स्तन कैंसर की आशंका होती थी लेकिन अब पच्चीस से पैंतीस साल की महिलाओं में यह बीमारी अधिक देखने में आ रही है। भारत में हर आठ में से एक महिला को स्तन कैंसर की आशंका रहती है। स्तन कैंसर सायलेंट किलर है और इसका पता लगने में थोड़ी-सी भी देर हो जाए तो इसके ठीक होने की संभावना कम हो जाती है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में इससे मौतें ज्यादा होती हैं, क्योंकि वहां तक जांच व निदान की तकनीक और संसाधन अब तक सुलभ नहीं हो पाए हैं। इस बीमारी के फैलने का सबसे बड़ा कारण बदलता खानपान, प्रदूषण, जीवन शैली में बदलाव, नशा और अनुवांशिकी के साथ-साथ पानी, सब्जियों और अनाज में कीटनाशकों के अंश का पहुंचना है। संसाधनों और डाक्टरों की कमी, गरीबी और कुपोषण ने इस संकट को और बढ़ा दिया है।

रासायनिक खाद के इस्तेमाल में भी भारत पीछे नहीं है। बीते साठ सालों में यूरिया का बेतहाशा इस्तेमाल किया गया। 1960 में जहां नाइट्रोजन फर्टिलाइजर में यूरिया का अंश महज दस फीसदी था, जो अब बढ़ कर बयासी फीसद से ज़्यादा हो चुका है। फर्टिलाइजर एसोसिएशन आॅफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक भारत हर साल एक सौ अड़तालीस लाख टन यूरिया की खपत करता है। हैरत की बात यह है कि अधिकांश खेतों की मिट्टी की जांच ही नहीं हुई है। ऐसे में बिना किसी आकलन के किसान अपनी मर्जी से यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। उन्हें लगता है कि अब जमीन को यूरिया की आदत बन गई है और यदि वे यूरिया नहीं डालेंगे तो पैदावार काफी घट जाएगी। देश में सबसे ज्यादा यूरिया की खपत उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड हैं। पहले नंबर पर उत्तर प्रदेश है जो क्षेत्रफल की दृष्टि से काफी बड़ा है। लेकिन छत्तीसगढ़, उत्तराखंड और झारखंड का क्षेत्रफल काफी कम होने पर भी यूरिया की खपत काफी तेजी से बढ़ी है और इसमें हर साल बीस फीसद बढ़ोतरी हो रही है। यूरिया का तीस फीसद हिस्सा ही पौधों को बढ़ाता है, जबकि सत्तर फीसद नाइट्रोजन में बदल कर बारिश के पानी के साथ धरती में चला जाता है और भूजल भंडार और मिट्टी के साथ नदी-नालों में समा कर उन्हें प्रदूषित करता है। ऐसा पानी फसलों को नुकसान पहुंचाता है। यह पानी और इससे उगने वाला अन्न दोनों ही मनुष्य में गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।

बीते कई सालों से पर्यावरणविद और कृषि वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि जल्दी ही रासायनिक खाद और दवाओं को हटा कर जैविक खेती को नहीं अपनाया गया तो हालात गंभीर हो सकते हैं। फिर भी अब तक जैविक खेती को लेकर सिर्फ नारेबाजी ही हो रही है। हमारे यहां जैविक खेती की अवधारणा नई नहीं है, परंपरा से हमारे पूर्वज इसे करते रहे हैं। आसन्न चुनौतियों से निपटने का एकमात्र विकल्प है-अपनी जड़ों की ओर लौटना। दुर्भाग्य से जिन गांवों के कोठार कभी अन्न के दानों से भरे रहते थे, आज वहां दवाइयां हैं, जहां के खेत सोना उगलते थे, आज वहां की हवा में दुर्गंध है। जहां कभी फसलें आने पर लोक गीत गूंजते थे, आज वहां भयावह खौफ और मौत का सन्नाटा है। जहां के लोग हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी हृष्ट-पुष्ट बने रहते थे, आज वे कंकाल की तरह नजर आते हैं और निराशा इतनी कि हर दिन अपनी मौत की घड़ियां गिनते रहते हैं। बीते तीस-चालीस सालों में हमने खेती की उपज बढ़ाने के नाम पर किन यमदूतों को हमारी खेती में शामिल कर लिया कि हमारी जान पर ही बन आई। भला ऐसी समृद्धि किस काम की जो मौत का तोहफा देती हो।

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