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राजनीति: कारोबारी रिश्ते और अड़चनें

भले पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ने आयात शुल्क बढ़ाने और डेटा संरक्षण पर भारत के कड़े रुख से नाराजगी जताई हो, फिर भी भारत को अमेरिका के साथ कारोबार की विभिन्न संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए वाणिज्यिक और कूटनीतिक वार्ता के कदम बढ़ाने होंगे। अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार वाला देश है।

Author July 22, 2019 1:31 AM
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प

जयंतीलाल भंडारी

पिछली दिनों भारत और अमेरिका के व्यापार वार्ताकारों के बीच नई दिल्ली में दो दिन की बैठक बिना किसी के नतीजे के खत्म हो गई। अब सबकी निगाहें भारत के वाणिज्य व उद्योग मंत्री की इसी महीने होने वाली प्रस्तावित अमेरिका यात्रा पर टिक गई हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि उनकी यह यात्रा भारत-अमेरिका के बीच कारोबार के मतभेदों को दूर करने की डगर पर आगे बढ़ेगी। यह उम्मीद इसलिए बनी हुई है क्योंकि पिछले महीने जापान के ओसाका में जी-20 सम्मेलन के इतर भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच कारोबार के मुद्दे पर सकारात्मक वार्ता हुई थी। इसी में दोनों देशों के बीच आयात शुल्क का मुद्दा भी उठा था। इस वार्ता के बाद ही यह संकेत उभरे कि कारोबार संबंधी विवाद दूर करने के लिए भारत और अमेरिका मिल कर समाधान निकालेंगे।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि नई दिल्ली में हुई भारत-अमेरिकी व्यापार वार्ता बेनतीजा रहने के पीछे अमेरिका का यह अड़ियल रुख रहा कि पहले भारत अमेरिकी सामान पर शुल्क कम करे, उसके बाद ही बाकी मसलों पर बातचीत होगी। जबकि भारत का कहना था कि उसने शुल्कों में बढ़ोतरी अमेरिका द्वारा भारत को सामान्य तरजीही व्यवस्था (जनरलाइज सिस्टम आॅफ प्रेफरेंस-जीएसपी) की सूची से निकाले जाने के जवाब में की है। अतएव ऐसे में अमेरिकी कदम वापस लिए जाने से पहले भारत से शुल्क कम करने को कहना उचित नहीं है। उल्लेखनीय है कि 27 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने वर्षों से अमेरिका के खिलाफ भारी आयात शुल्क लगा रखा है और पिछले दिनों इसे और बढ़ा दिया है। इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि भारत सीमा के आर-पार डेटा के प्रवाह को रोक रहा है और उसने ई-कॉमर्स पर जो सख्त नियम बनाए हैं उससे भारत में अमेरिकी कंपनियों का कामकाज प्रभावित हो रहा है। इसी तरह 26 जून को भारत आए अमेरिका के विदेश मंत्री ने कहा था कि आयात शुल्क के मामले पर भारत और अमेरिका के बीच जो मतभेद हैं, उन्हें दूर करना जरूरी है।

गौरतलब है कि भारत ने अमेरिका से आयात होने वाले बादाम, अखरोट और दालों सहित उनतीस महत्त्वपूर्ण कृषि एवं औद्योगिक जिंसों पर पचास फीसद तक शुल्क लगाने की एक वर्ष पूर्व जो घोषणा की थी, उसे आठ बार आगे टालने के बाद इस साल 16 जून से प्रभावी किया गया है। इससे पहले अमेरिका ने भारत से इस्पात एवं एल्युमीनियम आयात पर क्रमश: पच्चीस और दस फीसद शुल्क लगा दिया था। भारत ने अमेरिका से शुल्कों में रियायत देने का आग्रह किया था, लेकिन अमेरिका ने ऐसी रियायत भारत को नहीं दी। जबकि मैक्सिको और कनाडा को ये रियायतें दी गई हैं। अमेरिका से आयात होने वाले उत्पादों पर शुल्क लगाने से जितनी कमाई होगी, उससे भारत से अमेरिका को इस्पात एवं एल्युमीनियम के निर्यात पर शुल्क से होने वाले नुकसान की भरपाई हो जाएगी।
अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाए जाने के बाद भी भारत ने पिछले एक वर्ष के दौरान काफी धैर्य दिखाया और उसे कोई रास्ता निकलने की उम्मीद थी। लेकिन इस बीच पिछले महीने अमेरिका ने भारत को जीएसपी के तहत दी जा रही आयात शुल्क रियायतें खत्म कर दीं। गौरतलब है कि जीएसपी व्यवस्था के तहत अमेरिका विकासशील लाभार्थी देश के उत्पादों को अमेरिका में बिना आयात शुल्क प्रवेश की अनुमति देकर उनके आर्थिक विकास को बढ़ावा देता है। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत को वर्ष 1976 से जीएसपी व्यवस्था के तहत करीब दो हजार उत्पादों को शुल्क मुक्त रूप से अमेरिका में बेचने की अनुमति मिली हुई थी। अमेरिका से मिली व्यापार छूट के तहत भारत से किए जाने वाले करीब 5.6 अरब डॉलर यानी चालीस हजार करोड़ रुपए के निर्यात पर कोई शुल्क नहीं लगता था।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार कहा है कि भारत के साथ आयात शुल्क रियायतों पर व्यापार घाटे वाला है। इसी परिप्रेक्ष्य में पिछले मई महीने अमेरिका के वाणिज्य मंत्री अमेरिका की सौ कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ भारत आए थे और उन्होंने प्रधानमंत्री और वाणिज्य व उद्योग मंत्री सहित व्यापार संगठनों से उच्चस्तरीय बातचीत करके भारत द्वारा अमेरिकी उत्पादों पर लगाए जा रहे अधिक आयात शुल्क पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई थी। आयात शुल्क बाधाओं के कारण ही भारत अभी अमेरिका का तेरहवां बड़ा निर्यात बाजार है। जबकि भारत का सबसे ज्यादा निर्यात अमेरिका को होता है। अभी दोनों देशों के बीच करीब सवा सौ अरब डॉलर से ज्यादा का द्विपक्षीय व्यापार होता है जिसमें भारत का निर्यात सतहत्तर अरब डॉलर से ज्यादा का है और आयात करीब उनचास अरब डॉलर का। इस लिहाज से अमेरिका के हिस्से सालाना साढ़े अट्ठाईस अरब डॉलर का व्यापार घाटा है। लेकिन यह सिर्फ वस्तुओं के व्यापार का हिसाब है।

अमेरिका की निगाहें केवल रोजगार के लाभों पर टिकी हैं। वस्तुत: वस्तुओं के उत्पादन और व्यापार के बजाय वित्तीय कारोबार को तरजीह देने की नीति अमेरिकी शासकों ने लंबे समय से अपना रखी है, जिसके कारण अमेरिका का व्यापार घाटा बढ़ता गया है। स्थिति यह है कि 2018 में अमेरिका का कुल व्यापार घाटा छह सौ इक्कीस अरब डॉलर रहा जिसमें से भारत के साथ उसका व्यापार घाटा नगण्य है। ऐसे में अमेरिका भारत सहित उन विभिन्न देशों में अमेरिकी सामान के निर्यात में आ रही नियामकीय रुकावटों को दूर करना चाहता है ताकि अमेरिका के व्यापार घाटे में कमी आ सके।

निसंदेह भारत का जीएसपी दर्जा खत्म किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। भारत का कहना है कि उसके राष्ट्रीय हित व्यापार के मामले में सर्वोच्चता रखते हैं। यदि भारत अमेरिका के सभी उत्पादों को आयात संबंधी मापदंडों की अवहेलना करते हुए आसानी से भारत में आने देगा तो उससे भारत के घरेलू उद्योग कारोबार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, साथ ही भारत के सांस्कृतिक मूल्यों को भी ठेस पहुंचेगी। निसंदेह अमेरिका से जीएसपी के तहत आयात शुल्क छूट खत्म होने के बाद भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर असर तो पड़ेगा। अमेरिका के इस कदम से भारत की कपड़ा, सिलेसिलाए कपड़े, रेशमी कपड़े, ज्वैलरी, प्रसंस्कृत खाद्य, फुटवियर, प्लास्टिक के उत्पाद, रसायन, इंजीनियरिंग उत्पाद, साइकिल के पुर्जे बनाने वाली औद्योगिक इकाइयों की मुश्किलें खड़ी हो गई हैं। इन उद्योगों की मुश्किलें बढ़ने से इनमें काम करने वाले हजारों लोगों के सामने रोजगार का संकट भी खड़ा हो रहा है। निर्यातकों के संगठन- फियो ने कहा है कि जीएसपी के तहत लाभों के समाप्त होने के कारण ऐसी सुविधा प्राप्त भारतीय निर्यातकों को सरकार की वित्तीय मदद की जरूरत होगी, तभी वे अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी बन पाएंगे।

भले पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति ने आयात शुल्क बढ़ाने और डेटा संरक्षण पर भारत के कड़े रुख से नाराजगी जताई हो, फिर भी भारत को अमेरिका के साथ कारोबार की विभिन्न संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए वाणिज्यिक और कूटनीतिक वार्ता के कदम बढ़ाने होंगे। अमेरिका भारत के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार वाला देश है। दोनों देशों को ऐसी नई रणनीति पर बढ़ना होगा जिससे कारोबार जगत में नई इबारत लिखी जा सके।

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