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राजनीतिक: सवालों में घिरी उड्डयन नीति

हालांकि सरकार नागरिक उड्डयन को और विकसित करने के दावे करती रही है। छोटे-छोटे शहरों को भी हवाई सेवा से जोड़ने का दावा किया जा रहा है। देश के तमाम हिस्सों में एयरपोर्टों के विकास के लिए तमाम दावे किए जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि देश के कई हवाई अड्डों पर घने कोहरे में विमान उतारने के लिए अत्याधुनिक तकनीक नहीं है, जो पश्चिमी देशों के हवाई अड्डों पर उपलब्ध है।

एयर इंडिया के इम्प्लॉयी। (फोटो: इंडियन एक्सप्रेस)

संजीव पांडेय

जेट एयरवेज के संकट ने भारत के नागरिक उड्डयन क्षेत्र के तेजी से हो रहे विकास पर सवाल खड़ा कर दिया है। उड़ानें बंद करने के जेट एयरवेज के फैसले ने नागरिक उड्डयन नीति पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। जेट एयरवेज पहली कंपनी नहीं है, जिसने अपनी हवाई सेवा बंद कर दी है। इससे पहले किंगफिशर और एयर डेक्कन को भी अपनी हवाई सेवाएं बंद करनी पड़ी थीं। एयर सहारा का भी बुरा हाल हुआ था, जिसे जेट एयरवेज ने खरीदा था। इसलिए सवाल सिर्फ एक विमानन कंपनी की उड़ानें बंद होने का नहीं है। सवाल भारत में नागरिक उड्डयन को लेकर बनाई गई नीति को लेकर भी है। आखिर यात्री संख्या में जोरदार बढ़ोतरी के बाद भी विमान कंपनियां घाटे में जा रही हैं, यह अहम सवाल है। घाटे में जाने वाली कंपनियों में सिर्फ निजी क्षेत्र की कंपनियां नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एयर इंडिया का घाटा भी खासा बढ़ा है।

नब्बे के दशक के आर्थिक सुधार ने भारत में निजी एयरलाइन कंपनियों को अच्छा अवसर दिया था। धीरे-धीरे भारत में उड्डयन उद्योग यहां तक पहुंच गया कि सालाना दस करोड़ यात्री हवाई सफर करने लगे। आंकड़े बताते हैं कि 2018 में भारत में ग्यारह करोड़ यात्रियों ने हवाई सफर किया। इसका बड़ा हिस्सा निजी विमान कंपनियों को मिला। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी इंडिगो की थी। यात्रियों की बढ़ती संख्या निजी विमान कंपनियों के लिए काफी उत्साहवर्धक रही है, क्योंकि विमान कंपनियों को ये यात्री घरेलू रूटों पर ही मिले। साल 2000 में भारत में हवाई यात्रा करने वालों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ थी। पंद्रह सालों में यह संख्या सालाना दस करोड़ से उपर पहुंच गई। इसके बावजूद कुछ विमान कंपनियों का भट्ठा बैठता गया। यात्रियों की बढ़ती संख्या के बावजूद विमान कंपनियों का घाटे में जाना हैरान करने वाली घटना है। विमान कंपनियों का बंद होना कहीं न कहीं नागरिक उड्डयन क्षेत्र को लेकर बनाई गई नीतियों पर सवाल खड़े कर रहा है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों ने भी भारतीय उड्डयन क्षेत्र को खासा नुकसान पहुंचाया।

पहले निजी एयरलाइन कंपनी एयर डेक्कन बंद हो गई। इसके बाद विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर बंद हुई। अब जेट एयरवेज ने अपनी उड़ानें बंद कर दीं। दरअसल, ये कंपनियां हजारों करोड़ के कर्ज में डूब गई हैं और कर्ज चुकाने में नाकाम रही हैं। हालांकि इन कंपनियों को यात्री अच्छे मिल रहे थे। लेकिन विमानों की परिचालन लागत ने भी विमान कंपनियों को भारी नुकसान पहुंचाया। विमान के रखरखाव से लेकर तमाम खर्चों से कंपनियां दबती चली गर्इं, क्योंकि कंपनियां गलाकाट प्रतिस्पर्धा में लोगों को सस्ते से सस्ते टिकट देती रहीं। कंपनियों का रोना यही था कि बढ़ती परिचालन लागत और सस्ते किराए ने कंपनियों को मार दिया। हालांकि निजी विमान कंपनियों के प्रबंधन भी कंपनियों की माली हालत खराब होने के लिए जिम्मेवार हैं, लेकिन सरकार की नीतियों ने भी नागरिक उड्डयन क्षेत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

नागरिक उड्डयन क्षेत्र में एकाधिकार खत्म करने की नीति भारत में 1990 के बाद लाई गई। लेकिन नागरिक उड्डयन क्षेत्र में असल क्रांति 2000 के बाद आई। हवाई जहाज आम लोगों की पहुंच में हो गया। 2003 में कैप्टन जीआर गोपीनाथ ने सस्ती विमान सेवा एयर डेक्कन शुरू की। इसके बाद कई और कंपनियां आर्इं। स्पाइस जेट, इंडिगो और गो एयर भी सस्ती विमान सेवा लेकर उतरीं। इन सारी निजी विमानन कंपनियों का कारोबारी मॉडल ज्यादा यात्री संख्या और सस्ते टिकट पर आधारित था। रेलगाड़ियों के वातानुकूलित कोचों में यात्रा करने वाले भी हवाई जहाज में उड़ने लगे। इससे विमान यात्रियों की संख्या में खासा इजाफा हुआ। पर जिस एयर डेक्कन ने सस्ती विमान सेवा शुरू की थी, उसकी आर्थिक स्थिति 2007 तक आते-आते खराब हो गई। खराब आर्थिक स्थिति के कारण एयर डेक्कन को किंगफिशर ने खरीद लिया। लेकिन तीन-चार साल बाद ही किंगफिशर की भी हालात खराब हो गई। 2012 तक आते-आते

किंगफिशर कंगाल हो गई, इसके सारे विमान जमीन पर आ गए। अब यही हालत जेट एयरवेज की है। सार्वजनिक क्षेत्र की विमानन कंपनी एयर इंडिया का घाटा भी बढ़ता जा रहा है। इसकी हालत भी कोई अच्छी नहीं है। किसी तरह सरकारी समर्थन से यह अपने को बचाए रखने में अभी तक सफल है। पर जेट एयरवेज, जिसकी यात्री बाजार में बयालीस फीसद तक हिस्सेदारी थी, उसकी बाजार हिस्सेदारी इस साल की शुरुआत में मात्र दस फीसद रह गई। भारतीय मुद्रा यानी रुपए के डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होने के कारण भी विमान कंपनियों को भारी नुकसान पहुंचा है। अपने कुल परिचालन खर्च का तीस फीसद तक विमान कंपनियों को भुगतान डॉलर में करना होता है। इसमें विमान का लीज किराया, जमीन पर होने वाले रखरखाव का खर्च, विदेशों में जाने वाले जहाजों की पार्किंग जैसे बड़े खर्च शामिल हैं। ये सारे भुगतान डॉलर में करने होते हैं। इसके अलावा विमान कंपनियों को पूरी दुनिया के मुकाबले सबसे ज्यादा र्इंधन पर पैसे का भुगतान भारत में करना पड़ रहा है।

भारत में विमान को दिए जाने वाले र्इंधन (एटीएफ) पर भारी टैक्स लगाया जाता है। विमान को दिए जाने वाले र्इंधन पर चौदह फीसद उत्पाद शुल्क और उनतीस फीसद बिक्री कर है। काफी लंबे समय से विमान कंपनियां मांग कर रही हैं कि विमान के र्इंधन को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। लेकिन सरकार ने इनकी मांगों को अनसुना कर दिया। विमान कंपनियों का तर्क रहा है कि वर्तमान में र्इंधन को लेकर जो ढांचा सरकार ने लागू कर रखा है, वह विमान कंपनियों को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। दुनिया के दूसरे देशों में विमान र्इंधन पर टैक्स कम है और इस कारण र्इंधन पर विमान कंपनियों को अपने कुल खर्च का सिर्फ बीस फीसद तक खर्च करना पड़ता है। पर भारत में कंपनियों को चालीस फीसद तक र्इंधन पर खर्च करना पड़ता है।

हालांकि बीच में सरकार ने देश में संचालित होने वाले विशेष दर्जे की ट्रेनों में किराए के ढांचे में फेरबदल किया था। सरकार को उम्मीद थी कि इससे विमान कंपनियों को लाभ पहुंचेगा। हालांकि इससे रेलवे को भारी नुकसान हुआ। सरकार ने राजधानी एक्सप्रेस और शताब्दी एक्सप्रेस में फ्लैक्सी फेयर प्रणाली लागू कर दी। इससे इन ट्रेनों में यात्रा करना काफी महंगा हो गया। कई महत्त्वपूर्ण रूटों पर तो हवाई जहाज का किराया इन ट्रेनों के किराए के मुकाबले सस्ता हो गया। पहले, दूसरे और तीसरे दर्जे के वातानुकूलित कोच में सफर करने वाले लोग हवाई जहाज की तरफ रुख कर गए। निजी विमान कंपनियां इसका कितना लाभ उठा पार्इं, इसका तो पता नहीं चल पाया। पर राजधानी और शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेनों को फ्लैक्सी फेयर के कारण खासा नुकसान हो गया।

हालांकि सरकार नागरिक उड्डयन को और विकसित करने के दावे करती रही है। छोटे-छोटे शहरों को भी हवाई सेवा से जोड़ने का दावा किया जा रहा है। देश के तमाम हिस्सों में एयरपोर्टों के विकास के लिए तमाम दावे किए जा रहे हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि देश के कई हवाई अड्डों पर भारी कोहरे में विमान उतारने के लिए अत्याधुनिक तकनीक नहीं है, जो पश्चिमी देशों के हवाई अड्डों पर उपलब्ध है। इस कारण कई विदेशी रूटों पर अंतराष्ट्रीय विमान सेवा शुरू करने में दिक्कत में आई है। जबकि सरकार ने कागजों में इन हवाई अड्डों को अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डे का दर्जा दे दिया गया है। बताया जाता है कि दिल्ली में सक्रिय लॉबी देश के दूसरे हवाई अड्डों से अंतराष्ट्रीय विमान सेवाओं को सीधे शुरू किए जाने में लगातार बाधा बनती रही है। इस बाधा के कारण कई एयरपोर्टों को अत्याधुनिक तकनीक से लैस नहीं किया गया है।

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