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राजनीतिः कब मिलेगा कोरोना का टीका

दुनिया को महामारी से बचाने के लिए धन का इंतजाम तो किया जा सकता है, लेकिन कोविड-19 का संक्रमण फिलहाल अतिरिक्त समय की अनुमति नहीं दे रहा, क्योंकि कुछ लोगों में एक संक्रमण का इलाज हो जाने के बाद भी दोबारा बीमारी के लक्षण देखे गए हैं। लक्षणों की यह पुनरावृत्ति चिंता में डालती है और किसी निरोधक उपाय के त्वरित विकास की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

Author Published on: April 4, 2020 12:14 AM
कोरोना लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है राजमुकुट।

अतुल कनक

सारी दुनिया इस समय नॉवेल कोरोना वायरस के संक्रमण की आशंका से परेशान है। इस परेशानी का एक बड़ा कारण यह है कि अभी तक इस संक्रमण के उपचार का कोई माकूल बंदोबस्त नहीं किया जा सका है। हालांकि भारत सहित दुनिया के कई शहरों में इस वायरस के संक्रमण से बीमार हुए लोग स्वस्थ भी हुए हैं, लेकिन खुद इलाज करने वालों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने बीमारी के लक्षणों को देखते हुए अंधेरे में तीर चलाया था, और सौभाग्य से वह निशाने पर जा लगा। शायद यही कारण है कि कोरोना वायरस के इलाज को लेकर अनेक अफवाहों का बाजार भी गर्म है। किसी ने कह दिया कि मिथाइल एल्कोहल पीने से इस वायरस का संक्रमण नहीं होता, तो ईरान में बहुत से लोगों ने मिथाइल एल्कोहल पी लिया और इस नासमझी से (मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ) तीन सौ लोग मारे गए। दरअसल, आदमी जब डर में होता है या उसे अपनी रक्षा का कोई उपाय नहीं सूझता, तो फिर वह इसी तरह की मूढ़ताओं की शरण में चला जाता है। हमें समझना होगा कि कोरोना वायरस कोई अकेला वायरस नहीं है, अपितु वायरसों का पूरा परिवार है और दुनिया को इन दिनों आशंकित और आतंकित कर रहा नॉवेल कोरोना वायरस, जिसे वैज्ञानिकों ने कोविड- 19 नाम भी दिया है, इस परिवार का सबसे नया सदस्य है।

कोरोना लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है राजमुकुट। जब सूक्ष्मदर्शी द्वारा कोरोना परिवार के वायरस को पहली बार देखा गया था, तो उसके आसपास रही कांटों जैसी संरचना के कारण वह किसी यूरोपीय राजा के मुकुट की तरह लगा था और इसीलिए उसे कोरोना नाम दिया गया था। इस परिवार के वायरस मनुष्य के श्वसन तंत्र को इस तरह संक्रमित करते हैं कि सांस लेना लगातार मुश्किल होता चला जाता है। नॉवेल कोरोना वायरस के कोविड 19 नाम में जहां ‘को’ कोरोना शब्द का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं ‘वी’ अक्षर वायरस के लिए और ‘ड’ अक्षर डिजीज अर्थात बीमारी के लिए है। चूंकि इस वायरस के बारे में सबसे पहले दिसंबर 2019 में पता चला था, इसलिये कोविड शब्द के साथ ‘19’ भी जोड़ दिया गया। महत्त्वपूर्ण है कि इस वायरस के प्रसार का आरोप चीन पर लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो इसे चीनी वायरस नाम भी दिया था। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि किसी वायरस का कोई एक देश नहीं होता। इसलिए उसके नाम के साथ किसी देश का नाम नहीं जोड़ा जाना चाहिये। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो कोविड-19 को चीनी वायरस कहने के लिए ट्रंप को खरी-खोटी भी सुनाई। कोविड-19 इसलिए भी बहुत खतरनाक है कि यह तेजी से संक्रमित व्यक्ति के दोनों फेफड़ों को खराब करता है। चूंकि यह कोरोना परिवार का ही सदस्य है और इन दिनों सबसे ज्यादा सक्रिय है, इसलिए आम बोलचाल की भाषा में इसे कोरोना वायरस ही कहा जा रहा है।

सवाल यह है कि क्या फिलहाल इस खतरनाक वायरस से संक्रमित होना ही दुनिया के लेखे में लिखा है या इसके सटीक उपचार का कोई तरीका निकट भविष्य में मिलने की उम्मीद है। महत्त्वपूर्ण है कि ऐसी बीमारियों के लिए निरोधक टीके ही सबसे कारगर उपाय होते हैं, लेकिन मुसीबत यह है कि जहां किसी टीके को विकसित करने में करोड़ों-अरबों का खर्च आता है, वहीं संक्रमण और बीमारियों के सभी पहलुओं का गहन अध्ययन और विश्लेषण करने में बहुत समय भी लगता है। आमतौर पर इस तरह के टीकों का प्राथमिक प्रयोग जानवरों पर किया जाता है, ताकि टीके के किसी प्रतिकूल प्रभाव की संभावनाओं को भी परखा जा सके और जब लंबे समय तक जानवरों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता, तब मनुष्यों पर इसका प्राथमिक प्रयोग किया जाता है और उसके परिणाम देख कर भविष्य के लिए परिशोधन किया जाता है।

दुनिया को महामारी से बचाने के लिए धन का इंतजाम तो किया जा सकता है, लेकिन कोविड-19 का संक्रमण फिलहाल अतिरिक्त समय की अनुमति नहीं दे रहा, क्योंकि कुछ लोगों में एक संक्रमण का इलाज हो जाने के बाद भी दोबारा बीमारी के लक्षण देखे गए हैं। लक्षणों की यह पुनरावृत्ति चिंता में डालती है और किसी निरोधक उपाय के त्वरित विकास की आवश्यकता को रेखांकित करती है। दुनिया के लिए यह एक सुखद खबर हो सकती है कि तमाम खतरों का सामना करते हुए कोविड-19 के प्रस्तावित टीके के प्रथम चरण का प्रयोग पिछली 16 मार्च को अमेरिका के सिएटल शहर में स्थित वाशिंगटन हेल्थ रिसर्च इंस्टीट्यूट में कुछ स्वयंसेवकों पर किया गया है। अठारह से पचपन वर्ष की उम्र के इन स्वास्थ्य स्वयंसेवकों पर अब इस टीके के प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि शायद पहली बार किसी बीमारी के प्रतिरोधक टीके का इस्तेमाल पहले जानवरों पर नहीं किया जाकर सीधे मनुष्य पर किया गया है। यों विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में अलग-अलग संस्थानों में करीब चालीस कोविड-19 प्रतिरोधक टीकों पर शोध कार्य हो रहा है। सिएटल में प्रयोग किए गए टीके को एमआरएनए-1273 (मैसेंजर राइबोन्यूक्लेसिक एसिड -1273) नाम दिया गया है। भारत के पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया भी एक अमेरिकी कंपनी के साथ कोरोना के प्रतिरोधक टीके पर काम कर रहा है। वैज्ञानिकों के लिए इसे उपलब्धि माना जा रहा है कि इतनी जल्दी वह विषाणु प्रतिरोधक टीके के विकास के पहले चरण तक पहुंच गए। उल्लेखनीय है कि इस तरह के शोध कार्य को प्रोत्साहित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘कोएलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेअरिक्लुअर इनोवेटिव्ज’ (सीईपीआइ) नामक संगठन है और भारत भी उसका सदस्य है।

हालांकि चीन में कोरोना संक्रमण की शुरुआत पिछले साल दिसंबर में ही हो गई थी, लेकिन आधिकारिक तौर पर यह सात जनवरी को पता चला कि इस संक्रमण का कारण कोरोना परिवार का एक नया वायरस है। इस वायरस की जैविक संरचना को चीन ने अंतरराष्ट्रीय जगत के साथ 12 जनवरी को साझा किया। इसके बाद वैज्ञानिकों ने तेजी से इस पर काम किया और 24 फरवरी को एमआरएनए-1273 नाम का टीका अमेरिका के ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ फॉर ह्यूमन टेस्टिंग’ को भेजा और आवश्यक परीक्षणों के बाद पिछली 16 मार्च को स्वास्थ्य स्वयंसेवकों के पहले दस्ते पर इस टीके का पहला परीक्षण किया गया। कोविड-19 का टीका बनाने पर इतनी तेजी से काम इसलिए शुरू हो गया, क्योंकि वैज्ञानिकों के पास कोरोना परिवार के वायरसों की जैविक संरचना की जानकारी पहले से थी। इस समय दुनिया में तीन दर्जन से अधिक नामी संस्थान कोरोना वायरस का टीका विकसित करने पर काम कर रहे हैं। किस के प्रयासों को अंतत: यश और सफलता की प्राप्ति होगी, यह तो आने वाला समय ही बताएगा।

हालांकि प्रथम चरण के परीक्षण को ही अभी कोविड-19 के खिलाफ शुरू हुई लड़ाई का अंत नहीं माना जा सकता, क्योंकि स्वास्थ्य स्वयंसेवकों के परीक्षण के बाद उन पर हुए प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण होगा, उसके बाद प्रयोगशाला में उस विश्लेषण के आधार पर प्राप्त निष्कर्षों पर काम होगा, फिर मानक स्तर तक किसी टीके के प्रमाणीकरण के लिए विविध प्रयोग होंगे और अंत में सभी स्तरों पर सुरक्षा और लाभ तय हो जाने के बाद इस टीके को बाजार में उतारा जाएगा। समस्त परिस्थितियां अनुकूल रहीं और इसी तरह युद्व स्तर पर काम चलता रहा तो भी बाजार में कोविड-19 का वांछित टीका आने में कम से कम एक साल तो लगेगा ही।

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