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राजनीति: जवानों के संकट से जूझती पुलिस

ऐसा नहीं कि सिर्फ निचले स्तर पर पुलिसकर्मियों का टोटा हो, देश का पुलिस तंत्र अधिकारियों की कमी से भी जूझ रहा है। देश में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के कुल चार हजार आठ सौ तियालीस पद अधिकृत हैं, लेकिन इनमें भी नौ सौ से ज्यादा पद खाली हैं। यह वह सूचना है जो संसद में दी गई थी। कहने की जरूरत नहीं है कि इस मामले में अभियान चला कर सभी पदों को भरना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए और देश में पुलिस की कमी तत्काल दूर करनी चाहिए।

संजय कुमार सिंह

हाल में खबर आई कि देश में साढ़े पांच लाख से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों के पद खाली पड़े हैं। यह आंकड़ा ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डवलपमेंट (बीपीआरडी) ने जारी किया है। यह वाकई चौंकाने वाली खबर है। इससे पता चलता है कि देश की कानून-व्यवस्था से लेकर आंतरिक सुरक्षा तक का जिम्मा संभालने वाला पुलिस महकमा किस दयनीय हालत में काम कर रहा होगा। इसीलिए ज्यादातर राज्यों में अपराधों का ग्राफ तेजी से ऊपर जा रहा है। सबसे ज्यादा पद उत्तर प्रदेश में खाली हैं और जब सबसे ज्यादा बदतर कानून-व्यवस्था वाले राज्यों की सूची बनती है तो उसमें भी उत्तर प्रदेश ही सबसे ऊपर आता है। उत्तर प्रदेश की जेलों में हत्याओं से लेकर गैंगवार और वसूली जैसे काम हो रहे हैं। ये घटनाएं प्रदेश की कानून-व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी हैं। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल आदि राज्य भी इसी श्रेणी में आते हैं। राजधानी दिल्ली भी इस समस्या से अछूती नहीं है।

वैसे तो ज्यादातर सरकारी महकमों की हालत यही है कि कर्मचारियों के पद खाली पड़े हैं और कामकाज पर असर पड़ रहा है। लेकिन पुलिस वालों की कमी का सीधा असर कानून-व्यवस्था से लेकर यातायात, जान-माल की सुरक्षा और आमजन से जुड़ी सेवाओं पर पड़ता है। यही नहीं, सड़क दुर्घटना और विभिन्न अपराधों में घायल लोगों को समय पर इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाने का काम और जिम्मेदारी भी पुलिस पर ही है। इसलिए दूसरे विभागों में कर्मचारियों की कमी से मुमकिन है काम न हो, पर पुलिस वालों की कमी का मतलब है कानून-व्यवस्था पर सीधा असर पड़ना। पुलिस के चुनौतीभरे काम और उसकी जरूरत के मद्देनजर देशभर में पुलिस वालों की संख्या स्वीकृत पदों के मुकाबले कम होना चिंताजनक है। एक जनवरी 2018 की स्थिति के अनुसार देश भर में पुलिसकर्मियों के पांच लाख तियालीस हजार पद खाली थे। इनमें सबसे ज्यादा एक लाख उनतीस हजार पद उत्तर प्रदेश में खाली हैं। नगालैंड देश का अकेला ऐसा राज्य है, जहां पुलिस वालों की संख्या मानक से ज्यादा है। बीपीआरडी के आंकड़ों के मुताबिक, देशभर में पुलिस वालों के 24,84,170 पद घोषित हैं। एक जनवरी 2018 को इनमें से 19,41,473 पद भरे हुए थे।

पुलिस वालों के खाली पदों से संबंधित जो खबरें आई हैं, उनके मुताबिक एक जनवरी 2017 को पुलिस वालों के कुल पांच लाख अड़तीस हजार पद खाली थे और 2018 में यह संख्या बढ़ कर पांच लाख तियालीस हजार हो गई थी। 2016 में खाली पदों की संख्या सबसे ज्यादा साढ़े पांच लाख थी। कानून-व्यवस्था से लेकर यातायात संभालने के लिए जिम्मेदार पुलिस वालों की कमी देश भर में कई सालों से है। पिछले साल एक जनवरी की स्थिति के अनुसार पुलिस वालों की कमी के मामले में उत्तर प्रदेश के बाद बिहार (50291), पश्चिम बंगाल (48981), तेलंगाना (30345) और महाराष्ट्र (26196) का नंबर आता है।

राज्यों की बात फिर भी अलग है। राजधानी दिल्ली में पुलिसकर्मियों की कमी होना ज्यादा गंभीर है। बेहतर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रति व्यक्ति यहां पुलिस वालों की संख्या देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले ज्यादा रखी गई है। लेकिन पद खाली हों तो मकसद ही पूरा नहीं होगा। जून 2018 में एक सवाल के जवाब में तत्कालीन गृहराज्य मंत्री ने कहा था कि दिल्ली पुलिस में (जून 2018 में) बारह हजार से ज्यादा पद खाली हैं। दिलचस्प यह है कि दिल्ली में पुलिस वालों के जो पद खाली थे, उनमें संयुक्तपुलिस आयुक्त के भी तीन पद शामिल थे। राजधानी की पुलिस वैसे भी विशेष है और सीधे केंद्र सरकार को रिपोर्ट करती है। फिर भी इसमें हेड कांस्टेबल के तीन हजार दो सौ उनयासी और उपनिरीक्षक के डेढ़ हजार पद खाली हों तो यह चिंता का विषय बनता है। ऐसा नहीं कि सिर्फ निचले स्तर पर पुलिसकर्मियों का टोटा हो, देश का पुलिस तंत्र अधिकारियों की कमी से भी जूझ रहा है। देश में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों के कुल चार हजार आठ सौ तियालीस पद अधिकृत हैं, लेकिन इनमें भी नौ सौ से ज्यादा पद खाली हैं। यह वह सूचना है जो संसद में दी गई थी। कहने की जरूरत नहीं कि इस मामले में अभियान चला कर सभी पदों को भरना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए और देश में पुलिस की कमी तत्काल दूर करनी चाहिए।

पुलिस, खासकर दिल्ली तथा महानगरों की पुलिस को एक और जो महत्त्वपूर्ण व ज्यादा जोखिम भरा काम करना होता है, वह है आतंकी हमलों व अपराधियों से संबंधित खुफिया जानकारी पर कार्रवाई करना। कर्मचारी कम होंगे तो ऐसे मामलों में लापरवाही बरती जाएगी। यह तथ्य है कि जब भी आतंकी घटनाएं या सामूहिक अपराध या बलात्कार जैसी वारदातें होती हैं तो दिल्ली पुलिस में कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने को लेकर चर्चा शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ दिनों के बाद यह विषय सिर्फ चर्चा तक सीमित रह कर कहीं खो जाता है।

जब देश की राजधानी की यह हालत है तो बाकी राज्यों और दूर-दराज के शहरों की क्या बात की जाए! पुलिस बल की सबसे बड़ी समस्या कठिन और जोखिमपूर्ण हालात में काम करना है। पुलिस कर्मचारियों को छुट्टी नहीं मिलना, रहने और काम की खराब स्थिति की चर्चा होती रहती है। पुलिस वालों को मिलने वाली सुविधाओं की हालत यह है कि ज्यादातर राज्यों में तो उन्हें साप्ताहिक अवकाश नहीं मिलता है। हरियाणा से खबर थी कि थानों में पुलिस वालों की इतनी कमी है कि सरकार ने नई भर्तियों के साथ-साथ आइआरबी (इंडियन रिजर्व बटालियन) के जवानों को तैनात करने का फैसला किया गया था। हरियाणा के उस समय के पुलिस महानिदेशक ने इस आशय का प्रस्ताव दिया था जिसे सरकार ने मान लिया था। अब आइआरबी में डेढ़ दशक तक सेवाएं देने वाले पुलिस जवानों की हरियाणा के पुलिस थानों में तैनाती होगी। हरियाणा में लंबे समय से पुलिस कर्मचारियों की कमी चल रही है। राज्य की आबादी के लिहाज से करीब पच्चीस हजार पुलिसकर्मियों की जरूरत है। आइआरबी की मंजूरी केंद्र सरकार द्वारा दी जाती है। इसका खर्च भी केंद्र सरकार ही वहन करती है। बटालियन के गठन के लिए यह शर्त रहती है कि केंद्र सरकार जहां चाहे इस बटालियन का उपयोग कर सकती है। इस बल का गठन राज्यों में सीआरपीएफ या अन्य केंद्रीय बलों पर से निर्भरता खत्म करने के लिए किया जाता है। हरियाणा सरकार पहले ही महिला बटालियन की मांग केंद्र से कर चुकी है। भारत सरकार ने 1971 में भारतीय रिजर्व बटालियन योजना की शुरुआत की थी। अब तक विभिन्न राज्यों में एक सौ तिरपन आइआर बटालियनों के गठन की मंजूरी हो चुकी है। इनमें से एक सौ चवालीस बटालियनें गठित की जा चुकी हैं।

मध्यप्रदेश सरकार ने कुछ समय पहले पुलिसकर्मियों को साप्ताहिक अवकाश देने की दिशा में कदम उठाया। इसके अनुसार प्रदेश में फील्ड में तैनात पुलिस वालों की संख्या इतनी ज्यादा (करीब छप्पन हजार) है कि रोजाना आठ हजार स्टाफ साप्ताहिक अवकाश पर रहेंगे। इसका मतलब हुआ कि साप्ताहिक अवकाश देने के लिए अकेले मध्यप्रदेश में आठ हजार अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की व्यवस्था करनी होगी। राज्य सरकार ने इसके लिए एसएएफ, पीटीएस और होमगार्ड शाखा से आठ हजार कर्मी लेना तय किया है। इससे पहले भी पुलिस वालों को दो बार साप्ताहिक अवकाश देने की कवायद हुई थी पर उसे लागू नहीं किया जा सका। ऐसे में कल्पना की जा सकती है कि पुलिस में कर्मचारियों की कमी की समस्या कितनी गंभीर है और साप्ताहिक अवकाश देने जैसी बुनियादी जरूरत पूरी करना कितना मुश्किल है। फिर भी यह काम होना चाहिए इसमें कोई दो राय नहीं हैं।

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