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राजनीतिः आभासी मुद्रा के खतरे

दुनिया में जितनी भी मुद्राएं हैं, उन पर किसी न किसी बैंक या सरकार का नियंत्रण है। बैंकों और सरकारों की साख और अर्थव्यवस्था की ताकत के हिसाब से उनकी मुद्राओं का मूल्य तय होता है। पर आभासी मुद्रा तो इन सारे नियम-कानूनों से परे है। इन्हें न तो हकीकत में कागज या सिक्कों के रूप में मुद्रित किया अथवा ढाला जा सकता है, न ही इन पर किसी बैंक या सरकार का नियंत्रण या अधिकार होता है।

दुनिया में जितनी भी मुद्राएं हैं, उन पर किसी न किसी बैंक या सरकार का नियंत्रण है।

संजय वर्मा

पिछले कुछ सालों में देश के अर्थतंत्र में कुछ चौंकाने वाले फैसले और काम हुए। पहले नोटबंदी हुई तो साथ में मुद्राओं के डिजिटलीकरण में तेजी लाने के एलान हुए। लेनदेन के डिजिटल उपाय कारगर होते, इससे पहले बैंकों और सरकार के पास एटीएम और ऑनलाइन धोखाधड़ी की शिकायतों का अंबार लगने लगा। आम जनता आज भी इन सारे आर्थिक सुधारों के रहस्य अभी तक समझ नहीं पाई है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने हाल में कंप्यूटर पर सृजित की जाने वाली आभासी (क्रिप्टो या वर्चुअल) मुद्रा के लेनदेन पर लगी पाबंदी को हटाने का फैसला ले लिया। दो साल पहले यानी साल 2018 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) ने धोखाधड़ी की आशंका के मद्देनजर आभासी मुद्रा के कारोबार पर प्रतिबंध लगाया था। पर अब सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि केंद्रीय बैंक उन कारणों को स्पष्ट नहीं कर सका है, जिनके आधार पर यह प्रतिबंध लगाया गया था।

रातों-रात क्रेडिट, डेबिट कार्डों, एटीएम और खातों से ऑनलाइन धोखाधड़ी कर लोगों के खून-पसीने की कमाई डकार जाने की अनगिनत घटनाओं को देखते हुए जिस पाबंदी को उचित माना जा सकता था, उसे हटाने की समझदारी का आधार क्या है- यह बड़ा सवाल है। लेकिन फिलहाल इससे भी महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अगर जनता का पैसा बैंकों तक में सुरक्षित नहीं है तो वह आखिर उन आभासी मुद्राओं के जंजाल में भला महफूज कैसे रहेगा, जिनके संचालन की बागडोर दुनिया के अंधेरे कोनों में बैठे प्राय: गुमनाम लोगों के हाथों में होती है। यही नहीं, वर्ष 2009 में पहली बार बनाई गई सबसे चर्चित आभासी मुद्रा (कंप्यूटर पर सृजित की जाने वाली मुद्रा) बिटकॉइन के बारे में एक अहम आरोप यह है कि यह दुनिया भर के काले धंधों की सरताज मुद्रा बन गई है और तमाम आर्थिक अपराध इसके जरिए हो रहे हैं। कई किस्से तो बिटकॉइन या दूसरी आभासी मुद्राओं में निवेश को पांव पर कुल्हाड़ी मारने जैसा ठहराते हैं। जैसे, दो साल पहले ही 2018 में कुछ सेंधमारों ने एक चर्चित आभासी मुद्रा में फर्जीवाड़ा कर जापान के एक एक्सचेंज को करीब अड़तीस अरब का चूना लगा दिया था। एशिया में खुद को आभासी मुद्रा के कारोबार का सबसे बड़ा एक्सचेंज बताने वाले कॉइनचेक में हुई इस घटना को 2014 में जापान के ही बिटकॉइन एक्सचेंज में अड़तालीस अरब येन मार लेने की घटना से भी बड़ा पाया गया था।

आभासी मुद्रा को लेकर सबसे बड़ा सवाल अवैध धंधों में इसका इस्तेमाल होना है। चूंकि इसमें लेनदेन करने वालों की कोई जानकारी किसी को नहीं मिल पाती है, इसलिए ज्यादातर सरकारें इस मुद्रा को संदेह की नजर से ही देखती हैं। जैसे- बिटकॉइन का लेनदेन एक खास ब्लॉकचेन प्रक्रिया से होता है। ऐसे में सिर्फ यह पता चलता है कि कोई लेनदेन हुआ है, पर लेनदेन करने वाले लोग कौन हैं, यह जानकारी नहीं मिल पाती। इस तरह सारा लेनदेन सरकारी नियम-कायदों से बाहर और बिल्कुल गुप्त रहता है। यही वजह है कि धनशोधन (काले धन को सफेद में बदलने की प्रक्रिया) में बिटकॉइन जैसी आभासी मुद्राएं काफी मददगार साबित हुई हैं। भारत में मौजूद अपने खाते में रुपए बिटकॉइन में बदलवा कर डाल दिए जाएं और उन्हें दुनिया में कहीं भी जाकर डॉलर में भुना लिया जाए, तो उसकी धरपकड़ नहीं हो सकती। हवाला, कर चोरी, मादक पदार्थों की खरीद-फरोख्त, सेंधमारी और आतंकी गतिविधियों में बिटकॉइन के बढ़ते इस्तेमाल से अर्थशास्त्रियों से लेकर सुरक्षा एजंसियों और सरकारों तक की नींद उड़ती रही है। ऐसे में बिटकॉइन या लाइटकॉइन आदि डिजिटल मुद्रा में हुए लेनदेन का सामान्य संचार नियमों (कम्युनिकेशन प्रोटोकॉल) और पोर्टिंग के जरिए पता लगाना बेहद मुश्किल है।

भारत में ही ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे बिटकॉइन का अवैध कारोबारों में इस्तेमाल का खुलासा हुआ था। जुलाई, 2016 में देश में नशीले पदार्थों की तस्करी पर नजर रखने वाली कानूनी व खुफिया एजेंसी एनसीबी (नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो) ने दो तरह की आपराधिक प्रणालियों को प्रतिबंधित किया था, जिनमें से एक बिटकॉइन से जुड़ा हुआ था। एनसीबी ने बताया था कि नशीली दवाओं का कारोबार ‘डार्कनेट’ और अवैध मुद्रा बिटकॉइन के जरिए अंजाम दिया जा रहा है। इसी तरह 2017 में जब दुनिया में वानाक्राई नामक कंप्यूटर वायरस का हमला हुआ, तो इसके पीछे मौजूद साइबर हमलावरों ने एक सौ पचास देशों के करीब तीन लाख कंप्यूटरों को अपने कब्जे में लेकर उन्हें छोड़ने के बदले में भारी फिरौती बिटकॉइन में मांगी थी। हैकरों की मांग थी कि उन्हें प्रति कंप्यूटर तीन सौ बिटकॉइन प्रति की दर से भुगतान किया जाए। वर्ष 2016 में अंतरराष्ट्रीय सेंधमारों के एक गिरोह ने भारत के तीन बैंकों और एक दवा कंपनी के कंप्यूटरों को अपने कब्जे में लेकर छोड़ने के बदले बिटकॉइन के रूप में लाखों डॉलर वसूले थे।

यही वे चिंताएं थीं, जिनके मद्देनजर भारत सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने बिटकॉइन आदि आभासी मुद्रा में कारोबार को गैरकानूनी करार दिया था। हालांकि इस बीच यह जानकारी भी प्रकाश में आ चुकी है कि सरकारी कायदों से बाहर 2017 में देश में करीब ढाई हजार लोगों ने बिटकॉइन में पैसा लगाया है। एक आकलन बताता है कि भारत में करीब तीस हजार लोगों के पास बिटकॉइन हैं, जो पूरी दुनिया में प्रचलित बिटकॉइन का एक फीसद हिस्सा है। इन सारी घटनाओं को ध्यान में रखें तो 2018 में देश में बिटकॉइन व दूसरी आभासी मुद्रा पर लगाई गई पाबंदी उचित ही लगती है। यह पाबंदी बेमानी नहीं थी, इसे रिजर्व बैंक ने बाकायादा एक परिपत्र जारी कर लगाया था। रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया था कि ऐसी मुद्राएं कालेधन को बढ़ावा देती हैं और इनका इस्तेमाल आतंकियों को पैसा पहुंचाने जैसे काम में हो सकता है। हालांकि बाद में इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आइएमएआइ) ने एक याचिका दाखिल कर इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी। इस पर हुई सुनवाई के बाद सर्वोच्च अदालत में रिजर्व बैंक के फैसले को यह कहते हुए पलट दिया है कि केंद्रीय बैंक प्रतिबंध को जायज ठहराने वाले तर्कों को सही साबित नहीं कर पाया है।

दुनिया में जितनी भी मुद्राएं हैं, उन पर किसी न किसी बैंक या सरकार का नियंत्रण है। बैंकों और सरकारों की साख और अर्थव्यवस्था की ताकत के हिसाब से उनकी मुद्राओं का मूल्य तय होता है। पर आभासी मुद्रा तो इन सारे नियम-कानूनों से परे है। इन्हें न तो हकीकत में कागज या सिक्कों के रूप में मुद्रित किया अथवा ढाला जा सकता है, न ही इन पर किसी बैंक या सरकार का नियंत्रण या अधिकार होता है। सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि इन मुद्राओं की शुरुआत एक छल के साथ हुई थी। वर्ष 2009 में जब दुनिया का पहला बिटकॉइन बना तो इसे लेकर लंबे समय तक रहस्य बना रहा कि आखिर इसका सर्जक कौन है। दावा किया जाता था कि इसका आविष्कारक सातोशी नाकामोतो नामक शख्स है, लेकिन यह व्यक्ति कभी सामने नहीं आया। अरसे बाद एक ऑस्ट्रेलियाई उद्योगपति क्रेग राइट ने दावा किया कि वही बिटकॉइन के निर्माता हैं और उन्होंने ही अपना छद्म नाम सातोशी नाकामोतो रखा था। दूसरा बड़ा छद्म यह है कि किसी भौतिक स्वरूप (कागज के नोट या सिक्कों) की बजाय कंप्यूटर पर बनाई और खरीद-फरोख्त की जाने वाले खुफिया कोड रूपी ये मुद्राएं किस दिन दुनिया से गायब हो जाएंगी, कोई नहीं जानता। समझना होगा कि जब आर्थिक लेनदेन के वास्तविक प्रबंधों (बैंकिंग आदि) का हमारे देश में बाजा बजा हुआ है, ऐसे में अगर किसी आभासी मुद्रा के चलन को हरी झंडी दिखाई जाती है, तो कहीं मामला हजार छेदों वाली गठरी की रही-बची साख गंवाने का न बन जाए।

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