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राजनीति: आदिवासियों के अधिकारों की राह

आजादी की लड़ाई में गांधी के सत्याग्रह से लेकर सविनय अवज्ञा जैसे प्रभावशाली आंदोलनों को देश के विभिन्न इलाकों के आदिवासियों ने भरपूर समर्थन दिया। लेकिन आजादी हासिल होने के ठीक पहले जब व्यवस्था की बुनियाद रखने का काम हो रहा था तब दुर्भाग्यवश आदिवासियों की तरफदारी करने वाले कोई ज्यादा लोग नहीं थे।

Author Published on: May 22, 2019 1:14 AM
प्रावधानों के बावजूद आदिवासी हक और हकूक के सवाल पर वंचित क्यों रह जाते हैं?

अमरेंद्र किशोर

एक लंबी लड़ाई के बाद आदिवासियों के हकों के सवाल पर 2005 में जब सरकार सहमत हुई तो वन अधिकार कानून अस्तित्व में आया। लेकिन इसमें भी कई अड़चनें और पेचीदगियां थीं। इसलिए इस कानून को संशोधन के बाद 2009 में पारित किया गया। कहा गया कि इससे आदिवासियों को जंगलों में जाने और वनोपज जुटाने का अधिकार मिल गया है। मगर इसमें आदिवासी समुदाय के साथ एक बड़ा अन्याय यह हुआ कि उसे पर्याप्त जमीन नहीं दी गई और आदिवासियों को कई तरह के फर्जी मुकदमों में फंसाया गया। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जहां एक ओर देश में दलितों के हितों को लेकर बने कानून को सख्ती से लागू करने की होड़ मच जाती है वहीं तमाम प्रावधानों के बावजूद आदिवासी हक और हकूक के सवाल पर वंचित क्यों रह जाते हैं?

इस संबंध में देश के राजनीतिक गलियारों में झांक कर एक दबे-कुचले सच का मुआयना किया जाना चाहिए। 1952 के प्रथम आम चुनाव के वक्त से ट्राइबल रिजर्व सीट या आदिवासी मतदाताओं के निर्णय की परवाह अमूमन किसी भी राजनीतिक दल ने नहीं की थी। आज भी इस सहज उपेक्षा का राष्ट्रीय भाव उस देसी राजनीति को दूर धकेल देता है। इसी माहौल में संसदीय बहस में आदिवासी सांसदों की लगातार चुप्पी राजनीति में पसरे एक युगीन कड़वे सच की ओर इशारा करती है। इस सबके बावजूद यह भी सच है कि पहाड़ों का लोकमानस अपने मन-मिजाज के साथ जीने वाले समाज का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए उसे राजसत्ता के प्रसंग में किसी भी सूरत में कमतर आंक कर आदिवासी हितों के सवाल पर चुप्पी साध ली जाती है। खास तौर से मध्यप्रदेश, उत्तर-पूर्व राज्यों के साथ झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडीशा और गुजरात के अलावा महाराष्ट्र का आदिवासी जनादेश केंद्र में सरकार बनाने में सक्षम होने के बावजूद भारतीय राजनीति में अपेक्षित तरजीह नहीं पा सका है।

एक बात और महत्त्वपूर्ण है कि गुजरे दो दशकों में पहाड़ों और जंगलों के रहवासी समाज के हालात बदलने के चलते परंपरागत प्रवृत्ति में खासा बदलाव आया है। नए राज्यों के निर्माण से देश के तीन राज्यों झारखंड-छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में राजनीति का नवयुग आया है। इन राज्यों के आदिवासी बहुल इलाकों में जनादेश या तो भावातिरेक से भरा होता है या स्थानीय स्तर का राजनीतिक संकट राष्ट्रीय राजनीति को दरकिनार करने से बाज नहीं आता। ध्यान देने की बात यह भी है कि इन इलाकों के मुद्दे देखते ही देखते कई बार राष्ट्रीय प्रसंग में तब्दील हो जाते हैं। इन तमाम महत्ताओं के बावजूद आदिवासियों के मताधिकार और उसके प्रयोग की प्रासंगिकता को लेकर तरह-तरह के सवाल पैदा होते रहे हैं जिनकी अपनी रोचकता भी है और इससे जुड़े कुछ सवाल भी हैं। कैसी विडंबना है कि जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रावधानों की हम दुहाइयां देते हैं उस व्यवस्था के नीति-नियमन के निर्माण के दौर में आदिवासियों की कथित असभ्यता, क्रूरता और जाहिलता का बहाना बना कर उन्हें जनादेश के जश्न से दूर रखने की सिफारिश कानून निर्माताओं ने की थी।

आजादी के शुरुआती सालों में पंडित नेहरू विकास का फेबियनवादी मॉडल लेकर गांवों में गए तो आदिवासियों ने सरकार को करीब से देखा। इससे पहले वे गोरों के दमन-दबाव और दोहन से भरे क्रूर चेहरों से परिचित थे। नेहरू सोनभद्र के एक बीजपुर गांंव ही नहीं बल्कि उसके जैसे कई गांवों में पहाड़ों और जंगलों के लोगों को राष्ट्र के विकास के लिए जल-जंगल-जमीन देने की गुजारिश करते दिखे। नेहरू को उन तमाम आदिवासी सांसदों पर भरोसा था जो देश के मूल वाशिंदों के प्रतिनिधि थे। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर आश्रित भारत को ग्रामीण स्वराज में बदलने की तत्परता सरकार का एक व्यावहारिक फैसला था, जिसके सूत्रधार वन्य इलाकों से जीत कर आए वे सांसद थे, जो आदिवासियों के अंतर्मन में सरकार की मंशाओं और सदिच्छाओं की सही और सकारात्मक तस्वीर पेश कर रहे थे। इसी क्रम में गुमनामी की जिंदगी जीते आदिवासी राष्ट्रीय बहस-मुबाहिसों के साझीदार भी बने। नेहरू किसी भी सूरत में वन्य समाज को नाराज नहीं होने देना चाहते थे। उन्हें पता था कि आदिवासियों की भलमनसाहत और रजामंदी से ही बांधों और चिमनियों का संजाल देश में बिछाया जा सकता है।

आजादी की लड़ाई में गांधी के सत्याग्रह से लेकर सविनय अवज्ञा जैसे प्रभावशाली आंदोलनों को देश के विभिन्न इलाकों के आदिवासियों ने भरपूर समर्थन दिया। लेकिन आजादी हासिल होने के ठीक पहले जब व्यवस्था की बुनियाद रखने का काम हो रहा था तब दुर्भाग्यवश आदिवासियों की तरफदारी करने वाले कोई ज्यादा लोग नहीं थे। जवाहरलाल नेहरू, हरेंद्र कुमार मुखर्जी और गोपीनाथ बरदिलोई संसद में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व के हिमायती थे जबकि आज की अनुसूचित जातियों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के तमाम प्रयासों और मुहिम में आदिवासियों को शामिल करने को लेकर व्यापक वाद-प्रतिवाद चल रहा था। इसी जटिलता की वेला में जाति को जनजाति से अलग कर देखने की वजह से अनेक पूर्ववर्तियों की तर्ज पर तत्कालीन दलित नेता कथित ‘सभ्यों’ और ‘असभ्यों’ के बीच दीवार खड़ी करने से बाज नहीं आये। जनगणना रिपोर्ट से जानकारी मिलती है कि अनुसूचित जातियों में शिक्षा को लेकर हालात अपेक्षया बदतर थे और युगीन अस्पृश्यता के चलते वे लोकतांत्रिक तो क्या मानवाधिकार तक के लिए तरस रहे थे। इसी कारण साइमन कमीशन से दलितों को मताधिकार देने की वकालत की गई थी लेकिन देश के पर्वतों और जंगलों के रहवासी आदिवासियों को मताधिकार से वंचित रखे जाने की बात कहने से भारी बखेड़ा पैदा हो गया। संविधान निर्माताओं के एक वर्ग का मानना था कि ‘आदिवासी, मताधिकार पाने के योग्य नहीं हैं।’ इसलिए जहां स्टूच्येटरी कमीशन के लिए संपत्ति पर मालिकाना हक, मताधिकार के लिए आवश्यक था वहीं उस वर्ग विशेष की दृष्टि में, चूंकि आदिवासी जंगली और असभ्य थे, इसलिए वे मताधिकार पाने के योग्य नहीं थे।

जानकारों का मानना है कि आंबेडकर आदिवासियों के सामाजिक और राजनीतिक हालात से परिचित थे। उनके निशाने पर वे तमाम राजा-रजवाड़े थे जिनके रैयत बन कर स्थानीय आदिवासी जैसे-तैसे जी रहे थे। यहां तक कि मध्य प्रांत के राजाओं ने स्थानीय आदिवासी समाजों के अपराधीकरण में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी। आंबेडकर को शक था कि राजाओं की गुलामी ओढ़े आदिवासी अपने विवेक का इस्तेमाल किए बिना जब मताधिकार का प्रयोग करेंगे तो जीत सामंती ताकतों की होगी। वे सत्ता के शीर्ष को राजशाही से मुक्त रखने के पक्षधर थे। इसी वजह से सन 1929 में साइमन आयोग के समक्ष यह पक्ष रखा गया कि ‘आदिम जनजातियों में अब तक इतनी राजनीतिक समझ विकसित नहीं हो सकी है कि वे उन्हें उपलब्ध राजनीतिक अवसरों का उचित इस्तेमाल कर सकें और वे किसी भी बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक समुदाय के हाथों का खिलौना बनकर, खुद का कुछ भी भला किए बगैर, संतुलन को बिगाड़ सकती हैं।’
आंबेडकर के इस नजरिये को लेकर जम कर हंगामा हुआ। संविधान सभा में आदिवासी प्रतिनिधि जयपालसिंह मुंडा ने आक्रोश के साथ कहा था कि ‘मेरे आदिवासी लोग पिछले 6,000 वर्ष से उपेक्षित और कुचले गए हैं। उन्हें अपमान भरा जिल्लत का जीवन जीने के लिए विवश किया गया है। गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासियों को प्राचीन काल से निर्वासित जीवन जीने के लिए विवश किया गया है।’ प्रो एमएल गरासिया ने भी जयपाल सिंह की बात का समर्थन किया था लेकिन इन मांगों और आरोपों को विभिन्न दलीलों के जरिए ठुकरा दिया गया।

हालांकि यह आज तक जिज्ञासा का विषय है कि जब जयपालसिंह मुंडा ने संविधान में आंबेडकर के समक्ष आदिवासियों के लिए ‘आदिवासी’ शब्द का प्रयोग किए जाने की मांग की थी तो इस मांग को नहीं मानने के पीछे आखिरकार कैसी लाचारी थी? क्या वर्ग विशेष को महारों और दलितों का महत्त्व जागरूक और शिक्षित हो रहे आदिवासियों के मुकाबले कम हो जाने का भय था? क्या इसी कारण संविधान में ‘आदिवासी’ शब्द की मांग को ठुकरा दिया गया। देश भर के आदिवासियों को मताधिकार नहीं देने के पीछे जो दलीलें परोसी गर्इं, क्या शिक्षा पर अपनी पकड़ जमाते आदिवासियों के लिए यह न्यायसंगत होता? संविधान में अपनी मूल पहचान से वंचित होते आदिवासियों का सवाल है कि ‘आज अगर हम भारतवर्ष के ‘आदिवासी’ होने की गरिमा से संविधान में वंचित हैं तो उसके जिम्मेदार कौन हैं?’

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