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राजनीति: शहरीकरण की चुनौतियां

शहरीकरण अपने आप में कभी समाप्त न होकर निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और विभिन्न नीतियों में समय-समय पर बदलाव आदि के कारण और आर्थिक तथा ढांचागत साधनों की आसानी से उपलब्धता नहीं होने के कारण भी इस प्रकार की परियोजनाओं को लागू करने में देरी होती है।

Author June 6, 2019 1:08 AM
शहरों का अपना आकर्षण है, वहीं दूसरी ओर शहरों की अपनी गंभीर समस्याएं भी हैं।

मुकेश पोपली

शहर हमेशा से ही आकर्षक रहे हैं। हर आदमी शहर में जाकर बसना चाहता है। आखिर शहरों में ऐसा क्या है जो गांवों में नहीं है? कहा जाता है कि आधुनिकीकरण के प्रति आकर्षण, उच्च शिक्षा, रोजगार की उपलब्धता, चिकित्सा सुविधाओं आदि के कारण हर कोई शहरों में रहना चाहता है। जहां एक ओर शहरों का अपना आकर्षण है, वहीं दूसरी ओर शहरों की अपनी गंभीर समस्याएं भी हैं, जैसे वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, बढ़ती भीड़, सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का घोर अभाव, बुनियादी सेवाओं का खस्ताहाल ढांचा आदि। इन समस्याओं से शहरों का विकास पीछे छूट गया है, वे तेजी से नरक बनते जा रहे हैं। शहरीकरण की सबसे बड़ी समस्या है कि एक कम क्षेत्र में अधिक से अधिक आबादी का रहना, जिसके लिए शहर में जगह समाप्त होती जा रही है। एक के ऊपर एक भवन बन कर तैयार होते हैं, लेकिन गांवों जैसा शुद्ध वातावरण फिर भी नदारद रहता है। प्रसिद्ध समाज शास्त्री राबर्ट रेडफील्ड मानते हैं कि शहरी समाज की विशेषताओं में प्रमुख रूप से वृहद जनसंख्या होती है और साथ ही उसका दूसरे समाजों से व्यापार और संचार के माध्यम से निकट का संबंध होता है, उसमें एक जटिल श्रम-विभाजन भी होता है।

इसके आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि शहरों में प्रारंभ से ही भीड़-भाड़ रही है। धीरे-धीरे ज्यादातर गांव और कस्बे भी शहरों का रूप धारण करते जा रहे हैं। चौड़ी सड़कें, बहुमंजिला इमारतें, बड़े-बड़े बाजार, आधुनिक यातायात सुविधाएं, उद्योग-धंधे, आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित अस्पताल, शिक्षण-संस्थान आदि किसी भी शहर की विशेषता हैं। लेकिन दूसरी ओर गांवों और कस्बों में छोटी-छोटी दुकानें, पालतू पशु, कच्चे-पक्के घर, खेत-खलिहान, कुएं और नहरें आदि उपलब्ध हैं। यदि तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तब अंतर तो साफ दिखाई देता है। लेकिन, शहर हो या गांव, दोनों ही भारत की अर्थव्यवस्था के मुख्य अंग हैं और दोनों का ही अपना-अपना महत्त्व है।

विज्ञान के साधनों ने आज व्यक्ति के जीवन को बहुत आसान बना दिया है। बहुत सारा काम मशीनों से होने लगा है। यह शहरीकरण का ही नतीजा है कि आज का बचपन जल्दी किशोरावस्था और किशोरावस्था शीघ्र ही युवावस्था की ओर अग्रसर है। संचार साधनों में नित्य-प्रति नई क्रांति देखने को मिल रही है। रेडियो, दूरदर्शन, समाचार पत्रों आदि के साथ-साथ सोशल मीडिया भी आज आसानी से उपलब्ध है। गांवों में थोड़े भी पढ़े-लिखे युवा खेती से मुंह मोड़ रहे हैं। बिजली, पानी, लकड़ी, लोहा, कुटीर उद्योग आदि में महारत हासिल करने के लिए हर युवा शहर की ओर भागता नजर आता है। गांव में कमाई के साधन बहुत कम होते हैं और आमदनी कम होने के कारण बहुत से लोग आत्मनिर्भर नहीं बन पाते। ऐसे में गांव के मेहनतकश लोग न चाहते हुए भी रोजगार की तलाश में शहर आते हैं और फिर वहीं बस जाते हैं।

आधुनिक युग पुरातन परंपराओं को पीछे छोड़ आगे बढ़ना चाह रहा है। शहरों की चकाचौंध से हर व्यक्ति आकर्षित है। शहर के सेवा संस्थानों, शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों आदि में पिछले तीस वर्षों में अनेक आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होने से प्रत्येक नागरिक शहर में आना चाह रहा है। देश में औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा देने के लिए शहरों के आसपास की जमीन को ऊंचे दामों पर खरीदा जा रहा है और साथ ही आवास समस्या से निपटने के लिए भी जमीन को उनके पुराने मालिकों से खरीदा गया है। बड़े-बड़े राजमार्गों, हवाई अड्डों के निर्माण के लिए भी अनेक शहरों में योजनाओं को कार्यान्वित किया गया है। सरकार ने शहरों को और आधुनिक बनाने के लिए ‘स्मार्ट सिटी’ की मुहिम छेड़ दी है। पूरे देश में नब्बे शहरों को ‘स्मार्ट सिटी’ बनाने के लिए विभिन्न परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है। इन स्मार्ट शहरों में वे तमाम सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है जिनसे देश आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में समान रूप से और निरंतर विकास कर सके। यद्यपि अभी भी यह कार्य रेंगती हुई गति से ही हो रहा है।

एक अनुमान के अनुसार स्मार्ट सिटी की लगभग तीन हजार योजनाओं में से केवल एक सौ पचास योजनाएं मूर्त रूप ले सकी हैं। शहरीकरण अपने आप में कभी समाप्त न होकर निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है और विभिन्न नीतियों में समय-समय पर बदलाव आदि के कारण और आर्थिक तथा ढांचागत साधनों की आसानी से उपलब्धता नहीं होने के कारण भी इस प्रकार की परियोजनाओं को लागू करने में देरी होती है। आजादी के समय भारत की कुल जनसंख्या के लगभग अस्सी फीसद लोग गांवों में निवास करते थे। भारतीय अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर थी। देश को प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए उद्योग-धंधे और कल-कारखानों की स्थापना की जाने लगी थी। भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए समय-समय पर अनेक उपाय किए जाते रहे। कृषि में भी पूर्ण आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए श्वेत क्रांति और हरित क्रांति ने जोर पकड़ा और ये दोनों क्रांतियां अपने उद्देश्यों में सफल रहीं।

आजादी के सात दशक बाद भी लगभग साठ फीसद आबादी का मुख्य आजीविका साधन खेती ही है। लेकिन ग्रामीण आबादी घट कर लगभग उनहत्तर प्रतिशत पर आ गई है। ग्रामीण आबादी का कम होना बता रहा है कि शहरों पर बोझ बढ़ा है। शहरी आबादी बढ़ने से शहरों में अनेक प्रकार की समस्याएं जन्म ले चुकी हैं और आवासीय समस्या के साथ-साथ ग्लोबल वार्मिंग, प्रदूषण आदि समस्याओं ने शहरी जीवन को लीलना शुरू कर दिया है। शहरों और महानगरों में आवास की समस्या बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। सबके लिए आवास उपलब्ध कराना गंभीर समस्या है। शहरों और महानगरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। एक तरफ अट्टालिकाओं का निर्माण किया जा रहा है तो दूसरी तरफ एक से सटे एक छोटे-छोटे मकानों में चार-चार परिवार रहने लगे हैं। ये वही लोग हैं जो फैक्ट्रियों, कारखानों आदि में या फिर कोई अन्य छोटा-मोटा काम करके जीवन-यापन करते हैं।

शहरीकरण की समस्या बढ़ने के साथ ही अपराध भी तेजी बढ़े हैं। एक तरफ पैसे के लालच में अपहरण और छीना-झपटी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं तो दूसरी ओर महिलाओं से छेड़छाड़ व अन्य अपराध, बाल-तस्करी जैसी घटनाएं भी तेजी से बढ़ी हैं। साथ ही मादक पदार्थों का कारोबार तेजी से फलफूल रहा है। यदि गौर किया जाए तो हम पाएंगे कि शहरीकरण से उत्पन्न अनेक समस्याओं के पीछे मूल कारण आवास ही है। यदि नगरों का योजनाबद्ध विकास किया जाए और साथ ही पुरानी योजनाओं को आवश्यकतानुसार परिवर्तित किया जाए तो इन समस्याओं को दूर किया जा सकता है। दरअसल, आवास समस्या के कारण ही जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, यातायात समस्या, स्वास्थ्य समस्या, पर्यावरण समस्या आदि पैदा होती हैं। चरणबद्ध योजना के निर्माण और उसके अनुपालन से इस प्रकार की समस्याओं से निजात पाई जा सकती है।

अंतत: यह कहा जा सकता है कि विश्व की अर्थव्यवस्था में भी अपना दबदबा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि शहरीकरण में वृद्धि हो। उद्योग-धंधे और सेवा क्षेत्र दोनों का विकास आवश्यक है। सरकारी नीतियों को समयबद्ध तरीके से लागू करने और ढांचागत परियोजनाओं को शीघ्रता से पूरा करने के लिए गंभीर चिंतन होना चाहिए। जनता की भागीदारी और सरकार के समन्वित प्रयासों से सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए वृहदस्तरीय परिवर्तनों से शहरीकरण की परियोजनाओं को आगे बढ़ाना होगा ताकि हमारा देश भी विश्व के विकसित राष्ट्रों में शामिल हो सके।

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