ताज़ा खबर
 

राजनीति: शिक्षा की गुणवत्ता और सवाल

भारत में प्राथमिक शिक्षा शुरू से उपेक्षित रही है। यहां शिक्षा के प्राथमिक स्तर को दरकिनार किया जाता है। इसका उदाहरण देश के तमाम राज्यों मे देखा जा सकता है। प्राय: ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं जब इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक तक देश के प्रधानमंत्री का नाम नहीं बता सके। जाहिर है, जैसी शिक्षा दी जाएगी, बच्चों का विकास भी वैसा ही होगा।

देश में नौकरी की संख्या कम होती जा रही है।

लालजी जायसवाल

भारत में शिक्षा क्षेत्र की स्थिति संतोषजनक नहीं है। उच्च शिक्षा क्षेत्र में लगातार गिरावट यह प्रदर्शित करती है कि भारत में अभी भी विशेष शैक्षणिक सुधार की आवश्यकता है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016-17 के दौरान स्कूली शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक में देश के बीस बड़े राज्यों में केरल शीर्ष स्थान पर रहा, जबकि इसके बाद राजस्थान और कर्नाटक क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे। रिपोर्ट के अनुसार सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य उत्तर प्रदेश इस मामले में सबसे निचले पायदान पर है। ‘द सक्सेस आफ आवर स्कूल्स- स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स’ (एसईक्यूआइ) में 2016-17 को संदर्भ वर्ष और 2015-16 को आधार वर्ष के रूप में माना गया है। इस सूचकांक को स्कूल शिक्षा क्षेत्र में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करने के लिए विकसित किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार छोटे राज्यों में मणिपुर, त्रिपुरा और गोवा को क्रमश: पहला, दूसरा और तीसरा स्थान मिला है। इसके बाद मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश का स्थान आता है।

आज भी शिक्षा के स्तर में कोई विशेष सुधार प्रतिबिंबित नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि कुछ वर्षों पहले जिन राज्यों का जो स्थान था, आज भी वे राज्य उन्हीं स्थानों पर बने हुए हैं। इसीलिए आज उच्च शिक्षा के स्तर में भी लगातार गिरावट आ रही है। इसकी जड़ें प्राथमिक शिक्षा में निहित हैं। जब तक प्राथमिक शिक्षा में सुधार नहीं लाया जाएगा, तब तक उच्च शिक्षा की गुणवत्ता को सुधार पाना संभव नहीं है। यदि प्राथमिक शिक्षा के स्तर की गुणवत्ता में सुधार कर लिया जाए, तो उच्च शिक्षा की दशा और दिशा में सुधार का रास्ता आसान हो सकता है। स्कूली शिक्षा की स्थिति चिंताजनक है। देश भर में लगभग अस्सी लाख बच्चे छह से चौदह वर्ष की आयु वर्ग में शामिल हैं जो स्कूल नहीं जा पाते हैं। लाखों बच्चे बीच में ही स्कूल छोड़ देते हैं। इसलिए सवाल उठता है कि आखिर क्या कारण हैं कि हम स्कूली शिक्षा की समस्याओं से निपट पाने में नाकाम रहे हैं।

शिक्षा सुधार के उपायों की दिशा में हमें अन्य देशों के मॉडलों से सीख लेने की जरूरत है। शिक्षा स्तर में सुधार की एक तरकीब दक्षिणी कोरिया और फिनलैंड से ली जा सकती है, क्योंकि इन देशों में प्राथमिक शिक्षा पर विशेष जोर दिया जाता है। इन देशों में शिक्षा के क्षेत्र सबसे खास बात यह है कि प्राथमिक शिक्षकों का वेतन एक प्रोफेसर के वेतन से भी अधिक होता है। ऐसा मानना है कि अगर शिक्षा की नींव अर्थात निचला स्तर मजबूत कर दिया जाए तो उच्च स्तर पर कोई विशेष परिश्रम नही करना होगा। इसी कारण इन देशों की शिक्षा व्यवस्था ‘नीचे से ऊपर’(डाउन टू टॉप) मॉडल पर आधारित है। लेकिन भारत मे ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बन सकी है। भारत में प्राथमिक शिक्षा शुरू से उपेक्षित रही है। यहां शिक्षा के प्राथमिक स्तर को दरकिनार किया जाता है। इसका उदाहरण देश के तमाम राज्यों मे देखा जा सकता है। प्राय: ऐसी अनेक घटनाएं हुई हैं जब इन स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षक तक देश के प्रधानमंत्री का नाम नहीं बता सके। जाहिर है, जैसी शिक्षा दी जाएगी, बच्चों का विकास भी वैसा ही होगा। ऐसे ही तमाम कारणों से प्राथमिक शिक्षा क्षेत्र एक तरह से चौपट हालत में पहुंच गई है।

आज सरकारी शैक्षिक संस्थाओं में शिक्षा की घटती गुणवत्ता ने देश के भविष्य को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जिसके दोनों और खाई है। देश के लगभग सत्तर प्रतिशत युवा आज भी सरकारी शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे हैं, लेकिन शैक्षिक स्तर का निरंतर पतन मानवीय क्षमता को प्रभावित कर रहा है। शिक्षा के स्तर में आई गिरावट का एक बड़ा कारण शिक्षकों की अनुपस्थिति भी है। इससे केवल सरकारी पैसों का दुरुपयोग हुआ है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति वर्ष होने वाले इस नुकसान का अनुमान दो अरब डॉलर है। विद्यालयों के प्रत्येक स्तर पर शिक्षकों की अनुपस्थिति का यही हाल है। इसमें वंचित वर्ग के युवाओं को सबसे अधिक नुकसान होता है। अध्यापन में शिक्षकों की बढ़ती उदासीनता देश के भविष्य को अंधकार की ओर धकेल रही है। इसका परिणाम यह हुआ है कि युवा सिर्फ डिग्री ले रहे हैं और ज्ञान के मामले में पिछड़ते जा रहे हैं। पर्याप्त ज्ञान और कौशल का अभाव भी बेरोजगारी का एक बड़ा कारण है।

एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि पिछले साल लगभग एक करोड़ रोजगार के अवसर कम हुए हैं। निश्चित ही यह देश के लिए बड़ा नुकसान है। एक और गंभीर चिंता का विषय यह भी है कि आज उच्च स्तरीय रोजगार के अवसर भी कम होते जा रहे हैं। आॅल इंडिया सर्वे आॅन हायर एजुकेशन की रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2015-2016 से उच्च शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की भर्ती में भारी गिरावट आई है। पिछले तीन वर्षों में आरक्षित स्थायी पदों में यह गिरावट सबसे ज्यादा देखने को आई है। रोजगार के शैक्षिक स्तर में अनुकूल बढ़ोतरी न हो पाने से लोगों का शिक्षा के प्रति रुझान कम हुआ है। वर्ष 2018 के उत्तरार्ध में पचपन फीसद से अधिक कार्यरत युवाओं ने दसवीं की शिक्षा तक भी पूरी नहीं की थी। इसलिए बेरोजगारी का प्राथमिक और उच्च शिक्षा से गहरा संबंध है।
अधिकतर विकसित देशों में प्रत्येक विद्यार्थी के हिसाब से अनुदान दिया जाता है। इससे विद्यालय और शिक्षकों दोनों की ही एक जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे अच्छी शिक्षा देकर ज्यादा से ज्यादा विद्यार्थियों की भर्ती करें, क्योंकि प्रत्येक विद्यार्थी के साथ विद्यालय के अनुदान का कुछ भाग दांव पर लगा होता है। साथ ही अंतर्विद्यालय प्रतियोगिता के जरिए विभिन्न विद्यालयों के बच्चों के शैक्षणिक स्तर को जांचा जा सकता है। इन प्रतियोगिताओं की समस्त जानकारी को वेबसाइट के माध्यम से अभिभावकों तक पहुंचाया जा सकता है। दरअसल हमारी शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा दोष यह रहा है कि हम शिक्षकों को उत्तरदायी नहीं बना पाए हैं। एक निश्चित पैटर्न पर अपना पाठ्यक्रम पूरा करवा कर वे छुट्टी पा लेते हैं। अत: राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे में शिक्षकों के उत्तरदायित्वों को बढ़ाने की महती आवश्यकता है।

शिक्षकों को जवाबदेह बनाने के लिए कुछ विदेशी मॉडलों को अपनाया जा सकता है। जैसे वाउचर प्रणाली को लागू करना। इसमें अभिभावकों को एक बाउचर दिया जाता है। अगर वे स्कूल के शिक्षकों से संतुष्ट हैं तो वे वाउचर को स्कूल या शिक्षक के खाते में जमा कर सकते हैं। अन्यथा अभिभावक अपने बच्चे को उस स्कूल से निकाल कर दूसरे स्कूल में भर्ती करवा सकते हैं। आर्थिक नुकसान के डर से स्कूल और शिक्षक दोनों ही उत्तरदायित्व के साथ काम करेंगे। वाउचर प्रणाली से निजी विद्यालयों में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग को अपने लिए आरक्षित पच्चीस प्रतिशत सीटों का लाभ भी मिल सकेगा। इसलिए शिक्षकों को उत्तरदायित्वों की सीमा में बांधना स्कूल में उनकी अनुपस्थिति को सुनिश्चित करेगा।

सरकार को चाहिए कि बोर्ड परीक्षा दसवीं के बजाय ग्यारहवीं में ले और बारहवीं को विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए तैयारी का वर्ष बनाया जाए। इस प्रकार की व्यवस्था से विद्यार्थियों की समीक्षात्मक क्षमता और आलोचनात्मक सोच, शोध तथा अनुसंधान जैसे गुणों से लैस किया जा सकेगा, जो उनकी उच्च शिक्षा में गुणवत्ता ला सकेगा। इसी से उनकी आगे की जिंदगी भी सफल और सार्थक बन सकेगी। अगर राजनीतिक इच्छा शक्ति प्रबल हो तो शिक्षा के क्षेत्र में बहुत से सुधार करके उसकी गुणवत्ता को सुधारा जा सकता है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीति: वायु प्रदूषण से निपटने की चुनौती
2 राजनीति: फिर सच साबित हुए आइंस्टीन
3 शख्सियत: आरके नारायण
टीम इंडिया का AUS दौरा
X