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राजनीति: अंकों के बोझ तले दबती प्रतिभा

वर्तमान अंकीय प्रकृति वाली प्रणाली को बढ़ावा देने वाली परीक्षा व्यवस्था कहीं न कहीं बच्चों के स्वतंत्र और मौलिक चिंतन के संवर्द्धन में मददगार साबित होने की बजाय हानिकारक ही साबित हो रही है। सिर्फ अंकों के पहाड़ खड़ा करना हमारा मकसद न हो, बल्कि अंकों के साथ ही उसी के अनुपात में बच्चों को अपने विषयों की समझ भी विकसित हो।

Author May 14, 2019 2:04 AM
बीते दिनों ही सीबीएसई कक्षा 12 का रिजल्ट जारी हुआ। फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

कौशलेंद्र प्रपन्न

ज्यादातर शिक्षाविदों का मानना है कि अंकों की बाढ़ को देखते हुए हमें मूल्यांकन पद्धति का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। बच्चों के मूल्यांकन की परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय और वैधता प्रदान करने के लिए हमें प्रयास करने होंगे। सौ फीसद अंक हासिल करने की प्रवृत्ति को समझने की कोशिश करें तो बात यही निकल कर आती है कि हम कैसे प्रश्नपत्र बनाते हैं और किस प्रकार के उत्तरों के मॉडल हमने तैयार किए हैं। इस मॉडल में बच्चे शत-प्रतिशत ऐसे हासिल करते हैं कि वे रटे हुए तथ्यों को याद कर पुनर्प्रस्तुत कर देते हैं और उन्हें परीक्षा में सौ फीसद अंक मिल जाते हैं। इस प्रक्रिया में सृजनशीलता और मौलिक चिंतन कहीं पिछड़ जाता है। जीत उसकी होती है जिसकी रटने की क्षमता और कुशलता ज्यादा है।

इस समस्या से निपटने का एक रास्ता यह हो सकता है कि हम प्रश्नपत्रों के निर्माण और उत्तर के मॉडल को नए सिरे से गढ़ा जाए। वर्ष 2008-09 के आसपास केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएससी) के प्रश्नपत्रों का स्वरूप बदला गया था। इससे पूर्व सवालों की प्रकृति विश्लेषणात्मक होती थी। यानी वे प्रश्नपत्र लेखन, चिंतन, सृजनशील और बच्चों की दक्षता व कौशल का भी मूल्यांकन करता था। दीगर बात है कि तब इस प्रकार के प्रश्नपत्र पर देश भर में चर्चा हुई कि बच्चे प्रश्नपत्रों और परीक्षा में फेल होने की वजह से आत्महत्याएं कर रहे हैंं। शिक्षाविदें और सीबीएससी को इस गंभीर मसले पर विचार करना चाहिए। बच्चों को परीक्षा और अंक के भय से मुक्ति दिलानी होगी।

इस बाबत सीबीएससी ने राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 को आधार बिंदु बना कर प्रश्नपत्रों की प्रकृति में परिवर्तन किया। बहु-वैकल्पिक प्रश्नों के चलन के साथ ही बच्चों के अंकों में उछाल आते सभी ने देखा। देखते ही देखते दसवीं और बारहवीं में बच्चों के प्रदर्शन और अंकों की बाढ़ सी आने लगी। तब भी बच्चों में आत्महत्या की घटनाएं रुकी नहीं। फिर भी बच्चे अवसाद और कुंठा में जीने लगे। उनकी निराशा इस बात की थी कि अस्सी, नब्बे तो आए, किंतु पांच या दस अंक कम क्यों रह गए। इस बार तो चार सौ में से चार सौ और पांच सौ में से पांच सौ अंक भी बच्चों ने हासिल किए हैं। उन बच्चों से पूछिए जिनके एक या दो अंक से शत-प्रतिशत अंक आने से चूक गए। वे बच्चे बड़े निराशा में जी रहे हैं। बच्चे तो बच्चे मां-बाप भी मुंह लटकाए घूम रहे हैं। याद कीजिए अस्सी और नब्बे का दशक जब पूरे जिले और राज्य में मुश्किल से दस बीस बच्चों को साठ या सत्तर प्रतिशत अंक आया करते थे। उन बच्चों की तस्वीरें अखबारों में छपा करती थीं। वहीं 2000 और 2010 के बाद तो नब्बे फीसद लाने वाले बच्चों को भी कोई नहीं पूछता। न आइआइटी, न डीयू और न अन्य संस्थान। इन्हें अपने मन मुताबिक पाठ्यक्रमों के साथ संतोष करना पड़ता है। नीट में भी इन्हें लगता है इनका भविष्य अधर में है। नब्बे पार और अस्सी के इस पार अटके हुए बच्चों से पूछिए और उनके मां-बाप से पूछें तो इनसे ज्यादा कोई और दुखी जन नहीं मिलेंगे।

परीक्षा की प्रकृति और उसके चरित्र को तो समझने की आवश्यकता है ही, साथ ही हमें परीक्षा के उद्देश्य को भी रेखांकित करने की जरूरत है, जैसे- हम क्यों बच्चों का मूल्यांकन करते हैं? क्यों हमें परीक्षा लेने की आवश्यकता पड़ती है आदि। इसका सीधा जवाब है कि बिना कारण के कार्य नहीं होते। शिक्षा दी जा रही है तो उसका क्या असर हुआ? बच्चे कितना सीख रहे हैं, इसे भी जांचा जाना चाहिए। क्या बच्चों के सीखने-सिखाने में कोई ऐसी बाधा तो नहीं है, जिससे बच्चे सामान्यतौर पर सीख नहीं पा रहे हों। ऐसे में शिक्षा की मूल प्रकृति पर भी विमर्श करने की आवश्यकता पड़ेगी। क्या हम शिक्षा के माध्यम से सिर्फ विषयों की समझ विकसित करना चाहते हैं या फिर उन विषयों का हमारे आम जीवन में कोई उपयोगिता भी है? क्या हम इतिहास, समाज विज्ञान, विज्ञान व भाषा, गणित को अपनी जिंदगी में शामिल कर और बेहतर बना सकते हैं।

शायद सत्तर या अस्सी के दशक में हमारा ध्यान विषयों के साथ ही बच्चों के सर्वांगीण विकास पर केंद्रित था। जबकि 1985 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा पुनरीक्षा,1988 के दस्तावेज को देखें तो यह मानता है कि बच्चों को प्राथमिक स्तर पर भाषा, गणित आदि की समझ विकसित करनी चाहिए। खासकर कक्षा एक से पांचवीं तक में भाषा, गणित, विज्ञान और समाज विज्ञान की शिक्षा दी जाए। यह दस्तावेज मानता है कि प्राथमिक और उच्च कक्षाओं में बच्चों को शिक्षा कला के जरिए दी जाए। देश के ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में भी बच्चों को जानकारी दी जाए। इस मसले पर दस्तावेज में खासतौर से जोर दिया गया था। इन्हीं चिंताओं को 2005 के राष्ट्रीय पाठ्यचर्या दस्तावेज में भी स्थान दिया गया है। गौरतलब है कि 2008-09 में सीबीएसई ने उक्त दस्तावेज को आधार बना कर परीक्षा के प्रश्नपत्रों के निर्माण संबंधी संस्तुतियों को आधार बनाया था। एनसीएफ-2005 के जुड़े ‘नेशनल फोकस ग्रुप आॅन एक्जामिनेशन’ की संस्तुतियों को आधार बना कर सीबीएससी ने परिवर्तन किए, किंतु यह किस स्तर तक कारगर रहा, इसका विश्लेषण किया जाना चाहिए।

शिक्षाविदें को मानना है कि बहु-वैकल्पिक प्रश्नपत्रों में रटने और स्मृति-आधारित कौशल की ज्यादा आवश्यकता पड़ती है। जिनकी स्मरण शक्ति अच्छी है वे बच्चे अधिकाधिक अंक हासिल कर लेते हैं। इन प्रश्नपत्रों में सृजनात्मकता, स्वतंत्र चिंतन और मौलिक चिंतन की संभावना को कम करती है। यही वजह है कि भाषा के पर्चे में भी बच्चे नब्बे पार अंक तो प्राप्त कर लेते हैं, किंतु स्वतंत्र रूप से भाषा के अन्य कौशल जैसे- लेखन, पठन-समझ आदि के स्तर पर पिछड़ते नजर आते हैं। जब हमने भाषा के प्रश्नपत्र को वैकल्पिक बनाया तो वहां चार में से एक सही जवाब छांटना होता है। लेकिन ऐसे में मौलिक चिंतन और लेखन अभिव्यक्ति की क्षमता का विकास नहीं के बराबर हो पाता है। नेशनल एचिवमेंट सर्वे सहित कई रिपोर्टें बताती हैं कि हमारे बच्चे भाषा में लिखना-पढ़ाने कौशल में पीछे रह जाते हैं। जहां एक ओर भाषा स्वंत्रत और मौलिक चिंतन को बढ़ावा देती है, वहीं गणित तर्कपूर्ण चिंतन और मंथन दक्षता का विकास करते हैं।

वर्तमान अंकीय प्रकृति वाली प्रणाली को बढ़ावा देने वाली परीक्षा व्यवस्था कहीं न कहीं बच्चों के स्वतंत्र और मौलिक चिंतन के संवर्द्धन में मददगार साबित होने की बजाय हानिकारक ही साबित हो रही है। सिर्फ अंकों के पहाड़ खड़ा करना हमारा मकसद न हो, बल्कि अंकों के साथ ही उसी के अनुपात में बच्चों को अपने विषयों की समझ भी विकसित हो। मूलत: परीक्षा हमारी समझ और अवबोधन के स्तर को भी जांचती है, ऐसा माना गया है। यदि यह मकसद है तो हमें उसी के अनुसार प्रश्नपत्रों के निर्माण की रणनीति भी तैयार करनी होगी। एक ओर विषयी समझ और कौशल की आवश्यकता हकीकत है तो दूसरी ओर अंकों की दुनिया भी उतनी साफ और कठोर है। यदि बच्चा कम अंक लाता है (जिसे अस्सी फीसद से नीचे भी मान सकते हैं) तो एसे बच्चों को तथाकथित प्रसिद्ध कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल पाता। ऐसे बच्चे सरकारी कॉलेजों के समानांतर चल रही निजी कॉलेजों की ओर शिक्षा पाने के लिए भागते हैं। दोनों ही कॉलेजों में फीस एक बड़ी चुनौती नजर आती है। जो बच्चे मोटी फीस दे सकते हैं वे वहां दाखिल हो जाते हैं। बाकी बच्चे कहां जाते हैं, किन अंधेरे में रह जाते हैं इस ओर भी हमें सोचना होगा।

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