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राजनीति: बीजों के कॉरपोरेटीकरण के खतरे

पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकारों का सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हुए चुनिंदा कॉरपोरेट घराने दुनिया के वैश्विक खाद्य तंत्र पर कब्जे की शुरुआत बीजों से करते हैं, जिससे विविधतापूर्ण बीज कारोबार मुट््ठी भर कंपनियों के हाथों में सिमट कर रह गया है। बीजों पर कॉरपोरेटीकरण के इस गोरखधंधे से किसानों और आम नागरिकों के हित तो प्रभावित हो ही रहे हैं, साथ में विकासशील देशों की जैव विविधता भी खतरे में पड़ गई है।

Author May 25, 2019 4:15 AM
पेप्सिको ने गुजरात के किसानों पर एक-एक करोड़ रुपए के हर्जाने का मुकदमा कर दिया था।

अभिषेक कुमार सिंह

देश को रोटी देने वाले किसान के साथ पिछले चार-पांच दशकों में जो हादसे हुए हैं, वे किसी से छिपे नहीं हैं। आलू-प्याज से लेकर गेहूं-चावल और दाल आदि उगाने वाले किसान की हालत से जुड़ा एक सच यह है कि चंद अपवादों को छोड़ कर अब वह आत्मनिर्भर नहीं रह गया है और उसका स्वावलंबन बैंकों से लेकर बीज, खाद, कीटनाशकों, उपकरणों का कारोबार करने वाली बड़ी कंपनियों के हाथों गिरवी रखा है। कहा जा सकता है कि कुछ मायनों में यह किसान की ही गलती थी कि समृद्धि के सपने देख कर वह इन चीजों की गिरफ्त में आ गया। लेकिन इससे जुड़ा बड़ा सच यह है कि महंगी तकनीक, संकर किस्म के बीजों, कीटनाशकों और रासायनिक खाद के दुष्चक्र में उसे बड़ी कंपनियां ने फंसाया है। इधर तो हालत यह हो गई है कि जिस बीज से किसान की जिंदगी शुरू होती है, उसके कॉरपोरेटीकरण ने किसान को अजब दुविधा में डाल दिया है।

बीजों के कॉरपोरेटीकरण के गुपचुप चल रहे गोरखधंधे का इधर एक उदाहरण तब मिला, जब कुछ दिन पहले 26 अप्रैल, 2019 को एक बहुराष्ट्रीय कंपनी पेप्सिको ने गुजरात के चार किसानों पर एक-एक करोड़ रुपए के हर्जाने का मुकदमा कर दिया। दावा किया गया कि इन किसानों ने आलू की वह खास किस्म उगाने की हिमाकत की है, जिससे पेप्सिको अपने एक मशहूर ब्रांड के चिप्स बनाती है और जिस पर उसे पेटेंट हासिल है। वैसे तो यह एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता था, लेकिन आम चुनावों के दौर में सरकार ने पेप्सिको को इस मामले में खामोश रहने का संकेत दिया और कहा कि अगर मुकदमे वापस नहीं लिए गए तो उसके अन्य उत्पादों के बहिष्कार का आह्वान देश में किया जाएगा।

यह राजनीतिक दबाव तुरंत रंग लाया और दो मई, 2019 को कंपनी ने इन मुकदमों की वापसी का ऐलान कर दिया। कहने को तो यह राजनीतिक रणनीति की जीत कही जाएगी पर असल में इसके पीछे करीब दो सौ किसान नेताओं और सामाजिक संगठनों का दबाव भी था, जिन्होंने साफ कर दिया था कि इस मामले में वे किसानों के साथ हैं और बहुराष्ट्रीय कंपनी की दादागीरी नहीं सही जाएगी। हालांकि मुकदमे वापसी की ताजा कोशिश इसका भरोसा नहीं देती है कि भविष्य में किसानों को आलू, बैंगन, सूरजमुखी, कपास आदि फसलों के बीजों पर उनके अधिकार को लेकर झगड़े-झंझट झेलने नहीं पड़ेंगे, क्योंकि ज्यादा उत्पादन और कीटरोधी फसलों के लिए अंतत: उन्हें ऐसी ही बहुराष्ट्रीय बीज कंपनियों के पास जाना पड़ रहा है जो पहले तो कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग आदि नीतियों के तहत किसानों को खुद से जोड़ती हैं पर आगे चल कर बीज पर ही उनके मौलिक अधिकार को अपने कब्जे में ले लेती हैं। यह पूरा किस्सा कितना तकलीफदेह हो सकता है, गुजरात के आलू उत्पादक किसानों से जुड़ा ताजा मामला इसकी गवाही देता है।

पेप्सिको इंडिया होल्डिंग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ने भारत में एफसी-5 किस्म के आलू के पेटेंट का पंजीकरण 1 फरवरी 2016 को कराया था और इसके पेटेंट की अवधि 2031 तक है। इस अवधि में कंपनी की कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की शर्तों से बंधे किसानों के अलावा बाकी किसान अगर यह आलू उगाते हैं, तो नियमत: कंपनी उनसे मनमाना हर्जाना वसूल सकती है। कंपनी ने अतीत में ऐसा किया भी है। वर्ष 2018 से अब तक यानी डेढ़ वर्ष के अंतराल में ही पेप्सिको गुजरात के साबरकांठा, अरावली और बनासकांठा के ग्यारह किसानों पर ऐसे मुकदमे कर चुकी है और उनमें से कुछ किसानों से हर्जाने के रूप में एक करोड़ रुपए की मांग भी की गई थी।

आलू की यह किस्म इसलिए खास है कि इसकी पैदावार में मिलने वाले आलू की एक निश्चित गोलाई होती है। इसके अलावा चिप्स बनाने की जरूरतों के हिसाब से ही इनमें नमी की एक तय मात्रा होती होती है। चूंकि हमारे देश में इसकी ज्यादातर खेती कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के तहत होती रही है और इस तरह की खेती से कंपनी पेप्सिको की जरूरतें ही पूरी की जाती रही हैं, जो इस आलू से चिप्स बनाती है। ऐसे में, देश के आम किसानों तक आलू की इस किस्म के बीजों की पहुंच नहीं है। लेकिन जिन किसानों ने अतीत में कभी पेप्सिको के साथ अनुबंध में बंधकर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग की या जो किसान इस किस्म के बीज मुहैया कराने वाले केंद्रों के संपर्क में हैं, उन्हें इसके बीज मिल जाते हैं।

एक समस्या यह रही कि जिन बिचौलियों के जरिए इसके बीज किसानों को उपलब्ध कराए जाते रहे हैं, वे इसके पेटेंट संबंधी नियमों की जानकारी किसानों को नहीं देते। ऐसे में बीज बचाकर अगली फसल लेने की परंपरा निभाने वाले पेटेंट से अनजान किसान भूलवश यह गलती कर बैठे कि उन्होंने अपने खेतों में आलू की पेटेंटेड फसल उगा ली। हालांकि कायदा कहता है कि किसान यह किस्म उगा सकते हैं, बशर्ते वे इसके पेटेंट की अवधि बीतने या इंतजार करें या फिर कंपनी को इसकी रॉयल्टी दें। लेकिन क्या हमारे देश के किसान को इतना जागरूक बनाया गया है कि वह ये सारे कायदे जान सके? यह समस्या का सिर्फ एक पहलू है।

इसका एक दूसरा पहलू भी है जो ज्यादा चौंकाने वाला और किसानों के हक-हकूक की चिंता करने वाला है। असल में पिछले एकाध दशकों में खाद और कृषि उपकरण का कारोबार करने वाली नामी कंपनियां अचानक बीजों को हथियाने पर आमादा हो गई हैं। दावा किया जा रहा है कि बीजों के व्यवसाय के 67 फीसद हिस्से पर दुनिया की दस बड़ी कंपनियों का वर्चस्व कायम हो गया है, जबकि तीन दशक पहले हजारों कंपनियां बीजों का उत्पादन और विपणन करती थीं और खुद किसान भी अपनी फसल का एक हिस्सा बचाकर अगली पैदावार के लिए रखता था। जहां तक बीज कारोबार करने वाली कंपनियों का मसला है, उल्लेखनीय है कि यही कंपनियां बीजों के साथ रासायनिक खादों और कीटनाशकों का व्यवसाय भी करती हैं। माना जाता है कि मोन्सैंटो-पेप्सिको जैसी चोटी की इन्हीं दस कंपनियों ने कीटनाशकों के 90 फीसद बाजार पर कब्जा जमा लिया है। असल में मुद्दा यह है कि पेटेंट और बौद्धिक संपदा अधिकारों का सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करते हुए चुनिंदा कॉरपोरेट घराने दुनिया के वैश्विक खाद्य तंत्र पर कब्जे की शुरुआत बीजों से करते हैं, जिससे विविधतापूर्ण बीज कारोबार मुट््ठी भर कंपनियों के हाथों में सिमट कर रह गया है। बीजों पर कॉरपोरेटीकरण के इस गोरखधंधे से किसानों और आम नागरिकों के हित तो प्रभावित हो ही रहे हैं, साथ में विकासशील देशों की जैव विविधता भी खतरे में पड़ गई है।

इन कंपनियों के हाइब्रिड बीजों की खरीद और पैदावार के चलते बीते 50 वर्षों में विभिन्न फसलों की सूखा और बाढ़रोधी हजारों किस्में गायब हो गई हैं। वजह यह है कि ये कंपनियां किसानों को गिनी-चुनी किस्म वाली ऐसी फसलें उगाने को कहती हैं जिनकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग है। इसके अलावा हाइब्रिड प्रजाति के जो बीज ये हमारे किसानों को बेचती हैं, वे किस्में विकसित देशों के अमीरों की जरूरतों के मुताबिक होती हैं। ऐसी स्थिति में भारत जैसे ऊष्ण कटिबंधीय देश से वे फसलें गायब होती जा रही हैं, जिनसे करोड़ों छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका जुड़ी हुई है। यही नहीं, बीज विकास में कॉरपोरेट घरानों के बढ़ती दखल से न सिर्फ किसान कंगाल बने बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे। इसका कारण है कि कथित तौर से ये उन्नत बीज स्थानीय पारिस्थितिकी दशाओं की उपेक्षा करके ऊपर से थोपे जाते हैं। इसीलिए इन्हें अधिक पानी, कीटनाशकों, रासायानिक खादों की जरूरत पड़ती है। साथ ही बीजों को खरीदने के लिए किसानों को हर साल मोटी रकम चुकानी पड़ती है। महंगे बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के चक्कर में किसान कर्ज के जाल में फंसते जाते हैं जो उन्हें आत्महत्या की दशा तक पहुंचा देता है।

असली सवाल यह है कि जब बीज पर से ही किसान का हक छिन जाएगा तो आखिर वह खेती कैसे करेगा और देश को फसलें कैसे देगा! साफ है कि आलू के बीज प्रकरण वाले ताजा मामले को एक नजीर मानते हुए इसमें सरकारों और जागरूक संगठनों को दखल देना होगा वरना देश में पेट भरने वाले अनाज, फल-सब्जियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हाथों बंधक हो जाएंगी और किसान से लेकर आमजन तक खाने-पीने की चीजों के लिए मनमाने दाम चुकाने को बाध्य हो जाएंगे।

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