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पेड़ बचेंगे तो जीवन बचेगा

भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में सघन वनों का क्षेत्रफल तेजी से घट रहा है। 1999 में सघन वन 11.48 फीसद थे, जो 2015 में घट कर मात्र 2.61 फीसद रह गए। देश के कई राज्यों उत्तराखंड, मिजोरम, तेलंगाना, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, दादरा नगर हवेली इत्यादि में वन क्षेत्र तेजी से कम हुआ है।

Author Published on: March 1, 2019 2:24 AM
पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से प्रकृति का प्रकोप बार-बार सामने आ रहा है। (फोटो सोर्स : Cuba Gallery/ Flickr)

योगेश कुमार गोयल

दिल्ली सहित देश के कई बड़े शहर प्रदूषण के चलते बुरी तरह हांफ रहे हैं। पिछले कुछ समय से देश में पर्यावरण का मिजाज लगातार बिगड़ रहा है, जिसका खमियाजा देश ने वर्षभर किसी न किसी बड़ी आपदा के रूप में भुगता भी है। भारत के कई शहर दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के विश्वव्यापी वायु प्रदूषण डाटाबेस के अनुसार दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित पंद्रह शहरों में से चौदह भारत में हैं, जिनमें वाराणसी, कानपुर, लखनऊ, पटना और गया शामिल हैं। देश की राजधानी दिल्ली तो अक्सर गैस चैंबर में तब्दील हो चुकी है। कार्बन उत्सर्जन मामले में दिल्ली दुनिया के तीस शीर्ष शहरों में शामिल है। पहाड़नुमा कूड़े के ढेरों से निकलती जहरीली गैसें, औद्योगिक इकाइयों से निकलते जहरीले धुएं के अलावा सड़कों पर वाहनों की बढ़ती संख्या कार्बन उत्सर्जन का बड़ा कारण है। कहा जाता रहा है कि अगर दिल्ली और देश के अन्य अत्यधिक प्रदूषित शहरों में वायु प्रदूषण पर नियंत्रण पाना है तो लोगों को निजी वाहनों का प्रयोग कम कर सार्वजनिक परिवहन को अपनाना चाहिए, साथ ही बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण को बढ़ावा देकर हरियाली बढ़ानी होगी। लेकिन पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावों और वादों के बावजूद वृक्षों के विनाश का सिलसिला तेजी से बढ़ रहा है।

एक ओर जहां हरियाली की कमी के चलते पर्यावरण का संतुलन बिगड़ने से प्रकृति का प्रकोप बार-बार सामने आ रहा है। सरकारें ही शहरी विकास और देश के विकास को रफ्तार देने, लंबे-चौड़े एक्सप्रेस-वे बनाने के नाम पर लाखों ऐसे वृक्षों का सर्वनाश करने का फरमान जारी करने में विलंब नहीं करतीं, जिनमें से बहुत से पेड़ तो डेढ़ सौ साल तक पुराने नीम, पीपल और बरगद जैसे विशालकाय होते हैं। पिछले साल दिल्ली में भी साढ़े सोलह हजार पेड़ काटे जाने का फरमान सुनाया गया था, किंतु चिपको आंदोलन की तर्ज पर दिल्लीवासियों ने व्यापक स्तर पर जन अभियान चलाकर दिल्ली सरकार को अपना निर्णय वापस लेने को विवश कर इन वृक्षों को कटने से बचा लिया था। लेकिन देश में हर जगह स्थिति ऐसी नहीं है। हिमालयी क्षेत्र हो या गंगा तथा उसकी सहायक नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र, हर कहीं हजारों की संख्या में विशालकाय वृक्ष काटे जा रहे हैं। चार-धाम यात्रा को सुखद बनाने के लिए सड़कों के चौड़ीकरण के लिए करीब नौ सौ किलोमीटर के दायरे में वर्षों पुराने लाखों विशालकाय हरे-भरे वृक्ष काट डाले गए। विकास के नाम पर बेरहमी से वृक्षों के विनाश के चलते जो पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है उससे मानव सहित समस्त प्राणी जगत का जीवन कैसे सुरक्षित रहेगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। जीवन ही सुरक्षित नहीं रहेगा तो हरे-भरे विशाल वृक्षों की कीमत पर यह विकास किस काम का?

वृक्ष न केवल हमें भावनात्मक तथा आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि मिट्टी को रोके रख कर हमें बाढ़ के खतरे से बचाते हैं, कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर आसपास के वायुमंडल को स्वच्छ रखते हैं, पर्याप्त वर्षा कराने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं, विषैले पदार्थों को अवशोषित करते हुए पोषक तत्त्वों का नवीनीकरण करते हैं, खाद्य सामग्री तथा औषधियां उपलब्ध कराते हैं, उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करते हैं तथा वन्य जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं। इसलिए विकास के नाम पर एक भी वृक्ष को काटने से पहले हजार बार यह सोचा जाना चाहिए कि क्या इस वृक्ष को किसी भी प्रकार बचाया जा सकता है।
वृक्ष हमारे लिए कितने महत्त्वपूर्ण हैं, इसे समझने के लिए न्यूयार्क के पर्यावरण संरक्षण विभाग द्वारा जारी तथ्यों पर गौर करना बेहद जरूरी है। इसमें बताया गया है कि सौ विशाल वृक्ष प्रतिवर्ष तिरपन टन कार्बन डाईऑक्साइड और दो सौ किलोग्राम अन्य वायु प्रदूषकों को दूर करते हैं और पांच लाख तीस हजार लीटर वर्षा जल को थामने में भी मददगार साबित होते हैं। घर में सुनियोजित ढंग से लगाए जाने वाले वृक्ष न केवल गर्मियों में एसी की बिजली खपत में छप्पन फीसद की कमी लाते हैं, बल्कि सर्दियों में ठंडी हवाओं को भी रोकते हैं। किसी भी वृक्ष के वजन में एक ग्राम की वृद्धि से ही उससे 2.66 ग्राम अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलती है और किसी विशाल वृक्ष से प्राप्त होने वाली आॅक्सीजन, फल, लकड़ी, बायोमास इत्यादि की कीमत के आधार पर पचास साल की अवधि में ऐसे वृक्ष की आर्थिक कीमत करीब दो लाख डॉलर होती है।

भारतीय वन सर्वेक्षण की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में सघन वनों का क्षेत्रफल तेजी से घट रहा है। 1999 में सघन वन 11.48 फीसद थे, जो 2015 में घट कर मात्र 2.61 फीसद रह गए। देश के कई राज्यों उत्तराखंड, मिजोरम, तेलंगाना, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, हरियाणा, पंजाब, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, दादरा नगर हवेली इत्यादि में वन क्षेत्र तेजी से कम हुआ है। सघन वनों का दायरा सिमटते जाने के चलते ही वन्यजीव शहरों-कस्बों का रुख करने को विवश होने लगे हैं। इसी के चलते जंगली जानवरों की इंसानों के साथ मुठभेड़ों की घटनाएं बढ़ रही हैं। हालांकि ‘नेचर’ पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस समय करीब पैंतीस अरब वृक्ष हैं और इस लिहाज से प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में करीब अट्ठाईस वृक्ष आते हैं। यह आंकड़ा पढ़ने और सुनने में जितना सुखद प्रतीत होता है, उतना है नहीं, क्योंकि इनमें से अधिकांश सघन वनों में हैं, न कि देश के विभिन्न शहरों या कस्बों में।

वृक्षों की अंधाधुध कटाई के चलते सघन वनों का क्षेत्रफल भी तेजी से घट रहा है। भारत में स्थिति बदतर इसलिए है कि यहां एक तरफ जहां वृक्षों की अवैध कटाई का सिलसिला बड़े पैमाने पर चलता रहा है, वहीं वृक्षारोपण के मामले में उदासीनता और लापरवाही बरती जाती रही है। किसी भी विकास योजना के नाम पर पेड़ काटे जाते समय विरोध होने पर सरकारी एजेंसियों द्वारा तर्क दिए जाते हैं कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उसके बदले दस गुना वृक्ष लगाए जाएंगे, किंतु वृक्षारोपण के मामले में सरकारी निष्क्रियता जगजाहिर रही है। कैग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2015-17 के बीच दिल्ली में 13018 वृक्ष काटे गए थे, जिसके बदले में 65090 पौधे लगाए जाने थे, लेकिन मात्र 21048 पौधे ही लगाए गए और इनमें भी बहुत सारे सजावटी पौधे लगा कर खानापूर्ति कर दी गई। वैसे भी पेड़ों को काटने के बदले जो पौधे लगाए जाते हैं, उनमें से महज दस फीसद बचे रह पाते हैं।

कैग की एक रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली पहले से ही करीब नौ लाख पेड़ों की कमी से जूझ रही है। पिछले पांच वर्षों में हरियाली घटने से दिल्ली में वायु प्रदूषण करीब चार सौ फीसद बढ़ा है। देश में मौसम चक्र जिस तेजी से बदल रहा है, जलवायु संकट गहरा रहा है, ऐसी पर्यावरणीय समस्याओं से निपटने का एक ही उपाय है वृक्षों की सघनता। वायु प्रदूषण हो या जल प्रदूषण अथवा भू-क्षरण, इन समस्याओं से केवल ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगा कर ही निपटा जा सकता है। हम प्रकृति से अपने हिस्से की ऑक्सीजन तो ले लेते हैं, किंतु प्रकृति को उसके बदले में लौटाते कुछ भी नहीं। दरअसल, एक सामान्य वृक्ष सालभर में लगभग सौ किलो आॅक्सीजन देता है, जबकि एक व्यक्ति को वर्षभर में साढ़े सात सौ किलो आॅक्सीजन की जरूरत होती है। नीम, बरगद, पीपल जैसे बड़े छायादार वृक्ष, जो पचास साल या उससे ज्यादा पुराने हों, उनसे तो प्रतिदिन एक सौ चालीस किलो तक ऑक्सीजन मिलती है। ऐसे में हमें यह बात भली-भांति समझ लेनी चाहिए कि यदि वृक्ष बचे रहेंगे, तभी पृथ्वी पर जीवन बचेगा।

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