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राजनीति: बढ़ती झुग्गियां, गहराते सवाल

शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी स्थानीय प्रशासन द्वारा बुनियादी सेवाएं प्रदान करने की क्षमता पर भारी दबाव डालती है। वैध-अवैध रूप से बसने वाली ये बस्तियां शहरों का अविभाज्य हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन हालत यह है कि इनमें रहने वाले लोगों को पेयजल, शौचालय और कचरे के निपटान जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं नसीब हैं।

Author June 15, 2019 1:29 AM
वर्ष 2001 में अधिकतर बेघर परिवार ग्रामीण क्षेत्र में थे।

प्रदीप श्रीवास्तव

वैश्विक स्तर पर शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार 2030 तक विश्व की जनसंख्या करीब दो अरब के आसपास हो जाएगी। शहरीकरण का सबसे अधिक असर एशिया और अफ्रीका के देशों में हो रहा है। इन दोनों महाद्वीपों की बुनियादी व्यवस्था नब्बे फीसद शहरीकरण के कारण प्रभावित हो रही है। जबकि, यूरोप व अमेरिका आदि के देशों में शहरीकरण थम-सा गया है। 2030 तक भारत में चालीस करोड़ से अधिक लोग शहरों में बसे होंगे, जो शहरीकरण की नई-नई समस्याओं को जन्म देंगे। मौजूदा समय में शहरों में बसे प्रत्येक छह परिवारों में से एक परिवार गंदी बस्तियों में रहता है और आने वाले वर्षों में यह संख्या बढ़ने का अनुमान है। भले ही आर्थिक प्रगति अंकों के हिसाब से प्रभावशाली दिख रही हो, लेकिन भारत में गैरबराबरी अब भी विकास की दिशा में सबसे बड़ी चुनौती है। विश्व स्तर पर सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) को हासिल करने के लिए शहरी गरीबों के हालात बदलने की जरूरत है।

शहरी क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाएं अधिक होती हैं, इसलिए वहां ज्यादा लोग रोजगार की तलाश में गांवों या छोटे शहरों से पलायन करके आते हैं। यहां आकर वे ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक धन कमाते हैं और राष्ट्रीय आय में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान देते हैं। भारत में विगत दशकों में पलायन की दर विश्व की तुलना में बढ़ी है। शहरी क्षेत्रों में प्रवासियों का अनुपात आसमान छूने लगा है। आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार 1983 में शहरी क्षेत्रों में प्रवासियों का अनुपात 31.6 फीसद था, जो 2007-08 में बढ़ कर 35.4 फीसद हो गया। यह मामूली वृद्धि है, लेकिन यह अभी भी आबादी का एक तिहाई से अधिक है। अगले कुछ दशकों में इस प्रक्रिया में तेजी आएगी। आंकड़ों के हिसाब से 2001 तक भारत की आबादी का 27.81 फीसद हिस्सा शहरों में रहता था। 2011 तक यह 31.16 फीसद और 2018 में 33.6 फीसद हो गया। वहीं, 2001 की जनगणना में शहरों और कस्बों की कुल संख्या 5161 थी, जो 2011 में बढ़ कर 7936 हो गई। यानी शहरों का विस्तार तेजी होता जा रहा है। इसका नतीजा यह हुआ कि झुग्गी बस्तियों में रहने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। भारत का छोटा-बड़ा शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां ये बस्तियां न हों। बड़े शहरों और महानगरों में तो झुग्गी बस्तियों के क्षेत्रफल तेजी से बढ़ रहे हैं। आज हर तीन भारतीयों में से एक शहरों और कस्बों में रहने लगा है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में विश्व की आधी आबादी शहरों में रहने लगी है और 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों और शहरों में रहने लगेगी। एक अनुमान है कि 2025 तक विकासशील देशों में शहरी आबादी में तीन गुना वृद्धि हो चुकी होगी और यह कुल जनसंख्या के इतसठ फीसद के बराबर हो जाएगी।

सरकार ने गरीबों के लिए, खासतौर से शहरी गरीबों के लिए आवास योजना, अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत), स्मार्ट सिटी मिशन, डिजिटल इंडिया, जनधन योजना और मेक इन इंडिया आदि सहित कई योजनाएं शुरू हैं। स्थानीय जिला प्रशासन की इकाइयां भी कई तरह की योजनाओं को संचालित करती हैं, जिससे शहरी गरीबों खासतौर पर झुग्गी बस्तियों में रहने वाले गरीबों को बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं, जैसे पानी, साफ-सफाई, स्वास्थ्य और शिक्षा आदि उपलब्ध हो सके। लेकिन बढ़ती हुई शहरी आबादी को देखते हुए अभी भी सरकार को पानी, साफ हवा, सीवर व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, रोजगार के अवसर आदि उपलब्ध कराने में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा भी शहरों के लिए एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है, क्योंकि शहरों के विकास के लिए सबसे ज्यादा बलि हरित क्षेत्र की ही चढ़ाई जाती है।

आज हालत यह है कि देश के सभी बड़े शहरों और महानगरों में बड़ी संख्या में झुग्गी बस्तियां हैं। इनमें रहने वाले लोग शहरी जनसंख्या से संबंधित उच्च एवं मध्य वर्ग की अनेक आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, परंतु वे खुद न केवल गरीबी के शिकार हैं, बल्कि बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं। शहरों की सड़कों पर गड्ढे, सीवर प्रणाली का अभाव एवं जल-जमाव से होने वाली परेशानियां और बीमारियां, बिजली, पानी एवं संचार सुविधाओं का अस्त-व्यस्त व असमान वितरण इन बस्तियों को ज्यादा समस्यामूलक बना देता है। ऐसी बस्तियों के निवासी अनेक जटिल रोगों सहित कई प्रकार की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के शिकार होते हैं। शहरी क्षेत्रों में बढ़ती आबादी स्थानीय प्रशासन द्वारा बुनियादी सेवाएं प्रदान करने की क्षमता पर भारी दबाव डालती है। वैध-अवैध रूप से बसने वाली ये बस्तियां शहरों का अविभाज्य हिस्सा बन चुकी हैं। लेकिन हालत यह है कि इनमें रहने वाले लोगों को पेयजल, शौचालय और कचरे के निपटान जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं नसीब हैं।

आज देश में लगभग सात करोड़ लोग शहरी झुग्गी बस्तियों में रहते हैं, जहां न तो साफ पानी है, न सफाई और न अन्य बुनियादी सुविधाएं। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोग पुलों के नीचे, सड़कों पर और जहां-तहां जीवनयापन को मजबूर हैं। वर्ष 2001 में अधिकतर बेघर परिवार ग्रामीण क्षेत्र में थे। लेकिन 2010 आते-आते बढ़ती शहरी बेघरों की संख्या गांवों के बेघरों से ज्यादा हो गई। इन बेघरों की सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि अपनी एक-दो बीघे की जमीन को गांवों में छोड़ कर ये खुले आकाश के नीचे या छोटी-छोटी झुग्गियों पांच-पांच लोगों के साथ गुजर-बसर करते हैं। शहरों में अमीरों और गरीबों के बीच आवासीय स्थितियों और सामाजिक हैसियत के बीच एक निर्मम विभाजन दिखने लगा है।

एक अन्य समस्या जो गरीबों के सामने आती है, वह है शहरों की तकनीक पर बढ़ती निर्भरता। शहर या स्मार्ट सिटी में पैर पसारती उन्नत तकनीक के सामने गांव से बड़ी संख्या में आए निम्न-कौशल वाले कारीगरों के लिए औपचारिक उद्योगों या आधुनिक सेवाओं में कोई जगह नहीं है। इसलिए ये बेगारी करने के लिए मजबूर हैं। सुदूर गांव के बेहतरीन हस्तशिल्प के कारीगर हमारे शहरों में रिक्शा चलाने को बाध्य हैं। भारत की वर्तमान शहरी प्रणाली में लगभग आठ हजार शहर शामिल हैं। कई शहरों और कस्बों को शहरी विकास के व्यापक विस्तार में शामिल किया जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भविष्य में अधिकांश जनसंख्या वृद्धि शहरी क्षेत्रों से ही होगी। 2030 तक साढ़े सोलह करोड़ अतिरिक्त लोग शहरी क्षेत्रों की ओर रुख करेंगे।

अब जरा देश की राजधानी के हालात पर नजर डालें। दिल्ली में नौ सौ से ज्यादा छोटी-बड़ी झुग्गी बस्तियां हैं, जिनकी आबादी करीब बीस लाख है। यहां उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों से लोग आकर बसे हैं। अधिकतर मलिन बस्तियों में साफ सफाई का कोई इंतजाम नहीं है। यहां शौचालय, सीवर लाइन, नालियां और कूड़े के निस्तारण की कोई व्यवस्था नहीं है। प्राथमिक शिक्षा के लिए इन बस्तियों में या उनके नजदीक स्कूल तो खोले गए हैं, लेकिन ये स्कूल भी सामाजिक भेदभाव, सरकारी उपेक्षा और अव्यवस्था का शिकार हैं। स्वच्छ भारत मिशन के बावजूद यहां पर कोई सीवर व्यवस्था नहीं है, जिस कारण से घरों में शौचालय नहीं बनाए जा सकते हैं। जहां पर शौचालय बने होते हैं, वहां मल-मूत्र व गंदा पानी नालियों में बहाया जाता है, जो वहीं के लोगों को बीमार बनाता है। इन बस्तियों के लोगों को इलाज के लिए नजदीक के स्वास्थ्य केंद्रों पर ही आश्रित रहना पड़ता है। दुर्भाग्य यह है कि इन बस्तियों को साफ रखने और एक बेहतर जिंदगी की तलाश में आए लोगों को सचमुच की बेहतर जिंदगी देने की कोई व्यवस्था सरकारी तंत्र के पास नहीं है।

 

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