ताज़ा खबर
 

राजनीति: उड़ान की चुनौती

एअर इंडिया की माली हालत लंबे समय से खस्ता है। जेट एअरवेज भी जमीन पर आ चुकी है। जेट का भविष्य अनिश्चित है। पूर्व में एअर सहारा, किंग फिशर, ईस्ट-वेस्ट एअरलाइन, स्काईलाइन एनईपीसी, मोदीलुफ्त आदि हवाई सेवा कंपनियां बंद हो चुकी हैं। बंद होने के समय एअर सहारा की बाजार में सत्रह फीसद हिस्सेदारी थी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या चमक-दमक वाले विमानन क्षेत्र की हालत उतनी अच्छी नहीं है, जितनी बाहर से दिखती है!

Author June 7, 2019 12:55 AM
ड्रीमलाइनर दस से तेरह घंटे बिना किसी परेशानी के उड़ान भर सकता है।

सतीश सिंह

एअर इंडिया संकट का समाधान उसके विनिवेश में तलाशा जा रहा है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के निवेश एवं लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग ने एअर इंडिया के विनिवेश पर काम शुरू कर दिया है। एअर इंडिया पर फिलहाल तकरीबन सत्ताईस हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। एअर इंडिया को बेचने के लिए निविदा के जरिए बोलियां आमंत्रित की जाएंगी। एअर इंडिया में पनच्यानवे फीसद हिस्सेदारी बेचने और पांच फीसद कर्मचारियों के लिए इंप्लाइज स्टॉक आप्शन प्लान (ईएसओपी) के रूप में रखने पर विचार चल रहा है। विनिवेश के समय स्थायी कर्मचारियों को कंपनी में शेयर विकल्प और एक साल नौकरी का आश्वासन देने की योजना है। पिछली बार सरकार ने कंपनी में चौबीस फीसद हिस्सेदारी अपने पास रखने की योजना बनाई थी, जिसके कारण किसी भी खरीदार ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई थी। खरीदार के आगे नहीं आने पर सरकार को बिक्री बंद करनी पड़ी, लेकिन एअर इंडिया के भारी कर्ज की समस्या का समाधान करने के लिए सरकार ने एक अलग कंपनी बनाकर एअर इंडिया के साढ़े सत्ताईस हजार करोड़ रुपए के कर्ज को कम किया था। लेकिन इसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता है। एअर इंडिया के कर्ज में और कमी लाने की जरूरत है, ताकि दूसरी कंपनियां इसे खरीदने में दिलचस्पी लें।

इसके पहले भी पिछले साल मई में सरकार एअर इंडिया में अपनी छिहत्तर फीसद हिस्सेदारी बेचना चाह रही थी। लेकिन किसी कंपनी ने बोली नहीं लगाई। मार्च 2018 तक एअर इंडिया अड़तालीस हजार करोड़ रुपए कर्ज के बोझ से दबी थी। एअर इंडिया को बेचने के लिए अर्न्स्ट एंड यंग (ईएंडवाई) को सलाहकार नियुक्त किया गया है। विनिवेश प्रक्रिया के तहत एअर इंडिया के अलावा इसकी सस्ती विमानन सेवा इकाई एअर इंडिया एक्सप्रेस और एअर इंडिया एसएटीएस एअरपोर्ट सविर्सेज प्राइवेट लिमिटेड की भी बिक्री की जाएगी। एसएटीएस एअरपोर्ट सविर्सेज एअर इंडिया और सिंगापुर की एसएटीएस लिमिटेड का संयुक्त उद्यम है। एअर इंडिया को बेचने के लिए सलाहकार कंपनी- ईवाई की नियुक्ति की गई है। इस कंपनी के अनुसार एअर इंडिया के नहीं बिकने के कई बड़े कारण हैं, जैसे- सरकार द्वारा सौ फीसद हिस्सेदारी नहीं बेचना, एक साल तक कर्मचारियों को कंपनी के साथ बनाए रखने का प्रावधान, तीन साल तक विमानन कंपनी का परिचालन बिना किसी दखल के करने पर जोर और कंपनी के विस्तार के लिए इच्छुक नहीं होना आदि। जाहिर है, खरीदार आसान शर्तें चाहेंगे।

अप्रैल, 2012 में घोषित बेलआउट पैकेज के तहत एअर इंडिया को सरकार अब तक छब्बीस हजार करोड़ रुपए से अधिक की पूंजी दे चुकी है। एअर इंडिया में नए सिरे से पंूजी डालना इसलिए जरूरी है कि कर्जदाता कंसोर्टियम के तीन बैंकों ने इसे ‘लाइन आॅफ क्रेडिट’ देने से मना कर दिया है। ‘लाइन आॅफ क्रेडिट’ बैंक और कर्जदार के बीच का ऐसा समझौता होता है, जिसके तहत कर्जदार कभी भी तय सीमा के मुताबिक उधारी ले सकता है।  एअर इंडिया की माली हालत लंबे समय से खस्ता है। जेट एअरवेज भी जमीन पर आ चुकी है। जेट का भविष्य अनिश्चित है। पूर्व में एअर सहारा, किंग फिशर, ईस्ट-वेस्ट एअरलाइन, स्काईलाइन एनईपीसी, मोदीलुफ्त आदि हवाई सेवा कंपनियां बंद हो चुकी हैं। बंद होने के समय एअर सहारा की बाजार में सत्रह फीसद हिस्सेदारी थी। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या चमक-दमक वाले विमानन क्षेत्र की हालत उतनी अच्छी नहीं है, जितनी बाहर से दिखती है?
एअर इंडिया और इंडियन एअर लाइंस के विलय के वक्त यह कंपनी सौ करोड़ रुपए के लाभ में थी। लेकिन अनियमितता, कुप्रबंधन और अंदरूनी गड़बड़ियों के कारण एअर इंडिया खस्ताहाल स्थिति में आ गई।

अदालत में दायर एक जनहित याचिका के मुताबिक वर्ष 2004 से वर्ष 2008 के दौरान विदेशी विनिर्माताओं को फायदा पहुंचाने के लिए सड़सठ हजार करोड़ रुपए में एक सौ ग्यारह विमान खरीदे गए, करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करके विमानों को पट्टे पर लिया गया और निजी विमानन कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए फायदे वाले हवाई मार्गों पर एअर इंडिया की उड़ानों को जानबूझ कर बंद किया गया। इन गड़बड़ियों की पुष्टि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने भी अपनी रिपोर्ट में की है। एअर इंडिया की स्थापना टाटा संस लिमिटेड की एक इकाई के रूप में हुई थी। सन 1946 तक इसका संचालन टाटा एअरलाइंस कर रही थी, जो बाद में सार्वजनिक क्षेत्र की लिमिटेड कंपनी में तब्दील हो गई। एक समय विमानन कंपनियों में एअर इंडिया की हैसियत महाराजा की थी। एअर इंडिया बेड़े में हर तरह के विमान थे। के-787 ड्रीमलाइनर को सितंबर, 2012 में एअर इंडिया के बेड़े में शामिल किया गया था।

दो सौ छप्पन सीटों वाला ड्रीमलाइनर दस से तेरह घंटे बिना किसी परेशानी के उड़ान भर सकता है। सीटों की डिजाइनिंग और र्इंधन क्षमता के मामले में यह बोइंग 777-200 एलआर से बेहतर है। एअर इंडिया ड्रीमलाइनर की बेहतर क्षमता का उपयोग करके एअर इंडिया ज्यादा लाभ कमा सकती है। बड़े विमानों में एअर इंडिया के पास 777-200 एलआर के आठ, 777-300 ईआर के बारह और बी 747-400 के तीन विमान हैं। छोटे विमानों में एअर इंडिया के पास ए-320 के बारह, ए-319 के उन्नीस और ए 321 के बीस विमान हैं। इसके अलावा कंपनी ने उन्नीस छोटे व बड़े विमानों को लीज पर ले रखा है।
विमानों के बुद्धिमतापूर्ण इस्तेमाल से राजस्व में इजाफा किया जा सकता है। जैसे, जिस मार्ग पर यात्रियों का आवागमन अधिक है, वहां विमानों के फेरे बढ़ाए जा सकते हैं। वैसे विमानों का ज्यादा उपयोग किया जा सकता है, जिनमें कम र्इंधन की खपत होती है। आज भी एअर इंडिया में विमानों का इस्तेमाल तार्किक तरीके से नहीं किया जा रहा है। लंबी दूरी वाले विमानों का उपयोग मध्यम तथा छोटी दूरी वाले मार्गों में उड़ानों के लिए हो रहा है।

बोइंग 777-200 एलआर लंबी दूरी तय करने वाला विमान है। यह लगातार सोलह घंटे तक उड़ान भर सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल मध्यम दूरी वाले स्थानों के लिए ही हो रहा है। इससे विमानों में र्इंधन की ज्यादा खपत हो रही है। फ्रैंकफर्ट, पेरिस, हांगकांग, शंघाई जैसे शहरों, जहां पहुंचने में दस घंटे लगते हैं, की उड़ान में अगर ड्रीमलाइनर का प्रयोग किया जाता है तो यात्रा की लागत प्रति किलोमीटर पच्चीस फीसद तक कम हो सकती है। यात्री किराए में कमी करना भी एक अच्छा विकल्प है। निजी विमानन कंपनियों को लाभ पहुंचाने वाली नीतियों के कारण इंडिगो, स्पाइसजेट, गो एअर आदि ने कमाई में एअर इंडिया से बढ़त हासिल की। विदेशी विमानन कंपनियों में लुफ्तहंसा समूह, ब्रिटिश एअरवेज, केएलएम इत्यादि से भी एअर इंडिया को कड़ी चुनौती मिल रही है। एअर इंडिया को घाटे से उबारने की कोशिशें तो की गर्इं, लेकिन ये कोशिशें सिरे नहीं चढ़ पार्इं।

भले ही एअर इंडिया को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही हो, लेकिन यह तय है कि कुशल प्रबंधन से एअर इंडिया को मुनाफे में लाया जा सकता है। कुशल नेतृत्व एवं संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से पूर्व में यह कंपनी लाभ में आई भी थी। भारतीय रेल, यूको बैंक, पंजाब नेशनल बैंक आदि भी पूर्व में ऐसा करिश्मा कर चुके हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की अनेक कंपनियां आज मुनाफे में चल रही हैं। बीमा और सरकारी तेल कंपनियां भी मुनाफे में हैं। देखा जाए तो लाभ कमाने वाली सरकारी कंपनियों की एक लंबी फेहरिस्त है। ऐसे में एअर इंडिया को लाभ में लाना नामुमकिन नहीं है, क्योंकि इसकी बदहाली के लिए मूल रूप से कुप्रबंधन जिम्मेदार है। इसलिए योजनाबद्ध तरीके से काम करके इसे फिर से मुनाफे में लाया जा सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X