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राजनीति: बेरोजगारी का गहराता संकट

भारत में 2018 में बेरोजगारी की दर पांच फीसद थी, लेकिन इसमें भी पंद्रह से उनतीस साल के युवाओं में बेरोजगारी तीन गुना ज्यादा यानी पंद्रह फीसद तक थी। इस आयु वर्ग में बेरोजगारी की समस्या शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक थी। बेरोजगारी की इस हालत पर अहम सवाल यह उठता है कि सत्ता और राजनीतिक दलों के लिए बेरोजगारी अहम चिंता का विषय क्यों नहीं है।

Author Published on: October 8, 2019 1:48 AM
देश में नौकरी की संख्या कम होती जा रही है।

अभिषेक कुमार सिंह

दुनिया की कोई भी सरकार जिन कुछ मोर्चों पर अपनी नाकामी को आसानी से नहीं स्वीकार करती है, उनमें भूख से होने वाली मौतें और बेरोजगारी जैसे मुद्दे प्रमुख होते हैं। हालांकि, इधर देश के रोजगार क्षेत्र में युवाओं की दक्षता और कौशल को लेकर कुछ सवाल उठे हैं और रोजगार का मतलब सिर्फ सरकारी नौकरी नहीं है, इसे लेकर भी एक मत बना है, लेकिन इसके बावजूद कुछ सच झुठलाए नहीं जा सकते। जैसे, एक सच यह है कि नोटबंदी के बाद से लाखों लोगों का रोजगार छिन गया और दूसरा यह कि नई नौकरियों के बनने की रफ्तार मंद पड़ गई, जिससे बेरोजगारी आसमान पर पहुंच गई है।

भारत में फिलहाल बेरोजगारी का स्तर क्या है, इसका खुलासा कुछ अध्ययनों और सर्वेक्षणों से हुआ है। जैसे, इस साल जून में प्रकाश में आई नेशनल सैंपल सर्वे आॅफिस (एनएसएसओ) की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि वर्ष 2011-12 में बेरोजगारी की जो दर 2.2 फीसद पर थी, वह 2017-18 में बढ़ कर 6.1 फीसद के रिकॉर्ड स्तर पर चली गई। हालांकि इस बढ़ोत्तरी के पीछे एनएसएसओ का कहना था कि बेरोजगारी दर बढ़ने की एक वजह गणना के तरीके का बदला जाना है, जिसमें शिक्षित लोगों को ज्यादा अहमियत दी गई थी। असल में, शिक्षित बेरोजगारी दर निरक्षरों के मुकाबले में हमेशा ज्यादा रहती है, लिहाजा उनके आंकड़ों में बढ़ोत्तरी हो गई। लेकिन बेरोजगारी में वृद्धि का आकलन अकेले एनएसएसओ का नहीं है, बल्कि सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) ने बीते दो वर्षों के दौरान किए गए सर्वेक्षणों में भी बेरोजगारी की दर में इजाफे को दर्ज किया। सीएमआइई के सर्वे के मुताबिक इस साल अप्रैल 2019 में देश में बेरोजगारी की दर सात फीसद थी। कुछ इसी किस्म के आकलन ‘स्टेट आॅफ वर्किंग इंडिया 2018’ में भी पेश किए गए हैं। इस अध्ययन के अनुसार भारत में 2018 में बेरोजगारी की दर पांच फीसद थी, लेकिन इसमें भी पंद्रह से उनतीस साल के युवाओं में बेरोजगारी तीन गुना ज्यादा यानी पंद्रह फीसद तक थी। इस आयु वर्ग में बेरोजगारी की समस्या शहरी क्षेत्रों में सबसे अधिक थी।

बेरोजगारी की इस हालत पर अहम सवाल यह उठता है कि सत्ता और राजनीतिक दलों के लिए बेरोजगारी अहम चिंता का विषय क्यों नहीं है। हो सकता है कि बेरोजगार की श्रेणी में दर्ज किए गए ज्यादातर नौजवान शिक्षित हों, अपने मन की बेहतर नौकरी तलाश कर रहे हों। ऐसे लोगों को बेरोजगार रहते हुए नौकरी की खोज करने का मामला अच्छी नौकरी में किया गया निवेश प्रतीत होता है और वे इसके लिए सीधे तौर पर सरकार को जिम्मेदार नहीं मानते। अलबत्ता सरकारी नौकरियों में कटौती होना उनके लिए भी चिंता का विषय है। एक दिलचस्प आकलन यह भी कहता है कि औपचारिक क्षेत्र में नौकरियों की संख्या घटने की बजाय असल में बढ़ गई हैं, जिसका खुलासा ईपीएफओ यानी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के आंकड़ों से होता है। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) ने दावा किया है कि रोजगार के औपचारिक क्षेत्र में 2018-19 में नौकरियों के एक करोड़ सैंतीस लाख अवसर पैदा हुए। हालांकि इन सारे दस्तावेजी आंकड़ों से यह निष्कर्ष अवश्य निकल रहा है कि अच्छी और सरकारी नौकरियों पर उन नौजवानों का कब्जा होता चला रहा है जिन्होंने किसी तरह ठीक-ठाक डिग्री और कौशल प्रशिक्षण हासिल किया होगा।

इस दायरे से बाहर के बेरोजगार नौजवानों के लिए या तो कोई भी नौकरी कर लेने का विकल्प बचता है या फिर हमेशा के लिए बेरोजगार रह जाने का, लेकिन ऐसे लोग कोई आवाज उठाने की हैसियत में नहीं होते। इन संकेतों वाले सारे नतीजों का सार इस साल मार्च में बहुराष्ट्रीय मार्केट रिसर्च कंपनी इप्सॉस के सर्वेक्षण से मिला था। इस सर्वेक्षण में रोजगार को लेकर विभिन्न देशों की जनता की अलग-अलग चिताएं सामने आई थीं। सर्वे के मुताबिक भारत में ज्यादातर लोगों ने यह माना कि रोजगार सहित कई अन्य मामलों में सरकार की नीतियां सही दिशा में हैं, लेकिन आतंकवाद की चिंता उन्हें सबसे ज्यादा सता रही थी। यह जरूर है कि सर्वेक्षण में शामिल महत्त्वपूर्ण अट्ठाईस देशों के औसतन अट्ठावन फीसद नागरिकों ने माना था कि उनका देश नीतियों के मामले में भटक-सा गया है। लेकिन ऐसा सोचने वालों में भारत की बजाय दक्षिण अफ्रीका, स्पेन, फ्रांस, तुर्की और बेल्जियम के लोग ज्यादा थे। ऐसा नहीं है कि हमारे देश में रोजगार की फिक्र हाशिये पर चली गई है, बल्कि इसमें स्थिति यह बनी है कि इसकी चिंता ग्रामीण के मुकाबले शहरी और अनपढ़ों के मुकाबले शिक्षित नौजवानों को ज्यादा है और इत्तफाक से ऐसे लोगों का भरोसा सरकार की नीतियों पर ज्यादा बना हुआ है, इसलिए इस समस्या को लेकर कोई बड़ा बवाल नहीं उठ रहा है।

हालांकि इस पूरे प्रकरण में जो चिंता सरकारों और उद्योगों की है, वह अलग तरह की है। कहा जा रहा है कि हमारे शिक्षित बेरोजगारों की सबसे बड़ी समस्या उनका उद्योगों के अनुरूप तैयार नहीं होना है। यानी प्रशिक्षण के बावजूद उनमें वह अपेक्षित कौशल नहीं है जो उन्हें रोजगार के काबिल बनाता है। इस कारण बाजार में मौके होने के बावजूद लाखों पद खाली हैं और कंपनियां वांछित योग्य नौजवानों की तलाश में उन्हें भरने में हिचकिचा रही हैं, क्योंकि वैश्विक मंदी के कारण वे ऐसे लोगों को नौकरी देने का जोखिम सहन नहीं कर सकतीं जो नौकरी करते हुए अपने भीतर अपेक्षित कौशल का विकास करते हैं।

ऐसे वक्त में, जब देश में ‘स्किल इंडिया’ जैसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम में 2022 तक देश के चालीस करोड़ युवाओं को हुनरमंद बना कर उन्हें रोजगार से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है, सर्वेक्षणों के ऐसे आंकड़े हैरान करते हैं। ऐसी स्थिति में अहम सवाल यह पैदा होता है कि अगले कुछ वर्षों में आखिर देश कैसे यह इंतजाम कर पाएगा ताकि करोड़ों युवाओं को रोजगार से जोड़ा जा सके। इस मामले की गंभीरता का एक पहलू यह भी है कि सरकार के पास फिलहाल महज पैंतीस लाख युवाओं को हर साल किसी क्षेत्र में दक्ष बनाने वाले प्रशिक्षण देने का प्रबंध है। इसकी तुलना पड़ोसी चीन से करें, तो पता चलता है कि वहां सालाना नौ करोड़ युवाओं को हुनरमंद बनाने का इंतजाम सरकार की तरफ से किया गया है।

इस समस्या का दूसरा पहलू और भी गंभीर है। यह पहलू शिक्षण-प्रशिक्षण की गुणवत्ता से जुड़ा है। यह देखा जा रहा है कि अगर बच्चे और युवा किसी तरह नामी संस्थानों में दाखिला पा जाते हैं, तो भी इसकी गारंटी नहीं होती कि वहां से वे जो डिग्री-डिप्लोमा लेकर निकलेंगे, उसके आधार पर वे इतने काबिल हो सकेंगे कि अपने क्षेत्र में हर चुनौती से मुकाबला कर सकें। यह मामला स्कूल, कॉलेजों व प्रतिष्ठानों में दी जा रही शिक्षा की खराब गुणवत्ता से जुड़ा है। यही कारण है कि देश में सत्तावन फीसद युवा पढ़े-लिखे होने के बावजूद किसी ठीकठाक नौकरी के लिए तैयार नहीं पाए गए। जाहिर है, समस्या मौजूदा शिक्षा तंत्र की है जो वैसी शिक्षा नहीं दे पा रहा जो अच्छी नौकरी पाने या अपना कोई व्यवसाय खड़ा करने में उनकी मदद करे।

निश्चय ही ऐसे निष्कर्ष चिंताजनक हैं और सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से सोचना चाहिए कि आखिर वे अपनी युवा आबादी को किस तरह की शिक्षा मुहैया करा रही हैं। शहरी और ग्रामीण शैक्षिक ढांचे में भीषण विरोधाभास हैं। कहीं शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है, तो कहीं हिंदी और क्षेत्रीय भाषा। ऐसा ही अंतर ग्रामीण और शहरी युवा की पढ़ाई-लिखाई का भी है। इस तरह के फर्क और अभावों को जितनी जल्दी हो सके, दूर करना बेहतर होगा।

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