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उच्च अदालतें और हिंदी

देश की सभी निचली अदालतों में संपूर्ण कामकाज हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में होता है, किंतु उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में यही काम केवल अंग्रेजी में होता है। यहां तक कि जो न्यायाधीश हिंदी व अन्य भारतीय भाषाएं जानते हैं, वे भी अपीलीय मामलों की सुनवाई में दस्तावेजों का अंग्रेजी अनुवाद कराते हैं।

सुप्रीम कोर्ट (फोटो सोर्स : Indian Express)

आमजन के लिए न्याय की भाषा कौन-सी हो, इसका सबक भारत और भारतीय न्यायालयों को अबू धाबी से लेने की जरूरत है। संयुक्त अरब अमीरात की राजधानी अबू धाबी ने ऐतिहासिक फैसला लेते हुए अरबी और अंग्रेजी के बाद हिंदी को अपनी अदालतों में तीसरी आधिकारिक भाषा के रूप में शामिल कर लिया है। अरबी और अंग्रेजी नहीं जानने वालों तक न्याय की पहुंच बनाने की दृष्टि से यह फैसला काफी अहम है। अब यहां की अदालतों में वादी एवं प्रतिवादी अपने दावे और बयान हिंदी में दे सकेंगे। इसका उद्देश्य हिंदी भाषी लोगों को मुकदमे की प्रक्रिया में उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में पारदर्शी ढंग से सहायता करना है। इसके उलट हमारे उच्च न्यायालयों, उच्चतम न्यायालय और शीर्ष नौकरशाही का आलम यह है कि सब के सब अंग्रेजी न्याय व्यवस्था को कायम रखते हुए सत्तर साल से लकीर के फकीर बने हुए हैं। हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं में न्यायिक प्रक्रिया की सभी अपीलें व दलीलें अदालत की दहलीज पर पहुंचते ही ठिठक जाती हैं। भाषाई परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भावना और जनतंत्र की कसौटी भी यही मानती है कि सभी तरह के राज-काज आम लोगों की भाषा में क्रियान्वित हों। किंतु हमारे यहां इस पुनीत भावना जितना निरादर हुआ, उतना अन्य किसी क्षेत्र में शायद ही हुआ हो!

इस्लाम धर्मावलंबी इस देश की आधिकारिक रूप से कुल आबादी करीब एक करोड़ है। इसमें भी दो तिहाई विदेशी नागरिक हैं। यहां भारतीय नागरिकों की आबादी लगभग छब्बीस लाख है। इनमें से अधिकांश हिंदी और तमिल भाषी हैं। तमिल भी हिंदी जानते हैं। भारत को विदेशी मुद्रा उपलब्ध कराने में भी ये कामगार दूसरे स्थान पर हैं। यूएई के औद्योगिक-प्रौद्योगिक विकास में भी इन भारतीयों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। ऐसी स्थिति में इन्हें श्रम न्यायालयों में कोई मामला दाखिल करते समय अंग्रेजी व अरबी नहीं जानने के कारण दस्तावेजों की असलियत समझने में संकट का सामना करना पड़ता था। क्योंकि अंग्रेजी या अरबी में ही अभिलेख तैयार करने की अनिवार्य बाध्यता थी, लिहाजा वादी व प्रतिवादी दोनों ही परेशानी का अनुभव करते थे। वैसे भी इस देश में जो भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका के लोग हैं, वे पढ़े-लिखे कम हैं और ज्यादातर भवन व सड़क निर्माण कार्यों से जुड़े हैं। महिलाएं घरेलू कार्य करती हैं। ये अनुबंधित श्रमिक की श्रेणी में आते हैं। इस नाते अबू धाबी की सरकार ने न्याय-प्रक्रिया में हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा देकर इन लोगों के प्रति संवेदनशीलता का परिचय दिया है। न्याय की भाषा हिंदी बन जाने से अब भारतीयों को कानूनी प्रक्रिया, उनके अधिकार और सेवा संबंधी शर्तें जानने-समझने में दस्तावेजों की अंग्रेजी व अरबी में अनुवाद कराने की बाध्यता खत्म हो जाएगी। इस उपाय से अमीरात को विश्व का सबसे बड़ा पर्यटन-स्थल बनने में भी मदद मिलेगी। वे न्याय प्रक्रिया से गुजरते हुए पारदर्शिता का अनुभव करेंगे।

इस तरह का फैसला भारत में लिया गया होता तो हिंदी सहित भारतीय भाषाओं को थोपने का जुमला गढ़ कर अंग्रेजी वर्चस्ववादी अभिजात वर्ग ने हल्ला मचा दिया होता। जबकि अंग्रेजी की कथित रूप से बना दी गई अनिवार्यता के चलते देशी प्रतिभाएं पूर्ण रूप से खिलने से पहले ही कुंठित हो रही हैं। शिक्षा में आरक्षण का लाभ लेकर वंचित समुदायों के जो विद्यार्थी आइआइटी जैसे शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश पा रहे हैं, उन्हें अंग्रेजी माहौल के चलते आत्मघाती कदम उठाने तक को विवश होना पड़ रहा है। साफ है, यह प्रभुत्व व्यापक रूप लेकर हिंदी व भाषाई माध्यमों से पढ़ कर आने वाले युवाओं में न केवल घातक हीनता का बोध पैदा कर रहा है, बल्कि अंग्रेजी बोलना और जानना एक विभाजन रेखा बन गया है। इसलिए अब समय आ गया है कि अंग्रेजी बनाम हिंदी की बहस को भारतीय भाषाओं की निरीहता के रूप में अवलोकित किया जाए। यदि ऐसा कालांतर में होता है तो इसके न्यायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व शैक्षिक पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर भाषाई समस्या का तार्किक व व्यावहारिक सामाधान निकालना संभव होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं कि वर्तमान भूमंडलीकृत उदारवादी व आधुनिक तकनीक आधारित वैश्विक फलक पर अंग्रेजी का अपना महत्त्व है। लेकिन इससे यह आवश्यक नहीं हो जाता कि न्याय, शासन-प्रशासन और उद्योग व व्यापार के रोजमर्रा के काम उस भाषा में हों, जिसे देश की अनठानवे फीसद जनसंख्या जानती ही नहीं। जिस भाषा में आम आदमी सरकार और व्यवस्था से बातचीत ही नहीं कर सके, वहां लोकहितकारी शासन कैसे कहलाएगा? जिस बहस एवं फैसले को वादी-प्रतिवादी समझ ही नहीं सकें, उसे न्याय कहें या अन्याय! मुठ्ठीभर लोग जिस न्याय प्रक्रिया और उसके परिणाम से निकले निष्कर्ष को समझते हों, यह लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध सीधे-सीधे साजिश है। इसका एक उदाहरण याद आता है, जब महाराष्ट्र के जैतपुर में स्थानीय लोग परमाणु विद्युत परियोजना का विरोध कर रहे थे, तो केंद्र सरकार ने परियोजना की पारदर्शिता के लिए अंग्रेजी में बारह सौ पृष्ठों की जानकारी उपलब्ध कराई, जबकि आंदोलनकारी मराठी, कोंकणी और हिंदी ही जानते थे। अब इसे साजिश नहीं तो क्या कहा जाना चाहिए?

देश की सभी निचली अदालतों में संपूर्ण कामकाज हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में होता है, किंतु उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में यही काम केवल अंग्रेजी में होता है। यहां तक कि जो न्यायाधीश हिंदी व अन्य भारतीय भाषाएं जानते हैं, वे भी अपीलीय मामलों की सुनवाई में दस्तावेजों का अंग्रेजी अनुवाद कराते हैं। यह देश और संविधान की विडंबना ही है कि अनुच्छेद-19, 343, 346, 347, 350 और 351 में कहीं भी अंग्रेजी की बाध्यता का जिक्र नहीं है। अनुच्छेद-19 में भारत के सभी नागरिकों को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपनी भाषा में व्यक्त करने का मूल अधिकार दिया गया है। यह अभिव्यक्ति संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल किसी भी भारतीय भाषा में हो सकती है। अलबत्ता संविधान द्वारा प्राप्त यह बुनियादी अधिकार उच्च और सर्वोच्च न्यायालय की देहरी पर जाकर ठिठक जाता है। यहां अपीलें और यचिकाएं अंग्रेजी में ही विचार के लिए स्वीकार की जाती हैं। किसी भी मुकदमे के दो बिंदु अहम होते हैं। एक, प्रथम सूचना प्रतिवेदन और दूसरा याची, अभियुक्त एवं साक्षी के बयान। प्राथमिकी स्थानीय भाषा में लिखी जाती है और फरियादी, आरोपी व गवाह भी अपने बयान अपनी-अपनी भाषा में देते हैं। कभी-कभी इनके बयानों के अनुवाद अर्थ का अनर्थ भी कर देते हैं। ऐसे में संविधान का प्रजातांत्रिक न्यायवादी आग्रह उच्च न्यायालयों की देहरी पर ही खारिज कर दिया जाता है।

दुनिया में जितने भी देश महाशक्ति के दर्जे में आते हैं, उनकी अदालतों में मातृभाषा चलती है। यूरोपीय देशों में जैसे-जैसे शिक्षा व संपन्नता बढ़ी, वैसे-वैसे राष्ट्रीय स्वाभिमान प्रखर होता चला गया। फ्रांस ने 1539 में लैटिन को अपनी अदालतों से बेदखल किया। जर्मनी ने अठारहवीं सदी में लैटिन से पिंड छुड़ा लिया। इंग्लैंड की अदालतों में एक समय जर्मनी और फ्रांसीसी भाषाओं का ही बोलबाला था। यहां अंग्रेजी बोलने पर हजारों पाउंड का जुर्माना भी लगा दिया जाता था, लेकिन 1362 में जर्मन एवं फ्रांसीसी को खत्म कर अंग्रेजी को इंग्लैंड की अदालतों में आधिकारिक भाषा बना दिया गया। रूस, चीन, जापान, वियतनाम और क्यूबा में भी मातृभाषाओं का प्रयोग होता है। लेकिन भारत और भारतीय अदालतें कोई सबक या प्रेरणा लिए बिना अंग्रेजी को स्वंतत्रता के सत्तर साल बाद भी ढोती चली आ रही हैं। अदालतों को अब इस भाषायी रंगभेद की दासता से मुक्त होने की जरूरत है।

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