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राजनीति: हितों के लिए बदलती कूटनीति

पाकिस्तान को लगता है कि ज्यादा संबंध खराब होने की स्थिति में चाहबहार से भारत को ईरान बाहर करेगा और इसका सीधा लाभ चीन और पाकिस्तान को मिलेगा। चीन ने हाल ही में आरोप भी लगाया कि भारत चीन द्वारा विदेशों में विकसित किए जा रहे बंदरगाहों के विकास में अड़ंगा लगा रहा है। चीन ने विशेष तौर पर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का नाम लिया था और कहा था कि भारत इसके विकास में रोड़ा अटका रहा है।

Author May 16, 2019 1:31 AM
जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अजहर। (फोटो: इंडियन एक्सप्रेस)

संजीव पांडेय

मसला सिर्फ चीन-अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध का नहीं है। मामला एशियाई कूटनीति में सर्वोच्चता हासिल करने का भी है। भारत ने ईरान से तेल आयात पूरी तरह रोकने का फैसला किया है। वहीं ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तेहरान पहुंचे और ईरान से आर्थिक सहयोग बढ़ाने व क्षेत्रीय सहयोग के लिए साथ में काम करने का वादा किया। हालांकि ईरान और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनाव है। दोनों मुल्क एक दूसरे पर आतंकियों को शरण देने का आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन इमरान खान का ईरान दौरा कई मायनों में महत्त्वपूर्ण था क्योंकि इमरान के लक्ष्य में भारत-ईरान संबंध भी हैं। इमरान ने ईरान के साथ आर्थिक साझेदारी को लेकर बातचीत की, आतंकवाद रोकने पर बातचीत की। दोनों मुल्कों के बीच ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की बातचीत हुई, ईरान से खरीदी जाने वाली बिजली को लेकर बात हुई। वहीं अफगानिस्तान, पाकिस्तान और ईरान के बीच क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर भी विचार-विमर्श किया गया। जब भारत अमेरिकी दबाव में ईरानी तेल के आयात से पीछे हट रहा है, तब पाकिस्तान ईरानी तेल और गैस आयात पर विचार कर रहा है। सवाल यह है कि पाकिस्तान किस हद तक ईरान पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को मानेगा।

पिछले दिनों अमेरिका ने आतंकी मसूद अजहर के बहाने भारत-ईरान संबंधों को लेकर खुली राय रखी थी। मसूद को लेकर अमेरिका ने भारत को जो खुला समर्थन दिया, उसके बदले वह चाहता था कि भारत ईरान से तेल खरीदना बंद कर दे। वैसे बीते दिनोें मसूद पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा लगाई गई पाबंदी को भारत की कूटनीतिक जीत बताया गया था, क्योंकि इस बार चीन ने विरोध नहीं किया। पाकिस्तान भी चुप था। पाकिस्तान को इतना पता था कि मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगने से जमीन पर कुछ खास परिवर्तन नहीं आने वाला। ‘वन बेल्ट-वन रोड’ पर चीन में हुई बैठक से ठीक पहले भारतीय विदेश सचिव चीन गए थे। इसी दौरान इमरान खान बेल्ट एंड रोड फोरम की बैठक में भाग लेने चीन पहुंचे थे। उनकी चीनी अधिकारियों से बातचीत हुई। इसके बाद मसूद अजहर पर चीन ने रणनीति बदली। हालांकि भारत ने भी इसके लिए प्रयास कम नहीं किए थे। लेकिन इसके एवज में पश्चिमी देशों ने भारत को कूटनीतिक समर्थन मुफ्त में नहीं दिया, यह भी सच्चाई है।

दूसरी तरफ चीन को यह डर था कि मसूद अजहर पर ज्यादा अड़ने से चीन की वैश्विक छवि खराब होगी। इस बार पाकिस्तान ने भी व्यावहारिक रणनीति अपनाई, क्योंकि उसे अपनी खराब होती आर्थिक स्थिति की खासी चिंता है। पाकिस्तान यह अच्छी तरह जानता है कि अजहर पर प्रतिबंध कागजों में ही लगेगा, जमीनी कार्रवाई तो उसे ही करनी है। आतंकी गुटों पर कार्रवाई के मामले में पाकिस्तान अभी तक पूरी दुनिया की आंखों में धूल झोंकता रहा है, चाहे अमेरिका विरोधी आतंकी गुट हक्कानी नेटवर्क हो या आतंकी हाफिज सईद का संगठन।

मसूद अजहर पर भारत की जीत सिर्फ मनोवैज्ञानिक जीत है। वैश्विक आतंकी घोषित होने से अजहर पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। क्योंकि पाकिस्तान मसूद अजहर पर सख्त कार्रवाई करने से बचेगा, वह अजहर के मदरसों, खातों और संपत्तियों पर केवल दिखावे की कार्रवाई करेगा। दरअसल, भारत ने मसूद अजहर को तो वैश्विक आतंकी घोषित करवा दिया, लेकिन दूसरी सच्चाई यह है कि मसूद का संगठन जैश-ए-मोहम्मद कई साल पहले वैश्विक आतंकी सूची में डाला जा चुका है। जैश और इससे जुड़े दो बड़े ट्रस्ट अल रशीद ट्रस्ट और अल अख्तर ट्रस्ट पर 2003 और 2005 में प्रतिबंध लगाया गया था। इसके बावजूद जैश की आतंकी गतिविधियों पर पाकिस्तान ने कोई रोक नहीं लगाई। सच्चाई तो यही है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 का असर दुनिया के आतंकी संगठनों पर नहीं है। आतंकी संगठनों की संपति, पैसे आदि कागजों में जब्त किए जाते हैं।

जब्ती से पहले आतंकी संगठन पैसे और संपत्ति अपने दूसरे ट्रस्टों को हस्तांतरित कर देते हैं। हाफिज सईद भी वैश्विक आतंकी सूची में काफी पहले आ गया था। लेकिन उसकी गतिविधियां आज भी जारी हैं, उसके संगठन को हथियारों की आपूर्ति आज भी हो रही है। हाफिज कई दूसरे ट्रस्टों के माध्यम से अपने काम कर रहा है। सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1267 में शामिल होने के बाद भी हाफिज पाकिस्तान में खुला घूमता है, उसने मिल्ली मुसलिम लीग नामक राजनीतिक दल भी बना लिया है, खुलेआम भारत विरोधी जलसा करता है। आजतक उसका कुछ नहीं बिगड़ा।

पाकिस्तान ने पिछले कुछ महीनों में व्यावहारिक रणनीति पर चलते हुए अपनी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने की कोशिश की है। हाल में इमरान खान ने साफ कहा कि क्षेत्रीय शांति को लेकर पाकिस्तान तत्पर है, पर यह तभी संभव है जब भारत-पाकिस्तान संबंध ठीक होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के बाद जो नई सरकार आएगी उससे बातचीत शुरू हो जाएगी और संबंध भी सुधरेंगे। इमरान ने ऐसे बयान पाकिस्तानी सेना की सहमति से ही दिए हैं।  भारत चीन की ओबीओआर परियोजना का लगातार विरोध कर रहा है। चीन किसी भी कीमत पर भारत के विरोध को ठंडा करना चाहता है, क्योंकि भारत के विरोध का असर छोटे एशियाई मुल्कों पर पड़ता है। श्रीलंका और मलेशिया जैसे देशों में चीन की कुछ परियोजनाओं का विरोध हुआ। चीन इसके पीछे भारत के रवैये को देखता है। तभी से चीन लगातार कोशिश कर रहा है कि भारत बेल्ट एंड रोड के प्रति आक्रामक रवैया न अपनाए।

पाकिस्तान को पता है कि अमेरिकी दबाव में भारत ईरानी तेल के आयात को पूरी तरह रोकेगा। पाकिस्तान इसका लाभ उठाना चाहता है। उसकी सबसे बड़ी परेशानी ही भारत-ईरान के अच्छे संबंध हैं। पाकिस्तान को हमेशा यही डर रहा है कि भारतीय खुफिया एजेंसियां ईरान की सीमा में सक्रिय हैं। चाहबहार में भारत की मौजूदगी से पाकिस्तान को भारी नुकसान है, क्योंकि चाहबहार परियोजना पूरी हो जाने के बाद अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर निर्भरता काफी हद तक कम हो जाएगी। अभी अफगानिस्तान अपनी जरूरी चीजों का आयात चाहबहार के रास्ते कर रहा है। भारत भी अफगानिस्तान में अपना सारा निर्यात चाहबहार के रास्ते ही कर रहा है। पाकिस्तान को यह लगता है कि ईरान से तेल खरीद बंद होने के बाद भारत-ईरान संबंधों में तनाव आएगा। यह पहली बार हो रहा है कि जब भारत ने ईरान से पूरी तरह से तेल आयात को रोका है। पिछली बार जब अमेरिकी प्रतिबंध लगा था तो भारत ने पूरी तरह से ईरानी तेल आयात को नहीं रोका था।

पाकिस्तान को लगता है कि ज्यादा संबंध खराब होने की स्थिति में चाहबहार से भारत को ईरान बाहर करेगा और इसका सीधा लाभ चीन और पाकिस्तान को मिलेगा। चीन ने हाल ही में आरोप भी लगाया कि भारत चीन द्वारा विदेशों में विकसित किए जा रहे बंदरगाहों के विकास में अड़ंगा लगा रहा है। चीन ने विशेष तौर पर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह का नाम लिया था और कहा था कि भारत इसके विकास में रोड़ा अटका रहा है। दरअसल, ग्वादर के विकास में मुख्य रोड़ा ही चाहबहार है जहां भारत का निवेश है। पाकिस्तान ईरान से संबंधों को इसलिए भी नए सिरे से निर्धारित करना चाहता है कि अफगानिस्तान में ईरान की खासी भूमिका है। अफगान शांति वार्ता में भी ईरान की भागीदारी है। पाकिस्तान-अफगान सीमा पर लगातार तनाव से पाकिस्तान को आर्थिक नुकसान हो रहा है। चमन और तोरखम सीमा पूरी तरह से व्यापार के लिहाज लाभदायक है, लेकिन इसका लाभ पाकिस्तान को नहीं मिल रहा है। पाकिस्तान को ऊर्जा की भारी जरूरत है।

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