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राजनीति: समाधान मांगते बड़े मुद्दे

इस समय इन मुद्दों की गंभीरता की विस्तृत जानकारी रखने वाले लोगों की संख्या अपेक्षया कम है। इन मुद्दों को न्याय व लोकतंत्र के मुद्दों से जोड़ कर व्यापक समझ बनाने वाले लोगों की संख्या तो और भी कम है। यही वजह है कि जब धरती की रक्षा के जरूरी मुद्दे जैसे वन-रक्षा को कुछ लोग असरदार ढंग से उठाते हैं तो भी उसके न्याय पक्ष को उपेक्षित कर देते हैं।

Author May 18, 2019 2:52 AM
भारतीय मौसम विभाग ने उत्तर और उत्तर-पूर्वी भारत के कई हिस्सों में बुधवार को अगले 24 घंटे के बीच आंधी-तूफान की चेतावनी जारी की है।

भारत डोगरा

कुछ समय पहले फिनलैंड के चुनावों में लोगों के सामने कई बड़े स्थानीय मुद्दे थे, पर सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा जलवायु बदलाव ही बना। पूरे विश्व को देखें तो जीवन को संकटग्रस्त करने वाली प्रमुख समस्याओं के बारे में ऐसी जागरूकता अभी बहुत कम नजर आती है। इस बारे में तो निश्चित जानकारी मिल रही है कि धरती पर जीवन संकट में है, पर इसे दूर करने के लिए समय पर असरदार कदम कैसे उठाए जाएंगे, इस बारे में अभी बहुत अनिश्चित स्थिति है। जो प्रयास हो रहे हैं वे बहुत अपर्याप्त हैं। उससे कहीं अधिक बड़े प्रयास और बड़े बदलाव चाहिए। ये प्रयास अमन-शांति, पर्यावरण और जीवन के सभी रूपों की रक्षा, लोकतंत्र, समता व न्याय की परिधि में जरूरी हैं।

इन सभी मुद्दों पर विश्व के विभिन्न देशों में जन-आंदोलन व जन-अभियान पहले से चल रहे हैं। इनके विभिन्न आयाम हैं। उदाहरण के लिए, यदि केवल अमन-शांति के आंदोलनों और हिंसा-विरोधी आंदोलनों व अभियानों की बात करें तो किसी भी देश में इनके विभिन्न आयाम हो सकते हैं। बारूदी सुरंगों या अन्य विशिष्ट छोटे हथियारों के विरुद्ध एक अभियान हो सकता है तो परमाणु हथियारों जैसे महाविनाशक हथियारों के विरुद्ध एक अलग अभियान हो सकता है। पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने के कई अभियान हो सकते हैं। महिला विरोधी हिंसा, बाल-हिंसा व घरेलू हिंसा के विरुद्ध कई आंदोलन हो सकते हैं। शिक्षा संस्थानों और कार्यस्थलों पर होने वाली हिंसा के विरुद्ध अभियान हो सकते हैं।

एक बड़ी चुनौती यह है कि सभी जन-अभियानों और आंदोलनों में आपसी एकता बना कर उन्हें एक बड़ी ताकत बनाया जाए, जिसका असर अधिक व्यापक और मजबूत हो। ये सभी शाखाएं एक-दूसरे की पूरक हों, इनकी अमन-शांति के मुद्दों पर एक व्यापक व समग्र सोच हो, वे अहिंसा की सोच में गहराई तक पहुंच सकें। अब अमन-शांति की ये सभी धाराएं परमाणु हथियारों को समाप्त करने के बारे में आम सहमति बनाएं तो इस मांग को बहुत बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में, अपनी विशिष्ट मांगों के साथ ये सभी अभियान उन मांगों को भी अपनाएं जो धरती पर जीवन को बुरी तरह संकटग्रस्त कर रही हैं। इस तरह किसी भी देश में बहुत व्यापक स्तर पर धरती की रक्षा की मांग उठ सकती है। फिर सभी देशों से यह मांग उठेगी तो अपने आप विश्व स्तर पर यह मांग बहुत असरदार रूप से उठने लगेगी। विभिन्न देशों के अमन-शांति आंदोलनों में आपसी समन्वय हो, एकता हो तो साथ-साथ जोर लगा कर परमाणु हथियारों को समाप्त करने की मांग को वे और असरदार ढंग से उठा सकेंगे।

यही स्थिति पर्यावरण रक्षा के आंदोलन की है। किसी भी देश में इस आंदोलन के कई अध्याय हो सकते हैं। जैसे- नदियों का प्रदूषण कम करना, वायु प्रदूषण घटाना, प्लास्टिक प्रदूषण में कमी लाना आदि। यदि इन विभिन्न अभियानों और आंदोलनों में बेहतर तालमेल हो तो इनकी आवाज ज्यादा मजबूत बनेगी। इस ओर विशेष ध्यान देना होगा कि जो मुद्दे धरती के जीवन को बुरी तरह संकटग्रस्त करने वाले हैं (जैसे- जलवायु बदलाव का मुद्दा) उन मुद्दों को पर्यावरण रक्षा के आंदोलन अपने विशिष्ट मुद्दों के साथ-साथ जोर देकर उठाएं। इस तरह एक ओर पर्यावरण रक्षा के सभी पक्ष एक-दूसरे की सहायता से मजबूत होंगे और दूसरी ओर जलवायु बदलाव जैसे धरती को संकटग्रस्त करने वाले मुद्दों को व्यापक समर्थन मिलेगा। यदि दुनिया के सारे देश एक साथ हो जाएं तो जलवायु बदलाव जैसे संकट के संतोषजनक समाधान की मांग विश्व स्तर पर बहुत असरदार ढंग से उभर सकेगी। पर इसके साथ यह भी जरूरी है कि विभिन्न देशों की सरकारों में, अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र में जो नेता व अधिकारी इन मुद्दों को सही ढंग से समझ रहे हैं, वे अधिक सक्रिय भूमिका निभाएं और धरती की रक्षा के आंदोलनों के अनुकूल निर्णय लेने में सहायता करें।

एक बड़ी जरूरत इस बात की है कि धरती के जीवन पर मंडरा रहे मानव निर्मित अभूतपूर्व संकट की समझ अधिक लोगों तक पहुंचे, तभी लोग अधिक संख्या में आगे आएंगे। इस समय इन मुद्दों की गंभीरता की विस्तृत जानकारी रखने वाले लोगों की संख्या अपेक्षया कम है। इन मुद्दों को न्याय व लोकतंत्र के मुद्दों से जोड़ कर व्यापक समझ बनाने वाले लोगों की संख्या तो और भी कम है। यही वजह है कि जब धरती की रक्षा के जरूरी मुद्दे जैसे वन-रक्षा को कुछ लोग असरदार ढंग से उठाते हैं तो भी उसके न्याय पक्ष को उपेक्षित कर देते हैं। वे वन रक्षा की बात तो करते हैं, पर आदिवासी आजीविका की रक्षा को उपेक्षित कर देते हैं। इतना ही नहीं, आदिवासी आजीविकाएं उजाड़ने की नीति भी वे सुझाते हैं। इस तरह न तो पर्यावरण की रक्षा होगी, न आजीविका बचेगी।

पर्यावरण रक्षा में सबसे मूल्यवान योगदान आदिवासी व अन्य मेहनतकश दे सकते हैं जिन्हें प्राकृतिक वनों की बेहतर समझ रही है। आदिवासियों को पर्यावरण रक्षा से जोड़ कर प्राकृतिक वन की रक्षा करने व बंजर भूमि में हरियाली लाने के कार्य कहीं अधिक सफलता से किए जा सकते हैं और धरती का संकट दूर करने के लिए इसकी बहुत जरूरत भी है। इस तरह की समझ को स्पष्ट कर हमें धरती की रक्षा की वह राह निकालनी है जो समता व सादगी, न्याय व लोकतंत्र की राह है। पहले और अब के ऐसे प्रयासों में एक बड़ा फर्क यह है कि अब हम विश्वव्यापी ऐसे संकट के दौर में हैं जिसमें धरती की जीवनदायिनी क्षमताएं ही गंभीर खतरे में पड़ गई हैं। इसलिए इस समय संकट और समाधान की सही समझ को अधिक लोगों तक पहुंचाना और उन्हें समाधान के प्रयासों से जोड़ना एक बहुत महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी बन गई है। इसमें मीडिया भी सार्थक भूमिका निभा सकता है।

इन समस्याओं के समाधान में जनसाधारण का जुड़ना संभव है। इस उम्मीद का मूल आधार यह है कि पर्यावरण संकट और महाविनाशक हथियारों की समस्याओं के समाधान की नींव तैयार करने के लिए मानव जीवन में जो सादगी, संतोष, स्नेह और समता चाहिए, वही जनसाधारण के जीवन को सार्थक बनाने के लिए व उनके दुख-दर्द दूर करने के लिए सबसे जरूरी है। सार्थक बदलाव का सबसे मूल आधार यही है कि जनसाधारण के अपने दुख-दर्द को बुनियादी व स्थाई तौर पर कम करने की जो सही राह है, वही हमें विश्व के सबसे गंभीर संकटों के समाधान की ओर ले जाती है। जरूरत है कि इस अतर्संबंध को स्पष्ट रूप से आम लोगों के सामने इस तरह रखा जाए कि वह आसानी से समझ आए और हमारे अपने व आसपास के दुख-दर्द दूर करने के प्रयास विश्व की सबसे गंभीर समस्याओं के समाधान से जुड़ते चले जाएं।

यदि लालच, दूसरों के संसाधन हड़पने और भोग-विलास की दौड़ पर हम रोक लगाएं, उसके स्थान पर सादगी, सेवा, समता, स्नेह व संतोष के आदर्शों को प्रतिष्ठित करें तो इससे हमारे अपने व आसपास के जीवन में संकटों के मूल कारण दूर होंगे और साथ ही विश्व की बड़ी समस्याओं के समाधान की नींव भी तैयार होगी। जहां जितना संभव हो, हम इन जीवन मूल्यों के प्रसार के लिए कार्य करते रहें। इतिहास के इस नाजुक दौर में हमारे जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने व आसपास के जीवन के दुख-दर्द दूर करने के प्रयासों को दुनिया की सबसे गंभीर समस्याओं को दूर करने के व्यापक अभियान से जोड़ कर पूरी कर्मठता, निष्ठा व ईमानदारी से आगे बढ़ें।

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