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राजनीति: शिक्षा नीति और सवाल

सवाल यह है कि वह भारतीय जिसकी बोली, भाषा, गणित, विज्ञान, अध्यात्म में ‘भारतीयता’ है लेकिन उसकी आवाज राज्य के प्रतिष्ठानों जैसे स्कूलों, अदालतों, दफ्तरों तक नहीं पहुंच पा रही है, उसे क्या यह शिक्षा नीति कुछ दे पाएगी? क्या ‘दक्षता’ को परिभाषित करने का सांस्कृतिक नजरिया, बाजारवादी नजरिए के बीच अपना रास्ता तलाश पाएगा? क्या शोध के रास्ते उच्च शिक्षा मौलिक चिंतन, विश्लेषणात्मक दृष्टि और सृजनधर्मिता द्वारा ज्ञान के भारतीय संस्करण की नींव डल पाएगी?

Author June 28, 2019 1:16 AM
प्रतिकात्मक चित्र।

 

ऋषभ कुमार मिश्रा

नई शिक्षा नीति का प्रस्तावित मसौदा आम जनता की राय के लिए आ चुका है। इस मसौदे को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि एक आदर्श भारतीय समाज और इसकी शिक्षा व्यवस्था के लिए सुंदरतम शब्दों, मुहावरों और तरीकों के साथ एक नई व्यवस्था आकार लेने जा रही है। यह नीति वर्तमान और भविष्य के बीच राज्य के रुख को स्पष्ट करती है। इस नीति में एक सकारात्मक सोच निहित है जो शिक्षा के द्वारा प्रत्येक व्यक्ति के निजी और नागरिक जीवन को समृद्ध करना चाहती है। प्रस्तावित मसौदे के आरंभ में ही स्पष्ट किया गया है कि इसका लक्ष्य शिक्षा द्वारा भारत के प्रत्येक व्यक्ति का सर्वांगीण विकास है। जहां-जहां सर्वांगीण विकास का उल्लेख है, वहां प्रत्यक्षत: या अप्रत्यक्षत: इस विकास को ज्ञान आधारित समाज, इक्कीसवीं सदी की दुनिया की दक्षताओं- आलोचनात्मक और सृजनात्मक चिंतन, निर्णय लेना आदि, चौथी औद्योगिक क्रांति की तैयारी और संवैधानिक मूल्यों, खासकर समानता, के सापेक्ष परिभाषित किया गया है। इस वैश्विक दृष्टि के साथ इतिहास बोध और सांस्कृतिक अस्मिता के पक्ष को पूरा स्थान देकर यह प्रयास किया गया है कि परंपराओं, इतिहास, संस्कृतियों और मूल्यों के साथ इक्कीसवीं सदी की जरूरतों को पूरा किया जाए। इन दोनों आयामों का संतुलन ही इक्कीसवीं सदी का भारत बनाएगा, ऐसी मान्यता इस नीति में निहित है। यह मान्यता दुधारी तलवार के समान है। यदि नीति के क्रियान्वयन में किसी एक के पक्ष में झुकाव हुआ तो वह भारतीयता के सामासिक अर्थ का विग्रह कर देगा। यह भी ध्यान देना आवश्यक है भारतीयता का असल अर्थ उसके बहुवचन में है। देखना है कि यह नीति इस बहुवचन को कैसे क्रियान्वित करती है?

प्रस्तावित नीति को दो दृष्टियों से समझने की आवश्यकता है। पहली तो यह कि इस नीति की कौनसी संस्तुतियां ‘नए भारत’ के लिए नई शिक्षा प्रणाली हेतु हैं? दूसरा यह कि ये संस्तुतियां वर्तमान भारत के एक नए भविष्य की कल्पना किस रूप में करती हैं? आखिरी शिक्षा नीति वर्ष 1986 में आई थी। तब से अब तक का भारत बदल चुका है। जन शिक्षा का प्रसार, स्कूली शिक्षा का मौलिक अधिकार, उच्च शिक्षा का व्यावसायिक ढांचा, निजी क्षेत्र का पर्याप्त प्रसार, शैक्षिक प्रशासन और वित्त में सुधार व बढ़ोत्तरी के प्रयास आदि के आंकड़े इसके प्रमाण हैं। इसके साथ ही वतर्मान में नई संभावनाएं और चुनौतियां भी हमारे सामने खड़ी हैं। जैसे, शहरीकरण लगातार बढ़ रहा है, पर्यावरणीय संकट गंभीर है, क्षेत्रीय विषमताएं बढ़ी हैं, बेरोजगारी के आंकड़े भी चिंताजनक स्तर पर हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति-आर्थिक हालात ऐसे हैं कि हम वैश्विक स्तर पर सुदृढ़ स्थिति के बिना आर्थिक अवसरों का लाभ नहीं उठा सकते। सामाजिक और वैचारिक स्तर पर अस्मिता की राजनीति ने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। आज हम डिजिटल क्रांति को स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन इसकी लागत अभी भी अधिक है। शिक्षार्जित ज्ञान और कुशलता के आधार पर एक नया वर्ग पैदा हो चुका है। इसके लिए शिक्षा एक ‘लोकवस्तु’ है, इसे स्वीकार करते हुए प्रस्तावित नीति इसकी उपलब्धता, गुण और व्यवस्था का दायित्व राज्य को सौंपती है। इसके साथ ही यह नीति इतिहास, भाषाओं, लोक विद्याओं और देशज विज्ञान की उपेक्षित धाराओं को पुनर्सजित करने पर भी बल देती है। इसे स्कूलों से लेकर उच्च शिक्षा तक के पाठ्यक्रम का अंग बनाने का सुझाव देती है।

प्रस्तावित नीति ‘नए भारत’ शिक्षा के स्थायी संकट- परीक्षा केंद्रित रटंत प्रणाली से मुक्त करना चाहती है। नए भारत में विकास के लिए आवश्यक सांस्कृतिक पूंजी के प्रसार को मध्यमवर्ग तक सीमित न रख कर वहां तक पहुंचाना चाहती है जहां इसे खरीदने की क्रयशक्ति नहीं है, जहां इसकी सुविधा नहीं है और इसके अभाव में जहां विकास के बाधक फल-फूल रहे हैं। यही इस नीति की सुंदरता और सीमा है। उदाहरण के लिए, जिन आयामों और गुणों को इस शिक्षा नीति में मानव विकास का संकेतक माना गया है, उन्हें भारत का विशालकाय मध्यम वर्ग आधुनिक प्रगतिशील स्कूलों और उच्च शिक्षा के चुनिंदा श्रेष्ठ केंद्रों में खरीद रहा है, लेकिन जो बड़ा जनसमुदाय इसके दायरे से बाहर है वहां भी इस सांस्कृतिक पूंजी को पहुंचाने का नैतिक और कानूनी दायित्व राज्य को सौंपना इस नीति का ध्येय है। इस नीति में औपचारिक शिक्षा की एक नई रूपरेखा सुझाई गई है जिसके अंतर्गत किसी भी व्यक्ति के लिए तीन वर्ष की आयु से अठारह वर्ष की आयु तक शिक्षा का प्रबंध है। उल्लेखनीय पक्ष यह है कि पूर्व विद्यालयी शिक्षा को शिक्षा के अधिकार कानून और ‘पोषण के साथ सीखने’ की आधारभूत मान्यता के रूप को भी औपचारिक शिक्षा से जोड़ा गया है। इसके लिए यथोचित उपाय किए गए हैं, लेकिन इनमें आंतरिक विसंगतियां भी हैं। जैसे- इस नीति में गुरुकुल, मदरसों और परिवारों, सीखने के सांस्कृतिक तरीकों का संदर्भ लिया गया है और उनकी विशेषताएं बताई गई हैं। यह भी सुझाव है कि इन्हें आने वाले समय में स्कूल की संस्था में स्थापित कर दिया जाए। इस सुझाव के मूल में ही विरोधाभास है। गुरुकुल या परिवार, नौकर-हाकिम जैसे संबंधों से नहीं चलते। इसी तरह, स्कूलों के लिए राष्ट्रीय शिक्षक कार्यक्रम और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग जैसी संस्तुतियां भी विसंगति युक्त हैं।

इस दस्तावेज के प्रत्येक खंड में जिन लक्ष्यों का उल्लेख किया गया है, वे बेहद रूमानी, आकर्षक और उम्मीद जगाने वाले हैं। लेकिन जैसे-जैसे इन अध्यायों में आगे बढ़ते हैं, बिखराव और वैकल्पिक प्रयोगों की सूचियों देखने को मिलती हैं। ये वैकल्पिक प्रयोगों की सूचियां वैसी ही हैं, जैसे किसी शोध प्रबंध के अंत में निहितार्थ, भावी सुझाव दे दिए जाते हैं। इनमें यह मान्यता अंतर्निहित है कि उच्च शिक्षा को शोधोन्मुख करना तमाम समस्याओं का हल है। हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भारत के विश्वविद्यालयों में हुए शोध कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। ऐसी स्थिति में बिना समुचित तैयारी के शोध का राग अलापना उच्च शिक्षा में वैसी ही स्थिति न पैदा कर दे, जैसे प्रोजेक्टों के नाम पर माध्यमिक शिक्षा में खानापूर्ति हो रही है।

यह अवलोकन महत्त्वपूर्ण है कि प्रस्तावित नीति केवल बौद्धिक विकास द्वारा अर्जित चेतना की सीमा को रेखांकित करती है। इसी कारण पूर्व प्राथमिक से शोध स्तर तक रचनात्मक, गैर-परंपरागत चिंतन, सामाजिक-नैतिक सरोकार आदि को महत्त्व दिया गया है। मनुष्य कहीं रोबोट न बन जाए, कहीं उसका संस्कृति बोध कमजोर न हो, कहीं वह आत्म-केंद्रित आर्थिक प्राणी न रह जाए, इसकी चिंता बराबर बनी हुई है। इसी चिंता से मुक्ति के लिए ‘लिबरल आर्ट्स’ को इस नीति में पर्याप्त स्थान दिया गया है। खासकर उच्च शिक्षा के लिए इसे अपरिहार्य कर दिया गया है। इसे उपदेशात्मक न बना कर खुद की जिज्ञासा, अभिक्षमता और अभिरुचि के अनुरूप विकसित करने का लक्ष्य है। देखना यह है कि ज्ञान आधारित समाज के लिए बनी इस नीति में कला-संस्कृति-समाज के पक्ष को संजोए ये उदार विषय किताबी हर्फ से सीखने की संस्कृति का हिस्सा कैसे बनेंगे? कैसे बाजार के लिए ज्ञान के शोर में ज्ञान के सामाजिक-नैतिक सरोकार व्यक्ति के चेतना में प्रकट होंगे?

सवाल यह है कि वह भारतीय जिसकी बोली, भाषा, गणित, विज्ञान, अध्यात्म में ‘भारतीयता’ है लेकिन उसकी आवाज राज्य के प्रतिष्ठानों जैसे स्कूलों, अदालतों, दफ्तरों तक नहीं पहुंच पा रही है, उसे क्या यह शिक्षा नीति कुछ दे पाएगी? क्या ‘दक्षता’ को परिभाषित करने का सांस्कृतिक नजरिया, बाजारवादी नजरिए के बीच अपना रास्ता तलाश पाएगा? क्या शोध के रास्ते उच्च शिक्षा मौलिक चिंतन, विश्लेषणात्मक दृष्टि और सृजनधर्मिता द्वारा ज्ञान के भारतीय संस्करण की नींव डल पाएगी? क्या नौकरी के प्रयोजनमूलक लक्ष्य को स्वालंबन की ताकत से स्थानांतरित किया जा सकता है? अब जबकि औद्योगिक क्रांति के सामाजिक-सांस्कृतिक-पर्यावरणीय (दुष्)परिणाम, हमारे सामने हैं, तब क्या भावी पीढ़ी अपने समाज के विकास के लिए कोई नया सांस्कृतिक-राजनीतिक-आर्थिक आख्यान गढ़ पाएगी?

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