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राजनीति: मानसून की पहेली और संकट

प्राकृतिक रूप से मानसून 19 जून तक देश के दो तिहाई हिस्से तक पहुंच जाता था। इस बार उस समय तक यह सिर्फ बारह फीसद क्षेत्र को ही कवर कर पाया। बारह फीसद का यह इलाका इतना छोटा है कि मानसून आने के दरवाजे यानी केरल और उसके नजदीकी इलाकों तक ही सिमट जाता है। जाहिर है, कृषि प्रधान देश में किसानों के लिए एक भयावह स्थिति है।

Author June 25, 2019 1:14 AM
साल 2013 में मानसून की रफ्तार सबसे तेज थी जब यह 16 जून तक पूरे भारत में पहुंच गया था। (Express photo by Nirmal Harindran)

सुविज्ञा जैन

मानसून की गड़बड़ी इतना छोटा संकट नहीं है। चाहे मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक हों, चाहे मीडिया, किसी की भी तरफ से उतनी चिंता जताई जाती नहीं दिख रही। आसन्न संकट के अंदेशे न जताए जाने का एक मतलब यह है कि किसी आपदा से निपटने की तैयारी शुरू न होना। बरिश को लेकर अब तक की भविष्यवाणियों की बड़ी फजीहत हो चुकी है। मौसम वैज्ञानिक बता रहे थे कि इस बार मानसून समय पर आएगा। लेकिन मानसून ने एक-दो दिन नहीं, बल्कि पूरे सात दिन देर से दस्तक दी। देर से दस्तक के बाद एक और अड़चन आ गई। मानसून जिस रफ्तार से पूरे देश तक पहुंचता था, वह रफ्तार इस बार एकदम रूक-सी गई है। इसी तरह पहले बताया जा रहा था कि वायु नाम का चक्रवात मानसून की प्रणाली को गड़बड़ा सकता है। लेकिन चक्रवात तट को छुए बगैर ही गुजर गया। लेकिन अब कहा जा रहा है कि इस चक्रवात ने वातावरण की नमी सोख ली। इसी तरह मानसून को आगे बढ़ने में दिक्कत आने के भी नए कारण ढ़ूंढ़े जा रहे हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इस युग में कम से कम छोटी अवधि के पूर्वानुमान तो इतने नहीं गड़बड़ाने चाहिए।

बहरहाल नई सूचना यह है कि मानसून कछुए की चाल से बढ़ रहा है, सो इस बार पूरे देश में मानसून फैलने में तीन से चार हफते का समय और लग सकता है। इस देरी के क्या-क्या असर होंगे? और अनागत की जो आशंकाएं हैं, उनसे निपटने के लिए क्या तैयारियां सोची जा रही हैं? इक्का-दुक्का मीडिया रिपोर्ट के अलावा ये सारी बातें विशेषज्ञ चेतावनियों और खबरों से लगभग गायब हैं। यह बात दो महीने पहले कही गई थी कि इस बार अल निनो सक्रिय है। अल निनो यानी समुद्र में एक निश्चित क्षेत्र का पानी गर्म होना। इसके बारे में वैज्ञानिक तथ्य यह है कि अन निनो के सक्रिय होने वाले साल में भारत में बारिश कम होती है। लेकिन इस साल यह पता होने के बाद भी हाल के इस पूर्वानुमान को भी खारिज कर दिया गया था और कहा गया था कि जून में अगर अल निनो का असर हुआ भी तो वह जुलाई या आगे के दो महीनों में खत्म हो जाएगा। जून के बाईस दिन गुजरने के बाद भी मानसून फैलने का जो कुदरती अंदाज है, वह बता रहा है कि आफत बड़ी भी आ सकती है। गौरतलब है कि सरकारी मौसम विभाग इस समय जो आंकड़े पेश कर रहा है, वे एक बड़े अंदेशे का इशारा कर रहे हैं।

प्राकृतिक रूप से मानसून 19 जून तक देश के दो तिहाई हिस्से तक पहुंच जाता था। इस बार उस समय तक यह सिर्फ बारह फीसद क्षेत्र को ही कवर कर पाया। बारह फीसद का यह इलाका इतना छोटा है कि मानसून आने के दरवाजे यानी केरल और उसके नजदीकी इलाकों तक ही सिमट जाता है। जाहिर है, कृषि प्रधान देश में किसानों के लिए एक भयावह स्थिति है। खासतौर पर उस देश में जहां आधी से ज्यादा खेती बारिश के सहारे ही होती है। वैसे जहां सिंचाई की व्यवस्था भी है, वहां भी हालत कम बुरी नहीं है। उत्तर भारत के कुछ इलाके छोड़ कर देश के लगभग सभी बांधों में पानी लगभग खत्म ही है। यानी मानसून की और ज्यादा गड़बड़ी कुछ ज्यादा ही बड़ी आफत पैदा कर सकती है। लेकिन सरकारी विभागों की तरफ से अभी भी बारिश का नया पूर्वानुमान जारी नहीं हुआ है।

यह भी एक तथ्य है कि मानसून का तय समय शुरू हुए अभी बाईस दिन ही गुजरे हैं। हो सकता है कि बाकी सवा तीन महीने में अच्छी बारिश हो जाए और देश में इस साल बारिश का आंकड़ा सामान्य बारिश के आसपास पहुंच जाए। लेकिन यह स्थिति पानी की भारी कमी यानी सूखे से भी ज्यादा विकट स्थिति पैदा कर सकती है। अगर सरकारी भविष्यवाणियों के मुताबिक चार महीने में गिरने वाला कुल पानी तीन महीने में गिर गया तो देश में कई जगह बाढ़ की विभीषिका तय मानिए।

वैसे देश को पिछले कुछ साल से नया अनुभव होने लगा है कि देश में सामान्य बारिश होने के बाद भी आधा देश सूखे की चपेट में आ जाता है। पिछले साल यही हुआ था। इतना ही नहीं, कम बारिश होने के बाद भी कई जगह बाढ़ से तबाही हम नहीं रोक पा रहे हैं। हो सकता है कि मौसम वैज्ञानिकों और सामान्य प्रशासकों के लिए यह उतनी बड़ी बात न हो, लेकिन प्रबंधन प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों और नीतिकारों के लिए इससे ज्यादा शर्म की क्या बात होगी? बहरहाल, इस समय आसार ये हैं कि यह साल पृथ्वी विज्ञान के विद्वानों, खासतौर पर मौसम वैज्ञानिकों और देश के जल वैज्ञानिकों के सामने कई सवाल खड़े कर सकता है। वैसे उनके पास एक ही जवाब होगा कि क्या करें, प्रकृति के खेल में हम दर्शकभर हैं।

फिलहाल सवाल पूर्वानुमानों की गड़बड़ी का भी उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है। अगर सही और सटीक भविष्यवाणियां हो भी जाएं तो चिंता जताने के अलावा क्या कर लेंगे? लेकिन नहीं। ये चिंताएं बड़े काम की होती हैं। ये चिंताएं ही हमें चिंताशील बनाती हैं। अपनी वर्तमान और अनागत समस्याओं के समाधान खोजने के लिए मौका बनाती हैं। इसीलिए वैज्ञानिकों और विद्वानों की जिम्मेदारी है कि वे हमें चिंता बताते चलें। किसी आसन्न संकट को हल्का करके न बताएं। मसलन, इस बार अल निनो के असर, मानसून आने में देरी और मानसून में ठहराव के पूर्वानुमानों को बताने में वैज्ञानिक शोधों की कमी हो सकती है। लेकिन जिस तरह से मानसून पूर्व की बारिश की कमी के आंकड़ों पर चिंता नहीं जाताई गई, उसका कोई तर्क नहीं हो सकता। बल्कि होता यह रहा है कि चारों तरफ पानी को लेकर मचे हाहाकार के बीच भी यही दावे किए जाते रहे कि हमारे बांधों में पर्याप्त पानी है। मीडिया भी हर साल की तरह शहरों में घड़े, बाल्टी और टैंकरों की समस्या बताता रहा। अगर बांधों में पर्याप्त पानी जैसे दावों की पड़ताल होगी तो यही पता चलेगा कि यह दावा इस आधार पर किया गया कि पिछले साल इन दिनों इतना ही पानी बांधों में बचा था। यह बात नहीं बताई गई कि पिछले साल भी ऐसा ही संकट था। पिछले साल ही नहीं, बल्कि पिछले कई साल से देश में बारिश के पानी के भंडारण की क्षमता जहां की तहां है। जबकि बढ़ती आबादी और उद्योग के लिए पानी की जरूरत बढ़ती ही जा रही है। पांच साल पुरानी जल भंडारण क्षमता को हम यह नहीं मान सकते कि आज वह सामान्य है। जरूरत साल दर साल जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की थी।

इस बार मानसून के संकट के साथ एक सकारात्मक बात जरूर है। वह यह कि इत्तेफाक से देश में मानसून सत्र के दौरान ही पानी को लेकर हाहाकार मचा है। चाहे वह सूखे को लेकर हो या फिर बाढ़ को लेकर। जाहिर है, संसद के इस सत्र में जल प्रबंधन और जल परियोजनाओं खासकर जल भंडारण यानी बांधों और जलाशयों की बात जरूर होगी। बजट में पानी जैसी प्राथमिक जरूरतों पर प्रावधानों की बात जरूर आएगी। चूंकि किसानों और खेती की बात हर बजट में करनी ही पड़ती है, सो इस बार वह होगी ही। स्वाभाविक है कि आसन्न संकट के कारण जल प्रबंधन पर विशेष बजटीय प्रावधान जरूर सोच लिए गए होंगे। यानी इस बार वित्तमंत्री के बजट भाषण में देश के चिंतनीय जल प्रबंधन पर कुछ नया जरूर होना चाहिए।

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