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राजनीतिः सवाल बच्चों के भविष्य का

बात सिर्फ नवजातों और कम उम्र के बच्चों की मौत तक ही सीमित नहीं है। भारत में बच्चों में बढ़ रहा मोटापा भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में खुलासा किया है कि 2025 तक भारत में एक करोड़ सत्तार लाख बच्चे मोटापे से ग्रस्त होंगे और इस मामले में भारत एक सौ चौरासी देशों की सूची में दूसरे पायदान पर होगा।

यूनिसेफ के अनुसार राजस्थान में बयासी फीसद विवाह अठारह साल से पहले ही हो जाते हैं।

अरविंद कुमार सिंह

हाल में संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में यह खुलासा चिंतित करने वाला है कि बच्चों के स्वस्थ जीवन के लिए उपयुक्त वातावरण और बुनियादी सुविधाओं के मामले में भारत दुनिया में सतहत्तरवें स्थान पर है। इस रिपोर्ट में बच्चों के जीवित रहने और बेहतर भविष्य की संभावनाओं के आधार पर भारत को एक सौ इकत्तीसवें स्थान पर रखा गया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी इस रिपोर्ट में दुनिया के एक सौ अस्सी देशों की सूची बनाई गई है। रिपोर्ट में बच्चों के जीवित रहने की संभावना का आकलन करने के लिए पांच साल तक बच्चे के जीवित बचने की उम्मीद, आत्महत्या, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, स्वच्छता और गरीबी जैसे मापदंडों को आधार बनाया गया है। वहीं, बच्चों के बेहतर भविष्य की संभावनाओं को जानने के लिए शैक्षिक उपलब्धियां, पोषण, विकास और हिंसा से बचाव जैसे मानक को आधार बनाया गया है।

इन सभी कसौटियों पर गौर करें, तो बच्चों के ममाले में भारत की स्थिति बेहद गंभीर है। पिछले वर्ष डाटा एनालिस्ट इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि भारत में जन्म लेने वाले नवजातों के जीवित रहने की संभावना अन्य देशों के मुकाबले बेहद दयनीय है। रिपोर्ट में इस बात पर को लेकर चिंता जताई गई थी कि स्वास्थ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रयास के बावजूद भारत में नवजात शिशु मृत्यु दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत में विभिन्न प्रकार के रोगों से हर साल 48.10 फीसद नवजातों की मौत हो जाती है जो दुनिया में नवजातों की कुल मौतों का तकरीबन छब्बीस फीसद है। इनमें 5.40 फीसद नवजात संक्रमण, बारह फीसद निमोनिया, 12.90 फीसद सांस में अवरोध, 7.10 फीसद दूसरी गंभीर बीमारियों से मर जाते हैं और सबसे अधिक 48.10 फीसद मौतें समय पूर्व जन्म से होती हैं। अगर इन बीमारियों से निपटने का समुचित इलाज हो तो अधिकांश नवजातों की जिंदगी बचाई जा सकती है। हर वर्ष तकरीबन सात लाख नवजात की मौत ऐसी बीमारियों से होती है, जिनका इलाज संभव है लेकिन उन्हें मिल नहीं पाता है।

पिछले साल प्रकाशित जनसंख्या स्थिरता कोष के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में जीवित पैदा हुए प्रति एक हजार बच्चों में से अट्ठावन बच्चे मौत के मुंह में चले जाते हैं। विकसित देशों में यह संख्या पांच से भी कम है। ‘सेव द चिल्ड्रन’ रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि भारत मां बनने के लिहाज से दुनिया के खराब देशों में शुमार है। देश के जिन हिस्सों में भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा, भ्रष्टाचार और जागरूकता की कमी है, वहां नवजात शिशुओं और गर्भवती माताओं की मृत्यु दर सबसे अधिक है। भारत में बाल विवाह का प्रचलन अभी भी है। यह एक महज सामाजिक बुराई भर नहीं है, बल्कि यह नवजात शिशुओं की मृत्यु दर का एक महत्त्वपूर्ण कारण भी बनता जा रहा है। कम उम्र में विवाह होने से लड़कियां शीध्र मां बन जाती हैं जिससे प्रसव के दौरान उनकी जान जाने का खतरा बना रहता है और साथ ही पैदा होने वाला शिशु भी कमजोर होता है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और एक गैर सरकारी संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि गांव के साथ महानगर भी बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई की चपेट में हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और जम्मू-कश्मीर में बड़े पैमाने पर बाल विवाह हो रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली भी इस कुरीति से बची नहीं है। राजस्थान, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक और दादरा नगर हवेली में सबसे ज्यादा बाल विवाह के मामले सामने आए। यह स्थिति तब है जब देश में बाल विवाह निरोधक कानून अमल में है और सरकारें व स्वयं सेवी संगठन बाल विवाह के खिालफ जागरूकता कार्यक्रम चला रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक बाल विवाह के मामले में दुनिया में भारत दूसरे स्थान पर है। भारत में दुनिया के चालीस फीसद बाल विवाह होते हैं। उनचास फीसद लड़कियों का विवाह अठारह वर्ष से कम आयु में हो जाता है। यूनिसेफ के अनुसार राजस्थान में बयासी फीसद विवाह अठारह साल से पहले ही हो जाते हैं। बाल विवाह की वजह से शिशु को जन्म देते वक्त दुनिया भर में होने वाली कुल मौतों में सत्रह फीसद मौतें अकेले भारत में होती है। यही नहीं, वे गंभीर बीमारियों की चपेट में भी आ जाती हैं।

बात सिर्फ नवजातों और कम उम्र के बच्चों की मौत तक ही सीमित नहीं है। भारत में बच्चों में बढ़ रहा मोटापा भी बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है। अमेरिका के बोस्टन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में खुलासा किया है कि 2025 तक भारत में एक करोड़ सत्तार लाख बच्चे मोटापे से ग्रस्त होंगे और इस मामले में भारत एक सौ चौरासी देशों की सूची में दूसरे पायदान पर होगा। मौजूदा समय में चीन में करीब डेढ़ करोड़ बच्चे मोटापे संबंधी बीमारियों के शिकार हैं। बीते एक दशक में भारत में मोटापे से ग्रस्त लोगों की संख्या दोगुनी हुई है। अमेरिका में सबसे ज्यादा करीब आठ करोड़ वयस्क मोटापे से ग्रस्त हैं। चीन दूसरे नंबर पर है जहां यह आंकड़ा पांच करोड़ तिहत्तर लाख है। जांच अध्ययनों में पाया गया है कि शीतल पेय में 200, पिज्जा में 300, केक में 120 और बर्गर में 200 कैलोरी होती है जो मोटापा बढ़ाने के लिए पर्याप्त है। एसोचैम और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी कई रिपोर्टे काफी पहले से आगाह कर रही हैं। अब रक्तचाप, मधुमेह, हड्डियों की कमजोरी और मोटापे जैसी बीमारियां बच्चों और नौजवानों को भी तेजी से अपनी जद में ले रही हैं।

अगर बच्चों की सुरक्षा के संदर्भ में देखें तो भी भारत की स्थिति बेहद खराब है। देश में प्रतिदिन एक दर्जन से अधिक बच्चे लापता होते हैं या उनका अपहरण किया जाता हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी कह चुका है देश में हर साल चालीस हजार से अधिक बच्चे गुम होते हैं। इसके अलावा भारत दुनिया में चौदह साल से कम उम्र के सबसे ज्यादा बाल श्रमिकों वाला देश है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक दुनिया भर में तकरीबन बीस करोड़ से अधिक बच्चे जोखिम भरे कार्य करते हैं और उनमें सर्वाधिक संख्या भारतीय बच्चों की है। एक अनुमान के मुताबिक इस समय देश में सवा करोड़ से अधिक बाल श्रमिक मौजूद हैं। इनमें से चालीस फीसद निरक्षर हैं और कभी स्कूल भी नहीं गए। छब्बीस फीसद बाल मजदूर नौ से ग्यारह साल की उम्र के हैं, जबकि बीस फीसद 11 से 12 साल, चौंतीस फीसद 12 से 13 साल और शेष इससे अधिक के उम्र के हैं। करीब पच्चीस फीसद बाल श्रमिक शहरों में रहते हैं जबकि तीन-चौथाई गांवों में। इन्हें औसतन पांच सौ बारह सौ रुपए महीने मजदूरी मिलती है। केवल पंद्रह फीसद बाल श्रमिकों को ही तीन हजार रुपए महीने मिल पाते हैं।

यूनिसेफ के मुताबिक विश्व में करीब दस करोड़ से अधिक लड़कियां विभिन्न खतरनाक उद्योग-धंधों में काम कर रही हैं। बच्चों की शिक्षा का भी यही हाल है। भारत में शिक्षा का अधिकार कानून तथा सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं के बावजूद लाखों बच्चे स्कूली शिक्षा की परिधि से बाहर हैं। वर्ष 2014 में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार छह से चौदह साल की आयु समूह में स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या साठ लाख के करीब थी। आज देश में पांच करोड़ ऐसे बच्चे हैं जिन्हें शिक्षा हासिल नहीं है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षा से वंचित बच्चों की संख्या भी करोड़ों में है। उचित होगा कि सरकार एवं समाज दोनों ही बच्चों को स्वस्थ और उचित माहौल देने में प्रभावकारी भूमिका निभाएं।

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