ताज़ा खबर
 

राजनीति: पितृसत्ता के बरक्स स्त्री की छवि

महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ने से उनमें आलोचनात्मक चेतना विकसित हुई है, जिसके कारण वे अब सवाल करती हैं।

Author Published on: January 15, 2020 1:28 AM
पुरुष सत्ता द्वारा महिलाओं को इसी सूचना तंत्र द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है।

मनुष्य प्रारंभ से ही एक सृजनशील प्राणी रहा है। लेकिन सूचना क्रांति के बाद से उसकी सृजनशीलता का प्रौद्योगिकीकरण होता गया। विश्व भर में सूचना की शक्ति की सहायता से एक नए तरह के बौद्धिक उपनिवेशवाद को कायम करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसने लोगों के मस्तिष्क को नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। इसलिए लोग अब इन सूचनाओं पर सवाल नहीं उठाते, तर्क नहीं करते, अपितु सरलता से उन पर यकीन कर लेते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को और पुरुष सत्ता द्वारा महिलाओं को इसी सूचना तंत्र द्वारा नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियो अपलोड किए जा रहे हैं जिसमें युवा लड़कियों की गलत छवि को प्रस्तुत किया जा रहा है।

यह आश्चर्यजनक है कि पुरुष सत्ता के द्वारा निर्मित इस कथित सांस्कृतिक बाजार ने लड़कियों को ही क्रय-विक्रय की वस्तु के रूप में विकृत छवि प्रस्तुत करने के लिए प्रयुक्त किया है। अधिकांश वीडियो में ये युवा लड़कियां समृद्ध परिवार के लड़कों को प्रेम के जाल में फंसाते हुए दिखाई जाती हैं और जब उसके पास पैसा समाप्त हो जाता है तो उनको छोड़ कर चली जाती हैं या फिर वे एक साथ एक ही समय पर कई लड़कों से दोस्ती रखते हुए उन सबको धोखा देती दिखाई जाती हैं। इस घटनाक्रम में लड़का स्वयं को एक पाक दामन वाले व्यक्ति के रूप में इस तरह से प्रस्तुत करता है जैसे उसे फंसा कर पैसा ऐंठने की साजिश लड़की ने की है। यह केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है, बल्कि समाज में कई लोगों से बातचीत के दौरान यह सुना जा सकता है कि आजकल की लड़कियां धोखा देने में लड़कों से ज्यादा शातिर हैं या फिर आजकल के लड़के ज्यादा सीधे होते हैं बजाय लड़कियों के।

यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि विकास के विभिन्न आयामों के कारण महिलाओं ने घरेलू एवं गैर-घरेलू दोनों ही क्षेत्रों में सीमित ही सही, पर स्वतंत्र एवं आत्मनिर्भर बनने की ओर कदम बढ़ाए हैं। यह प्रयास उसे पुरुषसत्ता के सम्मुख अपने वजूद की तलाश करती हुई एक लड़की के रूप में प्रस्तुत करता है। हिंदी भाषी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा लड़कियों के स्वतंत्र वजूद को मानने के लिए सांस्कृतिक रूप से तैयार नहीं है। बलात्कार, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा, अंतरजातीय विवाह करने पर खाप पंचायतों के हिंसक फैसले, दहेज को बाजार का हिस्सा बनाने का प्रयास, महिला श्रम का शोषण एवं घरेलू हिंसा सहित ऐसे अनेक पक्ष हैं, जिनके माध्यम से महिला को आज्ञाकारी बने रहने के आदेश दिए जाते हैं। चूंकि महिलाओं ने अनेक अवसरों पर इसके विरुद्ध आवाज उठाई है (मी-टू अभियान की चर्चा इस संदर्भ में की जा सकती है), अत: उनकी छवि को धूमिल करने के लिए इस तरह के वीडियो सामने आ रहे हैं। इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया पर लड़कियों को अपमानित करने की एक कोशिश है और साथ ही यह परोक्ष संदेश भी कि ऐसी लड़कियों के साथ किसी भी प्रकार का व्यवहार सामाजिक दृष्टि से अपराध नहीं माना जाना चाहिए, भले ही वैधानिक संस्था इस व्यवहार को अपराध की श्रेणी में रखती हो।

किसी महिला के साथ जब दुर्व्यवहार होता है या हिंसा होती है, तो सारी दुनिया उस घटना के पीछे औरत की गलती ढूंढ़ने लग जाती है, जैसे उसके कपडेÞ छोटे थे या कम थे, देर रात को अकेले घर से बाहर थी, लड़कों के साथ घूमती है, आवारा है आदि-आदि। क्यों है ऐसी मानसिकता? पुरुष द्वारा स्त्री को महज सजावट की एक वस्तु मानना, यौन-इच्छा पूर्ति का साधन मानना, बिना मस्तिष्क के शरीर के रूप में स्वीकारना न केवल उसके अस्तित्व को नकारने के समान है, बल्कि उसके प्रति विश्वासघात भी है। किसने अधिकार दिया समाज को महिला के साथ इस तरह के व्यवहार करने का- धर्म ने या संविधान ने? संभवत: किसी ने नहीं तो फिर क्यों आजादी के इतने बरसों के बाद भी महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव नहीं आ पाया है?

अनेक क्षेत्रों में लैंगिक असामनता के पक्षों को देखा जा सकता है। जैसे राजस्थान के सार्वजनिक और निजी विश्वविद्यालयों में कोई भी महिला कुलपति नहीं है। राजनीतिक फैसलों में महिला राजनेताओं को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता है। विधायिका में उनकी उपस्थिति बहुत ही सीमित है। वेतन और रोजगार के मामले में पुरुष और महिला कर्मचारियों में भेदभाव हर जगह पाया जाता है। उनका विभिन्न क्षेत्रों में उच्च पदों की ओर बढ़ना पितृसत्ता के प्रभुत्व के लिए एक गंभीर खतरा है। इसे भारत में महिलाओं के खिलाफ तेजी से बढ़ते अपराधों के लिए भी जिम्मेदार माना जा सकता है। यहां ये सवाल उठते हैं कि क्या यह महिलाओं की सहभागिता को रोकने की कोशिश का एक परिणाम है? क्या इसी कारण महिलाओं के विरुद्ध हिंसा बढ़ी है? चूंकि आर्थिक क्षेत्र में महिलाओं की सहभागिता बढ़ने से वे आत्मनिर्भर बनी हैं, जिससे पितृसत्ता का उन पर नियंत्रण कमजोर हुआ है, परिणामस्वरूप पुरुषों में आक्रामकता व हिंसा बढ़ी है।

महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ने से उनमें आलोचनात्मक चेतना विकसित हुई है, जिसके कारण वे अब सवाल करती हैं। उन्होंने इस मिथक को तोड़ दिया है कि वे केवल भावनात्मक इकाई हैं, तार्किक नहीं। एक तरफ महिलाएं पारंपरिकता और आधुनिकता के मध्य संघर्ष की शिकार हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें बाजार के कट्टरतावादी चरित्र ने हाशिए पर पंहुचा दिया है। इन पक्षों ने ऐसी समाज व्यवस्था को निर्मित किया है जहां लैंगिक असमानता गहराई से स्थापित हो चुकी है। इस तरह की असमानता को चुनौती दी जा सकती है, अगर समाज के विभिन्न वर्ग संवैधानिक नियमों के आधार पर जनांदोलन का नेतृत्व करें। साथ ही इसमें जनप्रतिनिधि, नौकरशाह, न्यायपालिका और मीडिया भी पक्षपातरहित तरीके से योगदान दे। वास्तव में क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता और जातिवाद वे ताकतें हैं जो कभी भी महिलाओं को पुरुषों के साथ समतावादी संबंध रखने की अनुमति नहीं देती हैं। इन ताकतों को संवैधानिक नियमों की सहायता से ही चुनौती दी जा सकती है।

सवाल यह है कि क्या राज्य संविधान के इन नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए गंभीर हैं? यदि हां, तो लैंगिक समानता यथार्थ का रूप ले सकती है। परंतु समाज का बुनियादी ढांचा चूंकि पुरुष सदस्यों द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए समाज का समग्र ढांचा महिलाओं के खिलाफ हो जाता है। वास्तव में घरेलू और गैर-घरेलू दोनों क्षेत्रों में उसे अधीनस्थ माना जाता है, विभिन्न क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति और उपलब्धियों को इस तथ्य के बावजूद अहमियत नहीं दी जाती है कि वह भी मौलिक अधिकारों से जुड़ी है। यहां यह सवाल उठता है कि पहले समाज में महिला की ‘अधीनस्थ छवि’ प्रस्तुत की जाती थी (पिता, पति, पुत्र की अधीनस्थता) और अब नकारात्मक छवि (सोशल मीडिया में), तो आखिर इसके पीछे समाज की क्या मानसिकता है?

आश्चर्य इस बात का है कि नियामक संस्थाओं का इस ओर या तो ध्यान नहीं गया है या फिर ये संस्थाएं महिलाओं की गरिमा को गिराने के इन प्रयासों का कहीं न कहीं समर्थन करती हैं। महिला संगठनों और शिक्षक संगठनों का इस प्रकार के वीडियो पर मौन बने रहना न केवल अखरता है अपितु ऐसा लगता है कि महिलाओं के साथ प्रतिदिन होने वाले अपमान को इन सबने एक स्वाभाविक घटना मान लिया है। यह केवल तभी समाप्त किया जा सकता है जब महिला पवित्रता एवं यौनिकता के पुरुष-सत्तात्मक नियंत्रण को तोड़े और स्वयं को समाज व्यवस्था का हिस्सा बनाए।

ज्योति सिडाना

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 राजनीति: चुनौती बनती मानसिक बीमारियां
2 राजनीतिः बैंकिंग क्षेत्र की चुनौतियां
3 राजनीति: फसल बीमा योजना पर उठते सवाल
ये पढ़ा क्या?
X