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राजनीति: किसान और भूमि कानून

देश को एक नई भूमि व्यवस्था की जरूरत है ताकि बढ़ती आबादी की खाद्यान्न जरूरतें पूरी की जा सकें और खाद्यान्न में हम हमेशा आत्मनिर्भर बने रहें। इसके लिए देश में भूमि व्यवस्था का समान कानून हो तो किसानों की समस्याएं कम की जा सकती हैं। यह किसी पहाड़ी या मैदानी प्रांत का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे पूरे देश के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है।

Author July 23, 2019 1:15 AM
देश में जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ परिवार भी बंटते चले गए।

भगवती प्रसाद डोभाल

देश में जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ परिवार भी बंटते चले गए। जो कभी एक परिवार था, दो-तीन पीढ़ियों के बाद वह कई परिवारों में बंट गया। इसका परिणाम यह हुआ कि परिवारों के बीच जमीन का बंटवारा भी तेजी से होने लगा। इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह सामने आया कि खेती करने में कठिनाई आने लगी और भूमि के टुकड़े-टुकड़े होने से उपज भी प्रभावित होने लगी। मैदानी हिस्सों में यह समस्या विकराल नहीं हुई है, पर आने वाले समय में यह समस्या बढ़ेगी। इसलिए गांव में हर परिवार खेती पर आश्रित नहीं रह पाएगा। इस आने वाली समस्या पर नीति निर्माताओं को ठोस दिशा-निर्देश तय करने होंगे, ताकि उन पर सही अमल हो सके। विकसित देशों ने इस समस्या के हल में एक निश्चित प्रतिशत को ही खेती करने का काम सौंपा है। जबकि हमारे यहां रोजगार के ऐसे साधन नहीं जुटे हैं, जिनके हिसाब से खेती करने के लिए जनसंख्या का निश्चित अनुपात हो और बाकी अन्य धंधों से जीवनयापन कर सकें। यही समस्या है जो आए दिन किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर कर रही है।

यह समस्या पूरे भारत की है। किसान आत्मनिर्भर नहीं हो पा रहे हैं। जिन संसाधनों की खेती करने में जरूरत पड़ती है, उन्हीं को जुटाते हुए अच्छी उपज की आस लिए किसान कर्ज पर कर्ज लेता है, यह सोच कर कि फसल अच्छी होगी तो कर्ज निपटा देगा। लेकिन मौसम की मार या अन्य कारणों से उपज इतनी नहीं हो पाती जिससे बैंकों का कर्ज चुका सके। साथ ही, बाजार किसान के हाथ में नहीं होता, बिचौलिए ही अपनी जेबें भरते रहते हैं। किसान को उसका समर्थन मूल्य तक नहीं मिल पाता। यह परेशानी पूरे देश के किसानों की है। दूसरी तरफ पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों की भूमि कहीं समतल तो कहीं सीढ़ीदार होने के कारण टुकड़ों-टुकड़ों में बंटने से उन्हें कोई आमद नहीं हो पा रही है। एक जगह पर समुचित भूमि के अभाव में पैदावार नहीं हो पाती है। तराई के क्षेत्रों को छोड़ कर, क्योंकि उन स्थानों पर खेत इतनी तेजी से नहीं विभाजित हुए हैं जितनी तेजी से पहाड़ी इलाकों में हुए हैं। कुछ उद्यानों को छोड़ कर जैसे चंबा मसूरी का फ्रूट बेल्ट लोगों को बाद में आबंटित हुआ था, इसी तर्ज पर और फल-पट्टियां हैं जो एक ही किसान के पास होने से उसकी आजीविका का साधन है। लेकिन उनकी देखरेख भी सही नहीं है।

इसी संदर्भ में पिछले दिनों उत्तराखंड में एक नया भूमि कानून पास हुआ जो वहां के भूमि प्रयोग को प्रभावित करेगा। इस कानून के तहत उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश और भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 में बदलाव किया गया है। इस बदलाव से उत्तराखंड का किसान अपने को सुरक्षित नहीं महसूस कर रहा है। कारण यह है कि उद्योगों या किसी परियोजना के लिए उसकी जमीन का अधिग्रहण औने-पौने दामों में हो सकता है।

इस कानून के अंतर्गत धारा-143, जो कृषि भूमि को गैर कृषि के लिए अधिकृत की जा सकती है, को इसमें सम्मिलित किया गया है। इस संशोधन से किसानों पर यह प्रभाव पड़ेगा कि जिस खेत का इस्तेमाल वे खेती के लिए कर रहे थे, उसको अन्य कार्यों के लिए अधिकृत किया जा सकता है, यानी उपज देने वाली जमीन अन्य उद्योग-धंधों को खोलने के लिए इस्ेतमाल की जा सकती है। इसी तरह धारा-154 पहले साढ़े बारह एकड़ से अधिक भूमि को प्रदेश में खरीदने से रोकती है। अब इसमें संशोधन करके उप धारा-2 जोड़ने से पर्वतीय क्षेत्र में भूमि की खरीद के लिए कोई सीमा नहीं होगी। यानी किसान अपने खेतों से उद्योगों के नाम पर बेदखल हो सकता है।

उत्तराखंड जब बना था, तब बाहरी लोगों द्वारा भूमि खरीदने की आशंका को देखते हुए तत्कालीन सरकार साल 2002 में हिमाचल के भूमि कानून के अनुसार अध्यादेश लाई थी। बाद में सरकार ने बहुगुणा समिति का गठन किया था। इस कमेटी ने तत्कालीन अध्यादेश में सम्मिलित प्रावधानों की समीक्षा कर उसमें जुड़े कठोर नियमों को सरल कर दिया था। इसके कारण उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों में बेरोकटोक भूमि व्यापार का धंधा चल निकला। इसके बावजूद सरकार ने एक व्यवस्था कर दी थी कि ग्रामीण क्षेत्र में जो व्यक्ति मूल अधिनियम धारा-129 के तहत जमीन का खातेदार न हो, वह बिना अनुमति के पांच सौ वर्गमीटर से अधिक जमीन नहीं खरीद सकता है। बाद में इसकी सीमा घटा कर ढाई सौ वर्गमीटर तय कर दी गई। अब नए संशोधनों के बाद बाहरी व्यक्ति के लिए भूमि खरीदने के लिए कोई रुकावट नहीं है।

पहाड़ में कम जोत वाला व्यक्ति आर्थिक दबाव में आनन-फानन में भूमिहीन हो सकता है। अब भूमि की खरीद-फरोख्त में कोई सीमा न होने से गरीब किसान मजबूरन भू-माफियाओं के चंगुल में फंस सकता है। यह काम इस कानून के आने से पहले भी चोरी-छिपे होता आ रहा है। स्थानीय किसान या उत्तराखंड के निवासी को भागीदार बना कर कई परियोजनाएं उत्तराखंड में चल रही हैं। उत्तराखंड को बने हुए अठारह साल बीत चुके हैं। इसके बावजूद इसके विकास के लिए कोई ठोस योजना न बनी और न उसकी तैयारी है। इस कारण उत्तराखंड विकास की उस तस्वीर को पेश नहीं कर पाया, जिसकी वहां के लोगों को जरूरत है।
इसका नतीजा यह हुआ है कि कल तक जो खेत अन्न उपजाते थे, वे जंगल बनते जा रहे हैं। इसलिए रोजी-रोटी की तलाश में लोग गांव छोड़ कर शहरों का रुख कर रहे हैं। इस पलायन से पहाड़ खाली हो रहे हैं। जो अभी पहाड़ों में रुके हैं वे जंगली जानवरों की आबादी में इजाफे से परेशान हैं। जंगली जानवर खेतों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन्हीं मुद्दों को देखते हुए पहाड़ों के खेतों की चकबंदी की बहुत जरूरत है। यदि एक परिवार के खेत एक जगह पर मिल जाएं तो वे उन खेतों में पैदा होने वाली फसलों की सुरक्षा करने में सक्षम हो सकते हैं। उन्हें मीलों दूर दूसरे खेत में नहीं जाना पड़ेगा। अभी होता यह है कि जो परिवार गांव में रह रहा है और खेती कर रहा है, उसे अपने एक दूसरे खेत में जाने में ही पूरा दिन खोना पड़ता है, वह अच्छी तरह से खेतों में पैदा होने वाली फसल की देखभाल आसानी से नहीं कर पाता।

एक और उपाय है पहाड़ों को हरा-भरा रखने का, जिस पर भी गंभीरता से विचार कर लागू करने की जरूरत है। पूरे पर्वतीय प्रदेश में सिंचाई सुविधा सुलभ करने की जरूरत है। जब इजराइल अपनी बंजर भूमि को हरा-भरा कर सकता है, तब हम क्यों नहीं कर सकते! लगातार पहाड़ी दरियाओं, प्राकृतिक स्रोतों और झरनों से पानी बहता जाता है, उसका उपयोग हम नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए देश को एक और हरित क्रांति की जरूरत है। खेती की सिंचाई के लिए नई-नई तकनीक की जरूरत है। देश के खाद्यान्न भंडारण के लिए जरूरी है कि कृषि को प्राथमिकता दी जाए। किसानों की आत्महत्या रोकने के लिए गंभीर उपायों की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि कृषि भूमि पर कोई उद्योग खड़ा न किया जाए, ताकि कृषि की उपज प्रभावित न हो।

देश को एक नई भूमि व्यवस्था की जरूरत है, ताकि बढ़ती आबादी की खाद्यान्न जरूरतें पूरी की जा सकें और खाद्यान्न में हम हमेशा आत्मनिर्भर बने रहें। इसके लिए देश में भूमि व्यवस्था का समान कानून हो तो किसानों की समस्याएं कम की जा सकती हैं। यह किसी पहाड़ी या मैदानी प्रांत का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे पूरे देश के संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है।

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