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राजनीतिः शहरीकरण से उपजते संकट

भारत में असमान विकास का अहम कारण वहां विकास की अनेक परियोजनाओं का राजनीतिक प्राथमिकता के आधार पर तय न होना है। इससे कुछ क्षेत्र विकसित हुए, तो कुछ अविकसित रह गए। विडंबना यह है कि विकास का ज्यादातर लाभ भी उन्हीं शहरों को मिला है, जहां पहले से तमाम सहूलियतें मौजूद थीं। उदारीकरण के बाद भी भारतीय और विदेशी कंपनियों ने नई जगहों पर कारखाने लगाने या ढांचागत विकास करने की जहमत नहीं उठाई।

Author Published on: March 27, 2020 12:19 AM
दुनिया के एक सौ नब्बे देशों में पहुंच चुके इस वायरस ने सिर्फ सरहदों को बेमानी नहीं ठहराया है, बल्कि यह भी साबित किया है।

संजय वर्मा

वैश्विक संकट का एक प्रयोजन दुनिया की सभ्यताओं के परीक्षण का भी हो सकता है- कोविड-19 यानी कोरोना वायरस से उत्पन्न स्थितियों में यह संदर्भ और भी प्रासंगिक हो चला है। दुनिया में तीन लाख संक्रमित लोगों और दस हजार से ज्यादा मौतों के साथ सवाल तो कई उठ रहे हैं, पर इसका एक चिंताजनक पहलू यह सामने आया है कि कोरोना के सबसे ज्यादा निशाने पर दुनिया के वे बड़े और चमचमाते शहर हैं, जिन्हें हर किस्म की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। हम इस तथ्य को चाह कर भी नहीं भूल सकते कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति का केंद्र चीन का एक आधुनिक शहर वुहान था, जहां से फैलने के बाद इसने ईरान, इटली, दक्षिण कोरिया, ब्रिटेन समेत यूरोप-अमेरिका के कई शहरों को चपेट में ले लिया है। इटली और ब्रिटेन में पूर्ण बंदी (लॉकडाउन) करनी पड़ी है, तो न्यूयार्क में फैले संक्रमण की वजह से अमेरिका के सामने भी हालात पूर्ण बंदी जैसे ही हैं। विडंबना यह है कि इस वक्त दुनिया की आधी आबादी शहरों में निवास कर रही है, जिससे कोरोना के खतरे का अंदाजा लगाया जा सकता है।

ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं से पटे अत्याधुनिक शहरों के विकास की हैसियत कोरोना वायरस के सामने कितनी बौनी हो गई है, इसकी मिसाल अमेरिका में वाणिज्यिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विख्यात न्यूयार्क राज्य ने 20 मार्च, 2020 को ही पेश कर दिया, जब वहां एक दिन में ही कोरोना संक्रमण के एक हजार सात सौ तिरसठ मामले सामने आ गए। भारत के शहरों में इस वायरस के प्रकोप का आलम यह रहा कि इसी दिन महाराष्ट्र सरकार ने अपने चार प्रमुख शहरों- मुंबई, नागपुर, पुणे और पिंपरी चिंडवड़ को 31 मार्च तक संपूर्ण बंद करने की घोषणा कर दी थी। शहरों में केंद्रित ये घटनाएं इसका जीता-जागता सबूत बन गई हैं कि जिन शहरों को पूरी दुनिया ने अपने विकास की कहानी कहने का जरिया बना लिया था, उन सारे शहरों को आंख से नहीं दिखने वाला वायरस किस कदर चौपट कर सकता है और कैसे उनकी केंद्रीकृत व्यवस्थाओं को धराशायी कर सकता है। यह संक्रामक सोचने को मजबूर कर रहा है कि हम शहरों को रोजगार, विकास और हर किस्म की सहूलियतों का केंद्र बनाने के बारे में एक बार फिर गंभीरता से सोचें, क्योंकि एक ही झटके में ये शहर अनजान खतरों के केंद्र बन जाते हैं और दुनिया की रफ्तार थाम देते हैं।

दुनिया के एक सौ नब्बे देशों में पहुंच चुके इस वायरस ने सिर्फ सरहदों को बेमानी नहीं ठहराया है, बल्कि यह भी साबित किया है कि उसके सामने ठंडी, गर्म और आर्द्र जलवायु का कोई भेद मायने नहीं रखता। ग्रीनलैंड जैसे ठंडे देशों में भी कोरोना की उपस्थिति दर्ज की जा चुकी है, तो गर्म शहर दुबई, नमी वाले शहर मुंबई और मौसम के मामले में दिल्ली जैसे सूखे शहर भी इसकी जद में आ चुके हैं। शहरों की और समस्याओं से तो हम पहले ही परिचित रहे हैं। जैसे गंदगी से बजबजाते खुले मेनहोल, टूटी पाइपलाइनों और कचरे के ढेर तमाम शहरी चकाचौंध के बीच भी नजर आ जाते हैं। कथित तौर पर स्मार्ट शहर परियोजना के तहत आने वाले एकाध शहरों का ही हाल थोड़ा बेहतर होगा, अन्यथा स्थिति यह है कि किसी भी शहर के कुछेक इलाकों को छोड़ कर शेष हिस्सों में गंभीर किस्म की अराजकता पसरी रहती है।

हालांकि यह सही है कि पिछले कुछ वक्त से शहरों को काफी उम्मीदों के साथ देखा जा रहा है। इसमें भी सबसे ज्यादा उम्मीदें एशियाई शहरों से ही लगाई गई हैं। दो साल पहले वर्ष 2018 में एक प्रतिष्ठित वैचारिक समूह आॅक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने दुनिया के सात सौ अस्सी शहरों की आर्थिक गतिविधियों और वहां की आबादी के घनत्व आदि मानकों की तुलना के बाद बड़े गौरव के साथ कहा था कि अगले दस वर्षों में अर्थव्यवस्था का इंजन कहे जाने वाले शहरों का संतुलन पश्चिम से पूरब की ओर झुकने वाला है। इसकी रिपोर्ट के मुताबिक 2035 तक इन शहरों की स्थितियों में भी काफी बदलाव देखने में आएगा। हो सकता है कि उस समय तक चीन के शहरों की आर्थिक विकास दर (जीडीपी) दोगुनी हो जाए और ये यूरोप तथा अमेरिका के ज्यादातर नामी शहरों को पीछे छोड़ दें। हालांकि रिपोर्ट ने यह भी कहा था कि इन बदलावों के बावजूद न्यूयॉर्क, तोक्यो, लंदन और लॉस एंजिलिस तब भी चोटी की शहरी महाशक्ति होंगे। इसमें बदलाव यह हो सकता है कि पेरिस शीर्ष पांच शहरों के क्लब से बाहर हो जाए और उस सूची में दो चीनी शहर शेनझेन और क्वांगझाऊ इसमें अपनी जगह बना लें। इसी तरह इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता एक नए शक्ति केंद्र के रूप में उभर कर सामने आ जाए।

इस रिपोर्ट में तेज विकसित होते भारतीय शहरों के कसीदे यह कहते हुए पढ़े गए थे कि 2019 से 2035 की अवधि में तेजी से विकसित होते शीर्ष बीस शहरों में से पहले सत्रह भारत के होंगे। इनमें दिल्ली, मुंबई, बंगलुरु और सूरत आदि के नाम भी गिनाए गए। लेकिन कोरोना वायरस की चुनौती ने विकास के मानकों के रूप में शहरीकरण की अवधारणा को ही एक प्रकार से पलीता लगा दिया है। इस संकट ने शहरीकरण की बुनियादी सोच पर ही यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर किस पैमाने पर हम शहरों को गांव-कस्बों से बेहतर मानें, जब यहां रोजी-रोजगार ही नहीं, बल्कि तमाम मुसीबतों के चलते जीवन ही हर वक्त संकट में पड़ा रहता है। कभी यहां वाहनों से होने वाले प्रदूषण के कारण पैदा हुआ स्मॉग जानलेवा बन जाता है, तो कभी यातायात जाम, जरा-सी बारिश में बाढ़ के हालात पैदा हो जाने और छोटी-सी बीमारी के महामारी में बदल जाने का खतरा बन जाता है।

कोरोना तो फिर भी एक बड़ी वैश्विक आपदा है, पर आबादी के मुकाबले ढांचागत विकास पर पड़ रहे दबावों की कसौटियों पर ही जब हम अपने शहरों को कसते हैं, तो शहरीकरण की योजनाओं की चूलें हिलती नजर आती हैं। आबादी घनत्व की समस्या ऐसी है कि इसकी वजह से आज लोगों को अलग-थलग करने की जो जरूरत पैदा हो रही है, उसे पूरा करने में शहरों का दम फूल जाएगा। वर्ष 2017 में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की रिपोर्ट के मुताबिक बांग्लादेश की राजधानी ढाका दुनिया की सबसे घनी आबादी वाला शहर था, जहां जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 44,500 है। लेकिन हमारी मुंबई इससे ज्यादा पीछे नहीं है, जहां यह औसत प्रति वर्ग किलोमीटर 31700 जन है। शहरों में आबादी का बोझ बढ़ना विकास के असंतुलन को दर्शाता है। इसलिए कि शहरों को रोजगार का इकलौता केंद्र मान लिया गया है और लोगों को उनके मूल स्थानों पर रोजगार हासिल नहीं है।

भारत में असमान विकास का अहम कारण वहां विकास की अनेक परियोजनाओं का राजनीतिक प्राथमिकता के आधार पर तय न होना है। इससे कुछ क्षेत्र विकसित हुए, तो कुछ अविकसित रह गए। विडंबना यह है कि विकास का ज्यादातर लाभ भी उन्हीं शहरों को मिला है, जहां पहले से तमाम सहूलियतें मौजूद थीं। उदारीकरण के बाद भी भारतीय और विदेशी कंपनियों ने नई जगहों पर कारखाने लगाने या ढांचागत विकास करने की जहमत नहीं उठाई। आज कोरोना के इस भीषण दौर में यह अफसोस हमें जरूर परेशान करेगा कि अगर विकास के विकेंद्रीकरण का काम सरकारें अपने एजेंडे में लेतीं तो बड़े शहरों की तरह गांव-देहात से इतना पलायन न होता और जैसा संकट आज हमारे शहरों के सामने उपस्थित हुआ है, हम उसका मुकाबला आसानी से कर लेते।

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