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राजनीतिः कोरोना संकट और आपदा प्रबंधन

जब पता चला कि वायरस देश में घुस ही आया है तो सबसे पहले उसे फैलने से रोकने के लिए संक्रमित लोगों की पहचान की जरूरत थी। सिर्फ परीक्षण व्यवस्था बढ़ा कर ही यह काम संभव था। लेकिन पहले से इसका इंतजाम न होने के कारण अचानक इतने बड़े पैमाने पर परीक्षण का यह काम नहीं हो पाया।

Author Published on: March 28, 2020 12:16 AM
इस समय देश और दुनिया में पूर्ण बंदी (लॉकडाउन) के नफे-नुकसान का भी हिसाब लगाया जा रहा है।

सुविज्ञा जैन

दुनिया में कोरोना संकट आए तीन महीने गुजरने को हैं। यह मान लेने में अब संकोच नहीं होना चाहिए कि विश्व इस आपदा से निपटने में खुद को लाचार पा रहा है। वैसे पहले भी दुनिया ने तमाम आपदाएं झेली हैं और उन अनुभवों के आधार पर आपदा प्रबंधन के पाठ भी उपलब्ध हैं। दूसरे तमाम देशों की तरह हमने भी आपदा प्रबंधन नीति बना कर रखी है। क्या आज के मुश्किल दौर में आपदा प्रबंधन की उस व्यवस्था को पलट कर नहीं देख लेना चाहिए? हो सकता है कि पता चल जाए कि हम कहां चूक कर गए या कर रहे हैं, और क्या उसे अभी भी सुधारा जा सकता है?

आपदा प्रबंधन के तीन चरण होते हैं। पहला चरण समस्या आने के पहले का होता है। इसमें संभावित आपदा को आने से रोकने और उसकी तीव्रता को कम करने के उपाय किए जाते हैं। इसी चरण में संभावित आपदा से निपटने की कायर्योजना भी तय कर ली जाती है। आपदा प्रबंधन का दूसरा चरण तब शुरू होता है जब आपदा आ चुकी हो। तब उससे निपटने की कार्ययोजना के क्रियान्वन का काम होता है। इस चरण को प्रतिक्रिया (रिस्पांस) कहते हैं। आखिरी और तीसरी अवस्था आपदा के गुजर जाने के बाद शुरू होती है, जिसे रिकवरी यानी सुधार कहते हैं। इसमें जन जीवन को सामान्य करने के उपाय और तैयारी की जाती है।

पहले चरण पर गौर करें तो भारत में यह वायरस काफी देर से दाखिल हुआ। गौरतलब है कि कोरोना के कहर की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई थी। कोई तीन महीने पहले पूरी दुनिया को इसका पता चल गया था। चीन के अलावा बाकी दुनिया को अपने बचाव या आपदा प्रबंधन के लिए पर्याप्त समय मिला। लेकिन इटली, स्पेन और ईरान जैसे तमाम देश इस आपदा के प्रबंधन में बुरी तरह नाकाम रहे। दुनिया की आर्थिक महाशक्ति अमेरिका भी लगभग उसी हालत में है। ये सब वे देश हैं जिन्हें भारत से बहुत पहले कोरोना ने अपनी चपेट में लिया। यानी हम भी अगर इस महामारी से निपटने में नाकाम रहे तो हमारी नाकामी और भी बड़ी मानी जाएगी। बहरहाल, रोकथाम का पहला उपाय हमें पहले से पता था। वह उपाय था दूसरे देशों से आने वाले यात्रियों को आने से फौरन रोक देना। वैश्वीकरण के दौर में यह काम बेशक बहुत मुश्किल था। लेकिन क्या यह भी हकीकत नहीं है कि समस्या घुस आने के बाद आखिर यह काम हमें करना ही पड़ा। लेकिन तब तक आपदा प्रबंधन के पहले चरण को लागू करने का मौका हाथ से जाता रहा। गौरतलब है कि हमने दुनिया से खुद को तब काटा जब इटली, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों से आए कई व्यक्ति भारत में कोरोना पॉजिटिव पाए जाने लगे। तब जाकर मार्च के पहले हफ्ते में भारत में दुनिया का प्रवेश रोका गया।

आपदा प्रबंधन के पहले ही चरण में आपदा की तीव्रता कम करने के उपाय भी करने होते हैं। यानी जनवरी और फरवरी के लंबे अंतराल में आपदा की तीव्रता को कम रखने के लिए जांच प्रयोगशालाओं, डॉक्टरों-नर्सों के लिए बचाव के लिए रक्षात्मक उपकरण, जरूरी दवाइयां और मशीनों का इंतजाम, एकांत (आइसोलेशन) वाले अस्पताल और चिकित्सा प्रणाली को दुरुस्त करने का काम आपदा प्रबंधन के पहले चरण में ही होना था। इसी तरह लोगों को घर से बाहर निकलने पर रोक के लिए घर से ही काम की व्यवस्था अचानक चालू नहीं हो सकती थी। उसके लिए व्यवस्था को पहले से ही वैसा ढालने की जरूरत पड़ती है। कुल मिलाकर आने वाले महीनों के लिए विशेषज्ञों की मदद से आर्थिक संसाधनों के ब्योरे के साथ एक कार्ययोजना बना कर उसे देश के साथ साझा करने में हमारे प्रबंधक चूक गए। जबकि सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे कई देश इस तरह के बचाव उपायों को लेकर अपनी कार्ययोजनाएं जनता के सामने रख चुके थे। बेशक इन कामों के लिए भारत में पंद्रह हजार करोड़ के खर्च का सरकारी ऐलान बाद में हुआ जरूर, लेकिन वह तब किया गया जब संक्रमण के पांच सौ मामले सामने आ चुके थे। यह आपदा प्रबंधन के पाठ की अनदेखी इस तरह से थी कि सभी चीजें संकट आ जाने के बाद जमा करना शुरू की गईं।

आपदा प्रबंधन का दूसरे चरण की अहमियत और भी ज्यादा इसलिए है, क्योंकि इसमें मौके पर कई फैसले लेने पड़ते हैं। जब पता चला कि वायरस देश में घुस ही आया है तो सबसे पहले उसे फैलने से रोकने के लिए संक्रमित लोगों की पहचान की जरूरत थी। सिर्फ परीक्षण व्यवस्था बढ़ा कर ही यह काम संभव था। लेकिन पहले से इसका इंतजाम न होने के कारण अचानक इतने बड़े पैमाने पर परीक्षण का यह काम नहीं हो पाया। गौरतलब है कि 14 मार्च तक भी देश में सिर्फ पंद्रह प्रयोगशालाएं ही जांच के लिए तैयार हो पाई थीं। हड़बड़ी में इन्हें बढ़ाने की कोशिश हुई, फिर भी इनकी संख्या बढ़ कर पैंसठ ही हो पाई। कोरोना की जांच के लिए प्रयोगशालाओं की कमी बड़ी समस्या के रूप में सांमने आई। 14 मार्च तक भारत में हर दस लाख लोगों में से सिर्फ पांच व्यक्तियों की जांच की गई। जबकि उसी समय दक्षिण कोरिया हर दस लाख की आबादी में चार हजार निन्यानवे लोगों का परीक्षण कर रहा था। जिनमें संक्रमण का पता चल रहा था, उन्हें आसानी से अलग किया जा रहा था। सबसे ज्यादा गौर तो इटली पर हो सकता है, जहां इतनी बुरी हालत के बावजूद हर दस लाख लोगों में एक हजार पांच व्यक्तियों की जांच की जा रही थी। सिंगापुर और हांगकांग जैसे देश वायरस के थोड़े से भी लक्षण वाले अपने हर नागरिक की जांच करा रहे थे। इस बात को गौर से देखना चाहिए कि 20 मार्च तक भी हम सिर्फ कोरोना प्रभावित बारह चिह्नित देशों से आए नागरिकों और उनके संपर्क में आए लोगों की ही जांच करवा रहे थे। सूचनाओं को सिलसिलेवार देखें तो पांच सौ संक्रमित व्यक्तियों की पुष्टि के बाद भी 25 मार्च को देश में हर दस लाख में सिर्फ सत्रह की ही जांच हो पा रही थी। लिहाजा भारत में शुरू में संक्रमण के मामले कम उजागर होने का कारण सीमित जांच व्यवस्था रही।

इस समय देश और दुनिया में पूर्ण बंदी (लॉकडाउन) के नफे-नुकसान का भी हिसाब लगाया जा रहा है। खुद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) तक कह चुका है कि ल्इससे निपटने के लिए सिर्फ बंदी ही पर्याप्त नहीं है। उसने साफ कहा कि कोरोना को ढूंढ कर मारने की जरूरत है। कोरोना को खोजने का काम युद्धस्तर पर जांच से ही संभव था। तब पूरे देश को इतने लंबे समय तक घरों में रोक देने की मजबूरी भी न आती। समय रहते अगर कदम उठाए जाते, तब संक्रमित लोगों की पहचान और कड़ी निगरानी, आंशिक बंदी, घर से काम, सामूहिक आयोजनों पर रोक, यातायात सीमित करने जैसे उपायों से वायरस फैलाव को नियंत्रित करने में मदद मिल जाती।

आपदा प्रबंधन का तीसरा चरण यानी सुधार का काम शुरू होना अभी बाकी है। हालांकि इसकी कार्ययोजना अभी नहीं बन सकती। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संकट की चरम अवस्था अभी गुजरी नहीं है। जाहिर है, हमें नहीं पता कि कोरोना कितना और नुकसान करके जाएगा। लेकिन अब तक के नुकसान से इतना तय है कि देश में आर्थिक भरपाई के लिए भारी-भरकम काम करना पड़ेगा। दूसरे देशों के मुकाबले हमारे लिए यह चुनौती ज्यादा बड़ी होगी। कोरोना के पहले से ही हम आर्थिक मोर्चे पर लगातार संकट का सामना कर रहे थे। इसलिए अब चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है।

 

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