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राजनीति: खोज की राह पर चंद्रयान

अगर चांद पर खनिज और भरपूर पानी मिलता है तो वहां न सिर्फ इंसानी बस्तियां बसाने की संभावनाओं को एक ठोस आधार मिल जाएगा, बल्कि इससे चांद ही नहीं बल्कि पृथ्वी के निर्माण के नए रहस्यों का खुलासा हो सकता है। इसके अलावा एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि भविष्य में मंगल आदि ग्रहों को भेजे जाने वाले अंतरिक्ष अभियानों के लिए संसाधन मुहैया कराने और पड़ाव के रूप में चंद्रमा का इस्तेमाल हो सकता है।

Author July 24, 2019 1:00 AM
चंद्रयान-2 का परीक्षण।

अभिषेक कुमार सिंह

दुनिया में जब भी कोई देश चांद के किसी नए मिशन (मून मिशन) की सूचना देता है, तो पहला सवाल यही पैदा होता है कि आखिर चंद्रमा में अब ऐसा क्या बचा है, जिसे जानना जरूरी है और जिससे मानव सभ्यता के विकास में कोई मदद मिलेगी। इधर जब चंद्रमा पर इंसान के पदार्पण के पचास साल पूरे हुए तो एक अनोखा संयोग यह बना कि भारत की अंतरिक्ष एजेंसी- भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (इसरो) ने अपना दूसरा चंद्रयान चांद की ओर सफलतापूर्वक रवाना कर दिया है। श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से ताकतवर रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 की मदद से प्रक्षेपित किया गया चंद्रयान-2 पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जा चुका है और अगले अड़तालीस दिनों में अपने परिक्रमा पथ पर बढ़ते हुए यह चंद्रमा की कक्षा में पहुंच जाएगा। चंद्रयान-2 दुनिया में पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर अपना रोवर उतारेगा और एक चंद्र दिवस यानी पृथ्वी के चौदह दिन तक वहां सक्रिय रह कर तमाम खोजबीन करेगा। इसके अलावा चंद्रयान-2 (यानी उसका ऑर्बिटर) एक साल तक चांद की परिक्रमा करते हुए वह सारा जरूरी डाटा जमा करेगा, जिससे भारत के अंतरिक्ष मिशनों की राह तय होगी और पता चलेगा कि दुनिया में अंतरिक्ष अनुसंधानों के नए अभियानों को अब किस दिशा में मोड़ा जाना है।

यह किसने सोचा था कि आज से करीब सैंतालीस साल पहले यानी 1972 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी- नासा के अपोलो अभियानों की शृंखला एक बार खत्म होने के बाद दोबारा चंद्रमा को खंगालने की कोई पहलकदमी होगी। खासतौर से चांद की बनावट और उसके वातावरण से जुड़े रहस्यों की थाह लेने के लिए ऐसी कोशिशें फिर कभी होंगी- इसका अनुमान तक नहीं लगाया गया था। लेकिन हाल के वर्षों में चंद्रमा भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम मुल्कों के अंतरिक्ष कार्यक्रम में फिर से शामिल हो गया है। नासा भी 2030 तक चांद पर एक बार फिर इंसान को उतारने और वहां इंसानी बस्तियों से लेकर दूरगामी अंतरिक्ष अभियानों के पड़ाव के रूप में चंद्रमा के इस्तेमाल के बारे में सोचने लगा है। भारत-चीन जैसे देश अपने चंद्र अभियानों की बदौलत अंतरिक्ष में अपनी ताकत बढ़ाने में जुट गए हैं। चीन तो चंद्रमा पर दो मिशन उतार चुका है। चीन ने 2012 में अपना यान चांग-ई3 चंद्रमा पर भेजा था जो 1975 के सोवियत संघ के लूना-24 के बाद चंद्रमा पर उतरने वाला पहला स्पेसक्राफ्ट था। यही नहीं, इस साल यानी 2019 के आरंभ में भी चीन अपना यान चेंग-4 चंद्रमा पर उतार चुका है।

यह यान अपने साथ एक मून रोवर भी लेकर गया है तो चांद के डार्क (अंधेरे) या फार-साइट कहलाने वाले हिस्से की सतह की संरचना और वहां मौजूद खनिजों का पता लगा रहा है। साल के अंत तक चीन की योजना चंद्रमा पर ऐसा ही एक और मिशन भेजने की है। इस बीच इजरायल ने भी 22 फरवरी 2019 को अपना चंद्रयान- बेरेशीट रवाना किया था जो 11 अप्रैल 2019 को चंद्रमा पर उतरते वक्त नष्ट हो गया था। जापान ने भी 14 सितंबर 2007 को अपना पहला लूनर ऑर्बिटर सेलेने-1 छोड़ा था और अब 2020 में पहला मून लैंडर और मून रोवर चंद्रमा पर भेजने की तैयारी कर रहा है। जापान का ज्यादा फोकस चंद्रमा पर इसकी संभावना तलाश करना है कि कैसे चांद लंबे स्पेस मिशनों के लिए एक पड़ाव बन सकता है और कैसे वहां इंसानी रिहाइश की कोई गुंजाइश बन सकती है ताकि वहां लंबी अवधि वाले वैज्ञानिक प्रयोग-परीक्षण किए जा सकें और चांद के खनिजों के इस्तेमाल की राह निकाली जा सके।

अगर पूछा जाए कि आखिर चंद्रमा का ऐसा कौन सा रहस्य बाकी है जो अब तक के मिशनों से खंगाला नहीं जा सका है। इस सवाल के कुछ जवाब इसरो द्वारा छोड़े गए चंद्रयान-2 से मिलने की उम्मीद है। भारत 2008 में चंद्रयान-1 भेज चुका है, लेकिन वह यान चंद्रमा की सतह पर नहीं उतरा था। चंद्रयान-2 में एक लैंडर (विक्रम) और एक रोवर (प्रज्ञान) हैं जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर उतरेंगे और जानकारियां जमा करेंगे। चांद की सतह पर उतरने वाले लैंडर और रोवर के माध्यम से इसरो के वैज्ञानिक वहां पानी की मौजूदगी, चट्टानों और मिट्टी की संरचना, चंद्रमा के आयनमंडल (आयनोस्फीयर) और चंद्रमा की जमीन की भीतरी पड़ताल से नए रहस्यों पर रोशनी पड़ने की उम्मीद लगा रहे हैं। इन जानकारियों की जरूरत इसलिए है क्योंकि नासा के वैज्ञानिकों के मुताबिक अब तक के चंद्र अभियानों से ऐसी जानकारियां विस्तार से नहीं मिल सकी हैं, जबकि सौरमंडल के अन्य ग्रहों की बनावट को समझने के लिए ऐसी जानकारियों का अत्यधिक महत्त्व है। वैज्ञानिकों का मानना है कि चांद की बनावट पृथ्वी से काफी अलग है और यह बड़े एस्टेरॉयड (क्षुद्र ग्रहों) और बुध जैसे ग्रहों की संरचना के ज्यादा करीब है। निश्चित तौर पर जब चंद्रमा से ये सारी जानकारियां मिलेंगी, तो ब्रह्मांड और सौरमंडल की उत्त्पत्ति से जुड़े रहस्यों पर से परदा उठ पाने में भी आसानी होगी।

यह पहला मौका है जब कोई यान पहली बार चंद्रमा के जटिल हिस्से में पहुंचने की कोशिश कर रहा है। चांद का दक्षिण ध्रुव कई मायनों में भावी चंद्र मिशनों के द्वार खोलने वाला साबित होगा। इसकी पहली वजह तो यह कि हमेशा छाया में रहने वाले इस हिस्से के बेहद ठंडे क्रेटर (गड्ढों) में जमी हुई बर्फ के भंडार हो सकते हैं जो पानी का बड़ा स्रोत होंगे। यहां जीवाश्मों का खजाना मिल सकता है। यहां हीलियम-3 जैसा बहुमूल्य खनिज मिलने की भी उम्मीद है। एक टन हीलियम की मौजूदा कीमत करीब पांच अरब डॉलर हो सकती है और अंदाजा है कि चंद्रमा से ढाई लाख टन हीलियम-3 पृथ्वी तक ढोकर लाया जा सकता है। यह ऐसी अकूत संपदा होगी, जिसकी कीमत कई लाख करोड़ डॉलर मानी जा रही है। इसरो ने दक्षिणी ध्रुव की चट्टानों में लोहे के अलावा मैग्नीशियम, कैल्सियम आदि की मौजूदगी का भी अंदाजा लगाया है। अनुमान से आशय यह है कि दक्षिणी ध्रुव की अभी तक कायदे की पड़ताल चंद्रमा की परिक्रमा कर चुके पहले के चंद्र अभियानों से नहीं हो पाई है, हालांकि इसके संकेत उन्होंने अवश्य दिए हैं। यह खोजबीन बिना वहां रोवर उतारे मुमकिन नहीं है, जिसकी पहली कोशिश चंद्रयान-2 अपने रोवर- प्रज्ञान की मार्फत करेगा।

अगर चांद पर खनिज और भरपूर पानी मिलता है तो वहां न सिर्फ इंसानी बस्तियां बसाने की संभावनाओं को एक ठोस आधार मिल जाएगा, बल्कि इससे चांद ही नहीं बल्कि पृथ्वी के निर्माण के नए रहस्यों का खुलासा हो सकता है। इसके अलावा एक बड़ा फायदा यह हो सकता है कि भविष्य में मंगल आदि ग्रहों को भेजे जाने वाले अंतरिक्ष अभियानों के लिए संसाधन मुहैया कराने और पड़ाव के रूप में चंद्रमा का इस्तेमाल हो सकता है। अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय संघ की चंद्रमा के प्रति दिलचस्पी बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है कि आगे चल कर चंद्रमा को दुर्लभ अंतरिक्षीय सूचनाओं के केंद्र के रूप में विकसित किए जाने की योजना है।

यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि इंसानी पहुंच का दायरा वायजर-पायनियर जैसे यानों की मार्फत भले ही चांद से बाहर चला गया हो, पर अपने इस सबसे नजदीकी अंतरिक्षीय पिंड को अच्छी तरह जाने बगैर ब्रह्मांड के दूसरे ठौर-ठिकानों तक होने वाली पहुंच कोई विशेष अर्थ नहीं रखती। इसलिए मौजूदा और भावी मून मिशन अगर चंद्रमा से जुड़ी कुछ गुत्थियां सुलझाने में हमारी मदद करते हैं तभी मानव सभ्यता की और उन्नति संभव है।

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