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राजनीति: चुनौती बनती मानसिक बीमारियां

आज दुनियाभर में पैंतालीस करोड़ से भी अधिक लोग मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं।

Author Updated: January 14, 2020 12:20 AM
एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2017 में करीब बीस करोड़ भारतीय मानसिक विकारों से ग्रस्त पाए गए।

मोनिका शर्मा

भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं गंभीर रूप लेती जा रही हैं। इस बारे में हाल में लांसेट साइकियाट्री में ‘इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिशिएटिव’ द्वारा किया गया अध्ययन छपा है, जो देश में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े चिंताजनक हालात सामने रखता है। इस अध्ययन के अनुसार वर्ष 2017 में करीब बीस करोड़ भारतीय मानसिक विकारों से ग्रस्त पाए गए। इनमें हर सात में से एक भारतीय अलग-अलग तरह की मानसिक बीमारी से पीड़ित निकला। मानसिक रोगों की इस फेहरिस्त में अवसाद, व्यग्रता, सीजोफ्रेनिया, विकास संबंधी बौद्धिक विकृति, आचरण संबंधी विकार और आॅटिज्म जैसी बामरियां शामिल हैं। इनमें अवसाद और व्यग्रता सबसे आम मानसिक विकार हैं। इतना ही नहीं, ये दोनों मानसिक व्याधियां भारत में तेजी से फैल रही हैं। अध्ययन के मुताबिक दो साल पहले तक साढ़े चार करोड़ से ज्यादा लोग अवसाद से ग्रस्त थे।

गौरतलब है कि यह अध्ययन मानसिक रोगों के कारण देश पर बीमारियों के बढ़ते बोझ और हर राज्य में इन समस्याओं के रुख को लेकर सामने आया पहला व्यापक अनुमान है। इसके मुताबिक साल 1990 से साल 2017 के बीच भारत में बीमारियों के कुल बोझ में मानसिक बीमारियों का योगदान बढ़ कर दोगुना हो गया। ऐसे में मन की सेहत बिगड़ने से जुड़ी ऐसी स्थितियां समाज और सरकार दोनों के लिए बेहद चिंतनीय हैं।

दरअसल, बीते कुछ सालों में लोग शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर काफी सजग तो हुए हैं, लेकिन मानसिक सेहत संभालने की प्रवृत्ति आज भी नदारद है। इतना ही नहीं, बिगड़ी मन:स्थिति के मर्ज को स्वीकारने में भी संकोच किया जाता है। ऐसे में अपनी हो या किसी अपने की, अवसाद और व्यग्रता को छुपा कर और बड़ी बीमारी बना दिया जाता है। जबकि आज की बदलती जीवनशैली में तनाव और अवसाद घर से लेकर दफ्तर तक जीवन का हिस्सा बन गए हैं। भागमभाग ही कुछ ऐसी है कि बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी मन की सेहत के मोर्चे पर पीछे छूट रहे हैं। एक सर्वे से मुताबिक भारत में तियालीस फीसद लोग ही मानसिक बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल जाने की जरूरत महसूस करते हैं। दूरदराज के गांवों-कस्बों में तो ऐसी बीमारी को अंधविश्वास तक से जोड़ दिया जाता है। ऐसे में न केवल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चिकित्सकीय सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की दरकार है, बल्कि इन व्याधियों के प्रति जन-जागरूकता लाने की की जरूरत है।

असल में देखा जाए तो मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े अब वैश्विक चिंता बन गए हैं। आज दुनियाभर में पैंतालीस करोड़ से भी अधिक लोग मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं। हमारे यहां भी एक बड़ी आबादी मानसिक अस्वस्थता से जूझ रही है। कभी विकसित देशों की समस्या कही जाने वाली ये मानसिक व्याधियां अब भारत में भी तेजी से जड़ें जमा रही हैं। आंकड़ों को देखें तो साल 2017 में करीब बीस करोड़ भारतीयों का मानसिक विकारों से ग्रस्त होना देश के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि यह हमारी कुल आबादी की 14.3 फीसद है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे 2015-16 के आंकड़े बताते हैं कि देश में अठारह साल से अधिक उम्र वाले 5.25 फीसद नौजवान अवसाद के शिकार हैं। यानी हर बीस में से एक व्यक्ति को अवसाद ने घेर रखा है। बच्चों में भी तनाव, व्याकुलता और आत्मविश्वास में कमी जैसी मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसके चलते नई पीढ़ी में कम उम्र में ही कई शारीरिक और मानसिक बीमारियां होने का जोखिम भी बढ़ रहा है।

हाल के वर्षों में भारत में आत्महत्या के आंकड़े भी तेजी से बढ़े हैं। हर उम्र, हर तबके के लोगों में जीवन से हार मान की लेने की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। हालांकि आत्महत्या की प्रवृत्ति दुनिया भर में देखने को मिल रही है, लेकिन हमारे देश के लिए ये एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि किसानों से लेकर शिक्षित युवाओं तक हर वर्ग के लोग जिंदगी से मुंह मोड़ रहे हैं। पिछले कुछ सालों में तो सामूहिक आत्महत्या के मामले भी सामने आए हैं, जिनमें निराशा और असुरक्षा की भावना के चलते पूरे परिवार ने ही आत्मघाती कदम उठा लिया। मन को उद्वेलित करने वाले ऐसे मामलों में घर के बड़े-बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक ने एक साथ मौत को गले लगा लिया। अधिकतर मामलों में तनाव और अवसाद ही अहम कारण रहा है, जो व्यावसायिक अफसलता, कर्ज, और सामाजिक-पारिवारिक कलह जैसी वजहों से पनपता है। कुछ समय पहले आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘प्रिवेंटिंग सुसाइड’ नामक रिपोर्ट में भी कहा गया था कि दुनिया भर में सबसे अधिक आत्महत्या के मामले भारत में हो रहे हैं। आर्थिक समृद्धि की दौड़ के बीच गुम अनमोल मानवीय जीवन के अवमूल्यन को सामने रखती इस रिपोर्ट में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने (डब्लूएचओ) आत्महत्या को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के तौर पर रेखांकित किया था। डब्लूएचओ की इस रिपोर्ट में भारत को आत्महत्या के मामले में दुनिया की राजधानी तक कहा गया। ऐसे में मानसिक विकारों के शिकार लोगों की बढ़ती संख्या वाकई चिंतनीय है, क्योंकि इस अध्ययन में आत्महत्या और मानसिक बीमारी के बीच सीधा संबंध पाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक मानसिक रूप से बीमार लोग आत्महत्या के ज्यादा प्रयास करते हैं। मानसिक रूप से बीमार महिलाएं पुरुषों की तुलना में आत्महत्या के ज्यादा प्रयास करती हैं।

विचारणीय है कि हमारे देश की पारंपरिक जीवनशैली संयमित और सहज जीवन जीने का संदेश लिए हुए है। दिखावे के संस्कृति से दूर, जरूरतों और इच्छाओं में अंतर करने का भाव गहराई से समाहित है। कहना गलत नहीं होगा कि आज की बदलती जीवन शैली के चलते ही अवसाद और व्यग्रता जैसी समस्याएं दस्तक दे रही हैं। मौजूदा जीवनशैली में दो बातें बहुत आम हो चली हैं। एक, सब कुछ पा लेने की की इच्छाएं बढ़ी हैं और दूसरा यह कि हालात से मुकाबला करने की शक्ति कम हुई है। सहिष्णुता और सहनशीलता व्यवहार से नदारद है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के सर्वे में भी यही सामने आया है कि आत्महत्या करने वाले लोगों में अधिकतर पंद्रह से पैंतीस साल के बीच के नौजवान ज्यादा हैं, जिन पर इस आयु में रोजगार पाने और स्वयं को साबित कर दिखाने का दवाब होता है। युवाओं का एक बड़ा प्रतिशत ऐसा भी है, जो शिक्षित और सफल तो है, पर अवसाद और अकेलेपन के चलते आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत के आईटी हब के तौर पर मशबूर बंगलुरू में आत्महत्या करने वालों की संख्या देश में सबसे अधिक है। यहां अकेलापन और अवसाद जान देने के बड़े कारण हैं। ‘इंडिया स्टेट लेवल डिजीज बर्डन इनिशिएटिव’ की रिपोर्ट भी बताती है कि नौकरी में अनिश्चितता, वैवाहिक स्थितियां और आर्थिक चिंताओं ने लोगों को अवसाद और तनाव की धकेला है।

निस्संदेह, मानसिक रुग्णता से जुड़ी व्याधियों के आंकड़े साल दर साल बढ़ रहे हैं। हमारा सामाजिक तानाबाना ही कुछ ऐसा है कि इसमें तनाव और उलझनें कम नहीं हैं। जीवन की आपाधापी में तनावजन्य परिस्थितियों में इजाफा हुआ है। सामाजिक तानेबाने के टूटने और एकाकी परिवारों के बढ़ते चलन ने ऐसे रोगियों की संख्या बढ़ा दी है, जो मन से बीमार हैं। बिगड़ती मनोदशा के कारणों में पारिवारिक समस्याओं का भी अहम स्थान है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के आंकड़े बताते हैं कि भारत की आबादी के करीब चौदह फीसद लोगों को सक्रिय मानसिक स्वास्थ्य हस्तक्षेप की आवश्यकता है। जबकि पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं के जर्जर ढांचे से जूझ रहे हमारे देश में मानसिक रोगियों की समस्याओं का समाधान करने के लिए स्वास्थ्य पेशेवरों की भी भारी कमी है। ऐसे में भारत के बदलते सामाजिक-आर्थिक ढांचे में मनोविकारों से जूझ रहे लोगों के बढ़ती तादाद चिंता का विषय है।

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