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राजनीतिः आसान नहीं है मंदिर का रास्ता

अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण यथा संभव शीघ्रता से शुरू भी कर दिया जाए, तो उसे तेजी से पूर्णता की ओर ले जाना संभव नहीं होगा। कारण यह कि अभी उसकी दो मंजिलों के लिए पत्थरों की कटाई और तराशी का काम ही हो पाया है, जबकि अब संशोधित मॉडल के अनुसार वह तीन मंजिला बनेगा। तीसरी मंजिल के लिए पत्थरों की तराशी या अन्य निर्माण सामग्रियां जुटाने में भी समय लगना स्वाभाविक है।

केंद्र की पीवी नरसिंह राव सरकार ने 1993 में इस मामले के समाधान के लिए अयोध्या विशेष क्षेत्र अधिग्रहण कानून बनाया था।

शीतला सिंह

अयोध्या का राम मंदिर आंदोलन भले 1949 में कांगे्रस की आंतरिक और स्थानीय नीतियों का परिणाम रहा हो, लेकिन 1983 में इसमें विश्व हिंदू परिषद का समावेश हो गया था, जिसका उद्देश्य मंदिर निर्माण कम और उसके लिए आंदोलन का राजनीतिक लाभ उठाना ज्यादा था। लेकिन चूंकि तब उसके पास सत्ता या निर्णायक क्षमता नहीं थी, इसलिए उसके एक वर्ग ने, जिसमें महंत अवैद्यनाथ और देवकीनंदन अग्रवाल प्रमुख थे, दिसंबर,1986 में अयोध्या में हुई बैठक में मुसलमानों के उस दृष्टिकोण को नए उत्साह के साथ स्वीकार किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह मंदिर और मस्जिद का विवाद नहीं, बल्कि मुसलमानों को समाज की मुख्यधारा से विलग करने का प्रयास है। इसलिए बाबरी मस्जिद को ग्यारह फीट ऊंची दीवारों से घेर कर वहां से मंदिर निर्माण आरंभ हो जाए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दोनों मुखपत्रों ‘ऑर्गनाइजर’ और ‘पांचजन्य’ ने इस सहमति को राम की विजय के रूप में देखा और प्रकाशित किया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने जब एक पूर्व न्यायाधीश, एक प्रमुख पंच और श्री श्री रविशंकर की तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति बनाई थी, तब भी मुसलमानों का एक वर्ग शीर्ष अदालत के इन प्रयासों का कट्टर समर्थक था, जबकि विश्व हिंदू परिषद के प्रतिनिधियों का कहना था कि हमें सुलह-समझौते के आधार पर नहीं, बल्कि शौर्य के आधार पर मंदिर चाहिए, क्योंकि समझौते का अर्थ तो यह होगा कि हम पीछे की ओर जा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय के पांच सदस्यों वाले पीठ ने अपने अंतिम फैसले में विवादित स्थल में मूर्ति रखने को गैरकानूनी करार देकर 1992 में मस्जिद गिराने को राष्ट्रीय शर्म और आपराधिक कार्य बताया और उसके अभियुक्तों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखने को कहा है। उसके अनुसार कोई पक्ष विवादित भूमि के स्वामित्व का साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया है, लेकिन चूंकि पांच सौ वर्षों से लोगों को विश्वास है कि राम का जन्म वहीं हुआ था, इसलिए आस्था के आधार पर उसने रामलला विराजमान, जिनका मुकदमा जस्टिस देवकीनंदन अग्रवाल ने एक जुलाई, 1989 को दायर किया था, के पक्ष में फैसला दे दिया। यह भी माना कि विवादित स्थल पर उत्खनन में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला है कि बाबर ने वहां स्थित मंदिर को गिरा कर सन् 1558 में मस्जिद बनाई थी। फैसले के बाद राम मंदिर का निर्माण शीघ्रता से शुरू होने और उसके कम से कम अवधि में बन जाने की बात कही जा रही थी। लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा है तो इसके पीछे के कारण समझने की जरूरत है।

केंद्र की पीवी नरसिंह राव सरकार ने 1993 में इस मामले के समाधान के लिए अयोध्या विशेष क्षेत्र अधिग्रहण कानून बनाया था, जिसमें अधिग्रहीत भूमि पर मंदिर-मस्जिद दोनों बनाने की व्यवस्था थी। यह कानून अभी भी अस्तित्व में है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने विवाद का फैसला करते हुए सरकार को निर्देश दिया था कि वह मंदिर निर्माण के लिए एक नए ट्रस्ट का गठन करे, जिसमें निर्मोही अखाड़े का भी एक सदस्य प्रमुख रूप से हो। इसके अनुपालन में सरकार ने ट्रस्ट के नौ सदस्यों का मनोनयन किया, जिनमें दो को छोड़ कर सभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता हैं। उसके चार पदेन सदस्य सरकारी अधिकारी हैं और उन्हें मताधिकार भी नहीं है, जबकि ट्रस्टियों द्वारा दो नए सदस्यों का चयन किया गया है। ये दोनों चंपत राय और नृत्यगोपाल दास विश्व हिंदू परिषद के तो हैं ही, बाबरी मस्जिद विध्वंस के अभियुक्त भी हैं। चूंकि नृत्यगोपाल दास पहले विहिप प्रायोजित ट्रस्ट के अध्यक्ष थे, इसलिए उन्हें ही नए ट्रस्ट का अध्यक्ष बनाया गया है।

इतना सब हो जाने के बाद भी मंदिर निर्माण शुरू करने का प्रश्न अभी तक लटका हुआ है। अभी तक इसके लिए तिथि की घोषणा नहीं की जा सकी है। इससे लगता है कि सर्वथा शुद्ध और पवित्र तिथि की खोज अभी किसी नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है। प्रधानमंत्री के सेवानिवृत्त मुख्य सचिव नृपेंद्र मिश्र को ट्रस्ट द्वारा बनाई गई भवन (मंदिर) निर्माण समिति का अध्यक्ष बनाया गया है, लेकिन वे भी निर्माण शुरू करने की कोई स्पष्ट तिथि घोषित नहीं कर सके हैं।

यह नहीं कहा जा सकता कि राम मंदिर निर्माण की आकांक्षा केवल ट्रस्टियों को ही है, क्योंकि उसके लिए आंदोलन चलाने और मुकदमा लड़ने वाले तो निर्मोही अखाड़ा और हिंदू महासभा के नेता भी थे। बाद में उनके एक कार्यकर्ता, जो विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष भी बने, परमहंस रामचंद्र दास ने अपना मुकदमा यह कहते हुए वापस ले लिया था कि वे फैसले में हो रहे विलंब से उत्पन्न हुए क्षोभ का शमन नहीं कर पा रहे। यह भी नहीं माना जा सकता कि राम मंदिर के समर्थक मुख्य रूप से रामानंद संप्रदाय के लोग ही हैं। विश्व हिंदू परिषद द्वारा बनाए गए पहले ट्रस्ट में रामानंद संप्रदाय के मुखिया को ही अध्यक्ष बनाया गया था। इन रामानंद की बात करें तो उनके बारह शिष्य विभिन्न धर्मों और समुदायों के थे और वे राम को किसी समुदाय या संप्रदाय तक सीमित नहीं मानते थे।

यहां समझने की एक बात यह भी है कि विश्व हिंदू परिषद 1983 के बाद राम मंदिर आंदोलन में शामिल हुई। इसके बाद उसने उसका केंद्रीय दायित्व भी संभाला। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राम मंदिर आंदोलन का मुख्य सूत्रधार, रचयिता या समर्थक नहीं माना जा सकता। सच्ची बात तो यह है कि उसने इस प्रकार का कोई आंदोलन अपने जन्म से अब तक किया ही नहीं है। विश्व हिंदू परिषद के ताजा दृष्टिकोण के अनुसार राम मंदिर ट्रस्ट के पंद्रह सदस्यों में सरकारी अधिकारियों को छोड़ कर विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र और निर्मोही अखाड़ा के दिनेंद्र दास तक सब उसके ही हैं। ऐसा हो भी तो ट्रस्ट में जिस तरह एक ही जाति के लोगों का वर्चस्व है, वह ‘राम तो सबके हैं’ और राम मंदिर की व्यापकता की भावना के अनुकूल नहीं ठहरता। राम और उनकी कथाओं का प्रत्यय कितना व्यापक है, इसे इस तथ्य से समझ सकते हैं कि राम कथा दुनिया के तिरसठ देशों में विद्यमान है और ये सभी देश हिंदू बहुल नहीं, बल्कि विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के हैं। उन सबकी राम कथाओं में भाषा की भिन्नता तो है ही, कथाओं में भी है, लेकिन यह बात उन सभी के राम को अपना मान कर स्वीकारने में बाधक नहीं बनती।

दूसरे पहलू पर जाएं तो अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण यथा संभव शीघ्रता से शुरू भी कर दिया जाए, तो उसे तेजी से पूर्णता की ओर ले जाना संभव नहीं होगा। कारण यह कि अभी उसकी दो मंजिलों के लिए पत्थरों की कटाई और तराशी का काम ही हो पाया है, जबकि अब संशोधित मॉडल के अनुसार वह तीन मंजिला बनेगा। तीसरी मंजिल के लिए पत्थरों की तराशी या अन्य निर्माण सामग्रियां जुटाने में भी समय लगना स्वाभाविक है। निर्माण और विघ्वंस में अंतर होता है। निर्माण में समय लगता है और उसे विध्वंस की तरह तुरत-फुरत नहीं निपटाया जा सकता। मंदिर निर्माण में लौह सामग्री का प्रयोग न करने की घोषणा की गई है और अब इसका दायित्व एक कंपनी के सुपुर्द किया जा रहा है, जो व्यक्तियों के श्रम के बजाय मशीनों से उसके निर्माण को स्वरूप प्रदान करेगी। चूंकि इस निर्माण को राजनीतिक लाभ के संदर्भ से भी देखा जा रहा है, इसलिए अप्रैल के पहले तो पवित्र स्थल की पूजा ही संभव नहीं है। जब तक यह रामभक्ति राजनीतिक लाभ से जुड़ी रहेंगी, उसे लेकर पूर्ण सहमति का प्रश्न ही नहीं है और विरोध के नए-नए स्वर समय-समय पर उठते रहेंगे।

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