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राजनीति: ग्रामीण विकास और समग्रता

ग्रामीण विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे जरूरी है पंचायतों को मजबूत करना। इसके लिए पंचायतों को अधिक संसाधन मिलने चाहिए। पंचायत चुनावों से गांव में गुटबाजी व दुश्मनी न आए, इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। न्याय के लिए कोर्ट-कचहरी में भटकने के स्थान पर निशुल्क न्याय पंचायत स्तर पर हो सके, इस दिशा में बढ़ना चाहिए। ग्राम सभा और वार्ड सभा को सशक्त बनाना होगा।

Author Published on: January 7, 2019 3:27 AM
पानी तो विकास का ही नहीं, अस्तित्व का आधार है।

भारत डोगरा

विभिन्न सरकारी विभाग अपने-अपने स्तर पर ग्रामीण विकास के विभिन्न पक्षों पर कार्यरत हैं। ये कार्य प्राय: लक्ष्य-निर्धारित होते हैं और यथासंभव प्रयास होते हैं कि घोषित लक्ष्य की प्राप्ति सरकारी फाइल में सफलता के रूप में दर्ज होती रहे। पर मौजूदा व्यवस्था में इस बारे में अधिक चर्चा नहीं है कि क्या कार्यक्रमों की दिशा सही है और क्या विभिन्न कार्यक्रम आपसी समन्वय में एक-दूसरे के पूरक हैं, एक-दूसरे के साथ मिल कर ग्रामीण विकास को समग्र रूप देते हैं। दूसरी ओर जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण विकास की दिशा बहुत सोच-समझ कर तैयार की जाए, इस पर व्यापक सहमति बनाई जाए और इसे समग्र रूप में अपनाया जाए। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय आदि सभी पक्षों का एक-दूसरे से समन्वय रखने वाला, एक-दूसरे का पूरक समावेश इस समग्र कार्यक्रम में मिलना चाहिए।

सबसे प्रमुख सहमति का विषय यह होना चाहिए कि राष्ट्रीय विकास के केंद्र में ग्रामीण विकास होगा, गांवों को अति महत्त्वपूर्ण भूमिका मिलेगी। विकास का अर्थ यह नहीं होगा कि अनिवार्य तौर पर गांव को पीछे हटा कर शहर ही आगे बढ़ेंगे, अपितु गांवों व खेती-किसानी के विकास को पूरे विकास में सबसे महत्त्वपूर्ण व बुनियादी भूमिका दी जाएगी। जहां हमारा ग्रामीण विकास पूरी तरह हमारी जरूरतों के अनुकूल होना चाहिए, वहां उसे विश्व की बड़ी पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के अनुरूप भी होना चाहिए। हम विश्व से अलग नहीं हैं। विश्व में जलवायु बदलाव व अन्य पर्यावरणीय समस्याएं अति गंभीर रूप ले रही हैं और इनका समाधान अति आवश्यक है, अत: हमारा ग्रामीण विकास भी इस समाधान के अनुकूल ही होना चाहिए। इस पर व्यापक सहमति है कि निर्धनता, विषमता व अन्याय दूर करना या न्यूनतम करना दुनिया व पूरे देश का उद्देश्य होना चाहिए, अत: जरूरी है कि ग्रामीण विकास भी इस व्यापक सहमति के उद्देश्य के अनुरूप होना चाहिए। इसी तरह की व्यापक सहमति इस बारे में है कि विकास टिकाऊ व सतत होना चाहिए, जो पर्यावरण रक्षा पर समुचित ध्यान देने से ही संभव है। यह आपदाओं की मार को कम करने के लिए भी बहुत जरूरी है। गांवों की आत्म-निर्भरता को बढ़ाना चाहिए। दीर्घकालीन दृष्टि से देखें तो गांवों में जल-संरक्षण और हरियाली का बना रहना, यह दो सबसे बड़ी जरूरतें हैं। पानी तो विकास का ही नहीं, अस्तित्व का आधार है। सभी प्राकृतिक जल-स्रोतों की रक्षा होनी चाहिए। भू-जल का उपयोग सुरक्षित सीमा तक ही होना चाहिए। सभी मनुष्यों व पशु-पक्षियों के लिए पर्याप्त जल होना चाहिए। जल के उपयोग में प्राथमिकता पेयजल, घरेलू उपयोग और फिर कृषि को मिलनी चाहिए। फसल-चक्र स्थानीय जल उपलब्धि के अनुकूल होना चाहिए। यथासंभव जल आपूर्ति स्थानीय वर्षा व जल-संरक्षण के आधार पर होनी चाहिए। दूर-दूर से पानी लाने वाली योजनाओं के बारे में तभी सोचा जा सकता है जब सब उपाय करने पर भी स्थानीय स्तर पर जल पर्याप्त न हो। वर्षा के जल को संरक्षित करने का भरपूर प्रयास होना चाहिए। स्थानीय वनस्पति व वृक्षों की प्रजातियों, को बचाना व पनपाना चाहिए। खाद्य, चारे, वन व मिट्टी संरक्षण के स्थानीय वृक्षों को समुचित महत्त्व देना चाहिए। वनों की रक्षा करते हुए और उन्हें पनपाते समय वनों की प्रजातियों के मिश्रण के प्राकृतिक रूप को बनाए रखने या उनसे नजदीकी रखने का प्रयास होना चाहिए।

खेती की तकनीक ऐसी होनी चाहिए जो पर्यावरण की रक्षा के अनुकूल हो, टिकाऊ हो, बहुत सस्ती हो, गांव के स्थानीय संसाधनों पर आधारित हो और बाहरी निर्भरता को न्यूनतम करे। रासायनिक खाद व दवाओं का उपयोग छोड़ना चाहिए या न्यूनतम हो, कंपोस्ट और गोबर-पत्ती आदि की खाद का उपयोग बढ़ाने पर जोर हो। पशुपालन को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए पशुपालक समुदायों की मदद करनी होगी। कृषि व पशुपालन के परंपरागत ज्ञान से भरपूर सीखना होगा। प्रकृति की प्रक्रियाओं से सीखते हुए बेहतर कृषि के तौर-तरीके सीखने चाहिए। कृषि का आधार छोटे व मझले किसान होते हैं। किसी के पास बहुत अधिक भूमि है तो उससे कुछ भूमि लेकर भूमिहीनों में वितरित की जानी चाहिए। अन्य उपायों से भी भूमिहीन खेत मजदूरों को भूमि दी जानी चाहिए। सबसे निर्धन गांववासियों को ग्रामीण विकास के प्रयासों में उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए और उनकी टिकाऊ आजीविका सुनिश्चित करने, संसाधन आधार बढ़ाने के प्रयास करने चाहिए। खेती-किसानी बहुत महत्त्वपूर्ण है, पर केवल खेती के आधार पर गांवों में पर्याप्त आजीविका आधार उपलब्ध नहीं हो सकता है। अत: विविधता भरी आजीविकाओं और रोजगारों के लिए अर्थव्यवस्था में ऐसे सुधार करने होंगे जिससे अधिक रोजगारों का सृजन गांव, कस्बे, छोटे शहर के स्तर पर हो और इन रोजगारों में प्रदूषण न्यूनतम रखने के प्रयास आरंभ से हों। इसके लिए परंपरागत दस्तकारियों व हस्तशिल्प व इनसे जुड़े दस्तकारों को बढ़ावा देना होगा। ग्रामीण विकास का लक्ष्य हासिल करने के लिए सबसे जरूरी है पंचायतों को मजबूत करना। इसके लिए पंचायतों को अधिक संसाधन मिलने चाहिए। पंचायत चुनावों से गांव में गुटबाजी व दुश्मनी न आए, इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए। न्याय के लिए कोर्ट-कचहरी में भटकने के स्थान पर निशुल्क न्याय पंचायत स्तर पर हो सके, इस दिशा में बढ़ना चाहिए। ग्राम सभा और वार्ड सभा को सशक्त बनाना होगा। विस्थापन या गांव के भविष्य से जुड़े किसी बड़े फैसले पर ग्राम-सभा के निर्णय को उच्च महत्त्व मिलना चाहिए। विस्थापन की संभावना न्यूनतम करनी चाहिए। फिर भी मजदूरी में किसी को विस्थापित होना पड़े तो उससे पूरा न्याय होना चाहिए। गांव में पुरुषों व महिलाओं (विशेषकर महिलाओं) के स्वयं सहायता समूहों का गठन होना चाहिए। उनके माध्यम से बचत को हर तरह से प्रोत्साहित किया जा सकता है। धीरे-धीरे स्वयं सहायता समूहों की क्षमता इतनी बढ़नी चाहिए कि कर्ज की अधिकतम जरूरतें इनसे पूरी हो सकें।

महिलाओं की भागीदारी के बिना ग्रामीण विकास की कल्पना अधूरी है। महिलाओं को विभिन्न क्षेत्रों में आगे आने के भरपूर अवसर देने की जरूरत है और उन्हें इसके लिए पूर्ण सुरक्षा की स्थिति मुहैया करानी होगी। महिला-विरोधी हिंसा और यौन हिंसा को समाप्त करने या न्यूनतम करने को उच्चतम प्राथमिकता मिलनी चाहिए। महिला किसानों को किसान के रूप में मान्यता मिलनी चाहिए। पति-पत्नी का मिल कर भूमि स्वामित्व होना चाहिए। सभी गांवों में महिलाओं के नेत्तृत्व में नशा-विरोधी समितियों का गठन होना चाहिए और शराब सहित हर तरह के नशे की न्यूनतम करने के प्रयास निरंतरता से होने चाहिए। गांवों में शराब के ठेके नहीं खुलने चाहिए व जो पहले से हैं, उन्हें हटाना चाहिए। शिक्षा की गुणवत्ता ग्रामीण विकास की महत्त्वपूर्ण धुरी है। शिक्षा में नैतिक शिक्षा का समावेश करने, अच्छी शिक्षा सब तक पहुंचाने व सरकारी स्कूलों को बहुत बेहतर करने के प्रयासों को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए व इसमें सब का सहयोग प्राप्त होना चाहिए। इसके अलावा पंचायत स्तर पर ही सभी सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज की क्षमता वाला स्वास्थ्य केंद्र होना चाहिए। बीमारियों व स्वास्थ्य समस्याओं की रोकथाम के प्रयासों को इसे विशेष महत्त्व देना चाहिए। गर्भवती महिलाओं की जांच-सुरक्षा व बच्चों के सुरक्षित जन्म की उत्तम व्यवस्था इन स्वास्थ्य केंद्रों में रहनी चाहिए। इनके संबंध बड़े अस्पतालों में होने चाहिए व इनके पास एंबुलेंस सुविधा भी होनी चाहिए। शाश्वत ऊर्जा स्रोतों की प्रगति का पूर्ण प्रयास होना चाहिए, जबकि डीजल पर निर्भरता कम होनी चाहिए। यदि इस तरह की समग्र ग्रामीण सोच पर व्यापक सहमति प्राप्त कर इसे पूर्ण प्रोत्साहन मिले तो मात्र एक दशक में ही हमारे गांवों की सूरत बदल सकती है।

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