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अतिथि शिक्षकों के कंधे पर शिक्षा

हर साल विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की रिपोर्टें हमें बताती हैं कि हमारे बच्चे अपनी आयु और स्तर के अनुसार विषयी ज्ञान हासिल करने में पीछे हैं। इसके कारण बहुत हैं। लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि हमने प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा अतिथि शिक्षकों के भरोसे छोड़ दी है। हालांकि रिपोर्ट तो यह भी बताती हैं कि आज न केवल प्राथमिक शिक्षा, बल्कि तमाम विश्वविद्यालयों में भी स्थायी नियुक्तियां न के बराबर हो रही हैं।

दिल्ली के तकरीबन अड़तीस फीसद शिक्षक अतिथि की श्रेणी में आते हैं।

आंकड़ों के पहाड़ से नीचे झांकें तो यही दिखाई देता है कि सिर्फ दिल्ली में तकरीबन बाईस हजार अतिथि शिक्षक सरकारी स्कूलों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ये दस-पंद्रह साल से भी ज्यादा समय से बतौर अतिथि ही शिक्षण में लगे हैं। दिल्ली के तकरीबन अड़तीस फीसद शिक्षक अतिथि की श्रेणी में आते हैं। इन अतिथि शिक्षकों को गर्मियों की छुट्टियों का वेतन नहीं मिलता। यह वह शिक्षक समुदाय है जो अपनी पूरी क्षमता और ऊर्जा लगाता है, लेकिन सुनने को यही मिलता है कि अतिथि शिक्षक स्थायी शिक्षकों की तरह जिम्मेदारी से अपना कार्य नहीं करते।

हाल ही में दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड (डीएसएसबी) ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें चौंकाने वाली बात सामने आई कि अतिथि शिक्षकों की जब परीक्षा ली गई तो उनमें से सतहत्तर फीसद शिक्षक निम्नतम अंक भी हासिल नहीं कर पाए। क्या अब अनुमान लगाना इतना कठिन है कि जहां बाईस हजार अतिथि शिक्षक विभिन्न स्कूलों में अपनी जो सेवा दे रहे हैं, उसकी गुणवत्ता किस स्तर की होगी। क्या ऐसा नहीं है कि हमारे बच्चे भाषा, गणित, विज्ञान आदि में यदि पिछड़ रहे हैं तो उनके पिछड़ने में इन शिक्षकों की सिखाने की शैली का हाथ नहीं होगा? हमारे अतिथि शिक्षक किस प्रकार की शिक्षण प्रविधियों और तरीकों का प्रयोग कक्षा में कर रहे हैं, उस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा को अतिथि व तदर्थ शिक्षकों के कंधे पर डालने की प्रक्रिया नब्बे के दशक में शुरू हो चुकी थी। देखते ही देखते इन शिक्षकों की संख्या देश के विभिन्न राज्यों में फैलती चली गई। केंद्र एवं राज्य दोनों ही सरकारों ने अतिथि और तदर्थ शिक्षकों को स्थायी शिक्षकों के समानांतर एक नई व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश की। इस प्रयास में काफी हद तक सफलता मिली। वहीं दूसरी ओर शिक्षाविदों, शिक्षक-प्रशिक्षकों आदि ने इस तदर्थवादी शिक्षक व्यवस्था का जमकर विरोध भी किया। तर्क-वितर्क की रोशनी में यह समझने-समझाने की कोशिश की गई कि प्राथमिक शिक्षा में अतिथि व तदर्थ शिक्षकों की नियुक्ति से बेहतर है स्थायी शिक्षकों को लगाया जाए। लेकिन शिक्षाविदों का विरोध बस कुछ खबरों की चौहद्दी तक ही सीमित रहा। उनके तर्क और स्थापनाएं सरकारी नीतियों को न तो प्रभावित कर पाए और न इसके लिए मजबूर कर पाए कि क्यों न अतिथि शिक्षकों की बजाय प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा में स्थायी नियुक्ति की जाए।

सरकारें लगातार दूसरे विकल्प पर काम करती रहीं, यानी शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति के स्थान पर अतिथि शिक्षकों की भर्ती पर अड़ी रहीं। अस्थायी शिक्षकों की नियुक्ति को लेकर 2009 में बना शिक्षा के मौलिक अधिकार (आरटीई) अधिनियम भी ज्यादा असर नहीं छोड़ पाया। वर्ष 2010 में बिहार सरकार ने लाखों अर्द्ध प्रशिक्षित एवं महज बीए व एमए पास को बतौर शिक्षक नियुक्तियां प्रदान की थीं। वहीं उत्तर प्रदेश में भी 2010 के बाद अखिलेश सरकार ने भी इसी तर्ज पर शिक्षकों की भर्ती की थी। हालांकि आरटीई एक्ट में स्पष्ट किया गया है कि अप्रशिक्षित शिक्षकों को सेवाकालीन दो वर्ष के अंदर सरकार प्रशिक्षण प्रदान करेगी। कुछ राज्यों में अभी भी ऐसे अतिथि शिक्षक कार्यरत हैं जिनके पास व्यावसायिक दक्षता एवं प्रशिक्षण नहीं है। ऐसे में किस प्रकार की शैक्षणिक गुणवत्ता की उम्मीद कर सकते हैं? हर साल विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों की रिपोर्टें हमें बताती हैं कि हमारे बच्चे अपनी आयु और स्तर के अनुसार विषयी ज्ञान हासिल करने में पीछे हैं। इसके कारण बहुत हैं। लेकिन एक बड़ा कारण यह भी है कि हमने प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक शिक्षा अतिथि शिक्षकों के भरोसे छोड़ दी है। हालांकि रिपोर्ट तो यह भी बताती हैं कि आज न केवल प्राथमिक शिक्षा, बल्कि तमाम विश्वविद्यालयों में भी स्थायी नियुक्तियां न के बराबर हो रही हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में भी स्थायी नियुक्तियों के समानांतर अतिथि शिक्षकों की भर्ती की जा रही है। ऐसे शिक्षकों की संख्या लाखों में है जो पिछले दस-पंद्रह साल से अतिथि शिक्षक के तौर पर ही अपनी सेवा दे रहे हैं। एक बात तो प्रमुखता से उभर कर सामने आती है कि सरकार को अस्थायी नियुक्तियों में कई जिम्मेदारियों से छुटकारा मिल जाता है। वहीं अतिथि शिक्षकों को कभी भी बीच सत्र में भी बाहर का रास्ता दिखाना आसान होता है। जबकि इनसे भी शिक्षण संबंधी तमाम मांगों की पूर्ति की प्रतिबद्धता एवं जवाबदेही की उम्मीद की जाती है। ऐेसे में स्थायी और अस्थायी कर्मी के बीच एक द्वंद्व और संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। इससे कैसे बाहर आया जाए, इस बाबत सरकारी नीतियां कोई खास मदद नहीं करतीं।

खासकर शिक्षण व्यवसाय से संबंध रखने वालों से शैक्षणिक ज्ञान और योग्यता की उम्मीद और अपेक्षा गलत नहीं है। क्योंकि जो व्यक्ति अध्यापन के लिए जा रहा है क्या उसकी शैक्षणिक समझ नवीन और व्यावसायिक अपेक्षाओं के अनुकूल है या नहीं, यह बेहद आवश्यक है। जहां तक शैक्षणिक ज्ञान का मसला है तो अतिथि शिक्षक भी बीएड, एमएड आदि पेशेवर ज्ञान एवं प्रशिक्षण हासिल कर शिक्षण व्यवसाय में आते हैं। यहां एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब वे कोर्स कर रहे होते हैं, तमाम तरह के शैक्षणिक दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास, वर्तमान की समझ साझा की जाती है, लेकिन कहीं न कहीं जब वे बतौर शिक्षक कक्षा में आते हैं तब कुछ और व्यावसायिक ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है जिसके लिए लगातार पढ़ते-लिखते रहना होता है। यदि हमारा शिक्षक अपनी शैक्षणिक ज्ञान और समझ को समय-समय पर पुनर्नवा नहीं करेगा तो वह कहीं न कहीं व्यावसायिक स्तर पर पिछड़ जाएगा। दूसरा महत्त्वपूर्ण मसला है, व्यावसायिक योग्यता व दक्षता। शैक्षणिक ज्ञान तो किताबें पढ़ कर हासिल हो जाता है, लेकिन व्यावसायिक दक्षता अनुभव से ही आती है। जब हमारा शिक्षक कक्षा में खड़ा होता है तब ज्यादा चुनौतियां आती हैं। इनके निपटने के लिए कई बार किताबी ज्ञान और स्वविवेक का प्रयोग करना होता है।

डीएसएसबी की रिपोर्ट इसी ओर इशारा कर रही है कि अतिथि शिक्षकों में व्यावसायिक दक्षता की कमी गहरी है। यदि पूरे देश की स्थिति पर नजर डालें तो स्थितियां संतोषजनक नहीं कही जा सकतीं। हम प्राथमिक और उच्च प्राथमिक शिक्षा को जिन शिक्षकों के कंधे पर डाल कर निशचिंत हो गए हैं, उसके नतीजे आने वाले वक्त में मिलेंगे। इस तल्ख हकीकत से हम कैसे मुंह मोड़ सकते हैं कि कक्षा में सीखने-सिखाने के विभिन्न स्तरों पर बच्चे पिछड़ रहे हैं। तमाम रिपोर्टें लगातार ताकीद कर रही हैं कि बच्चे विभिन्न विषयों की समझ में पीछे हैं। शिक्षक किन व्यावसायिक निष्कर्षों में पिछड़ रहे हैं, इसकी जांच करने की आवाज भी समय-समय पर उल्लती रही है। लेकिन शिक्षकों के विभिन्न धड़ों ने इसका विरोध किया था। गौरतलब है कि जब केंद्रीय एवं राज्य स्तरीय शिक्षक पात्रता परीक्षाएं आयोजित की गईं तो उन परीक्षाओं में भी हमारे शिक्षक उम्मीद से कहीं ज्यादा फेल हुए थे। तब हमने जांच की कसौटियों एवं मानकों पर सवाल खड़े किए थे। क्या मानक और जांच की मंशा पर सवाल फेंक कर इस सच्चाई से मुंह मोड़ सकते हैं कि शिक्षकों की भी सेवाकालीन मूल्यांकन होनी चाहिए? इस प्रकार की जांच परीक्षा और कुछ करे न करे, कम से कम शिक्षकों को आत्म-मूल्यांकन और व्यावसायिक दक्षता मूल्यांकन के अवसर मुहैया कराती हैं। इससे कम से कम शिक्षक अपनी व्यावसायिक प्रतिबद्धता एवं योग्यता को अपने स्तर पर और सांस्थानिक स्तर सीख एवं अधुनातन कर सकता है।

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