ताज़ा खबर
 

राजनीति: शिशु मृत्यु से उभरती चिंताएं

यूनीसेफ की ‘एवरी चाइल्ड अलाइव’ रिपोर्ट में जहां जापान, आइसलैंड और सिंगापुर को जन्म के लिए सबसे सुरक्षित देश बताया गया था, वहीं भारत में नवजात बच्चों को जीवित रखने के लिए ज्यादा ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया गया। निराशाजनक स्थिति यह है कि लाख कोशिशों के बावजूद हम इस मामले में बांग्लादेश, नेपाल, केन्या, मोरक्को, कांगो और भूटान जैसे छोटे देशों से भी निचले पायदान पर खड़े हैं।

Author October 12, 2018 2:45 AM
यूनीसेफ के अनुसार भारत उन देशों में शामिल है जहां नवजात बच्चों की चिंता करने की जरूरत सबसे ज्यादा है।

योगेश कुमार गोयल

हाल में शिशु मृत्यु दर आकलन के लिए कार्य करने वाली संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था यूएनआइजीएमई (युनाइटेड नेशंस इंटर-एजंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टेलिटी) ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। इसमें कहा गया है कि भारत में पानी, स्वच्छता, उचित पोषाहार और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं के अभाव में हर दो मिनट में तीन नवजात दम तोड़ देते हैं। पिछले साल देश में आठ लाख से ज्यादा शिशु इन्हीं वजहों से मारे गए। इस दौरान छह लाख नवजात शिशुओं और पांच से चौदह वर्ष आयु वर्ग के डेढ़ लाख बच्चों की मृत्यु हुई। नवजातों और छोटे बच्चों की मौत के ये भयावह आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि शिशुओं की इतने बड़े पैमाने पर होने वाली मौतों के मामले में सरकार को कोई सरोकार नहीं है। हर साल लाखों मासूमों के मौत के मुंह में समा जाने की छोटी-सी खबर छप कर मामला शांत हो जाता है। लेकिन ऐसे संवेदनशील मसले पर न कोई बहस होती है और न समाज के भीतर इसे लेकर कोई चिंता देखी जाती है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र की संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक शिशु मृत्यु दर में पिछले पांच साल में गिरावट आई है, लेकिन यह इतनी बड़ी गिरावट भी नहीं है, जिसे लेकर संतोष किया जा सके। जहां 2016 में शिशु मृत्यु का आंकड़ा 8.67 लाख था, वहीं पिछले वर्ष यह 8.02 लाख दर्ज किया गया। हमारे लिए चिंता की बात यह होनी चाहिए कि इस मामले में हम अभी भी दुनिया के कई विकसित और विकासशील देशों से तो बहुत पिछड़े हैं ही, कई निर्धन, साधनहीन और पिछड़े माने जाने वाले देश भी हमसे बेहतर स्थिति में हैं। शिशु मृत्यु दर के मामले में नाइजीरिया और पाकिस्तान की स्थिति हमसे बेहतर है।

कुछ महीने पहले यूनीसेफ की एक रिपोर्ट में भी भारत को इस दिशा में अभी और ध्यान दिए जाने पर जोर दिया गया था। यूनीसेफ के अनुसार भारत उन देशों में शामिल है जहां नवजात बच्चों की चिंता करने की जरूरत सबसे ज्यादा है। यूनीसेफ की ‘एवरी चाइल्ड अलाइव’ रिपोर्ट में जहां जापान, आइसलैंड और सिंगापुर को जन्म के लिए सबसे सुरक्षित देश बताया गया था, वहीं भारत में नवजात बच्चों को जीवित रखने के लिए ज्यादा ध्यान देने की जरूरत पर जोर दिया गया। निराशाजनक स्थिति यह है कि लाख कोशिशों के बावजूद हम इस मामले में बांग्लादेश, नेपाल, केन्या, मोरक्को, कांगो और भूटान जैसे छोटे देशों से भी निचले पायदान पर खड़े हैं। यूनीसेफ की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में प्रतिवर्ष जन्म के अट्ठाईस दिन के भीतर दो करोड़ साठ लाख नवजातों में से छह लाख चालीस हजार की मौत हो जाती है, जबकि समूची दुनिया में यह आंकड़ा प्रतिवर्ष छब्बीस लाख है। यानी जन्म के अट्ठाईस दिन के भीतर शिशुओं की मौत के दुनियाभर में करीब एक चौथाई मामले भारत में ही सामने आते हैं। देश में प्रत्येक उनतालीस में से एक बच्चा एक माह की आयु भी पूरी नहीं कर पाता और यहां नवजात मृत्यु दर 25.4 प्रति हजार है, जबकि बांग्लादेश में यह दर 20.1 और श्रीलंका में 5.3 प्रति हजार है। वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा प्रति हजार उन्नीस है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में नवजात शिशुओं की मौत का आंकड़ा भारत में कुछ नीचे आया है। 1990 के दशक में नवजात शिशु मृत्यु दर प्रति हजार 52 थी, जो घट कर 2013 में 28 रह गई थी और इसमें थोड़ी और कमी के साथ यह 25.4 रह गई है लेकिन जैसा कि यूनीसेफ की रिपोर्ट में कहा भी गया है कि अभी इस दिशा में और ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

कुछ समय पहले महाराष्ट्र में एक आरटीआइ के जरिए भी नवजात शिशुओं की मृत्यु को लेकर चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया कि पैंसठ फीसद शिशुओं की सांसें अट्ठाईस दिन के भीतर ही बंद हो जाती हैं। राज्य के परिवार कल्याण विभाग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में अप्रैल 2017 से फरवरी 2018 के बीच 13541 शिशुओं की मृत्यु हुई और इनमें से पैंसठ फीसद शिशु जन्म के अट्ठाईस दिन के अंदर ही मर गए। हालांकि देश में नवजात शिशुओं की मौत के मामले में पिछले कुछ वर्षों में थोड़ी गिरावट दर्ज की गई है, किंतु शर्म की बात है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु को लेकर भारत की चिंताजनक स्थिति को दर्शाती यूनीसेफ और अब संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनआईजीएमई’ की रिपोर्ट को लेकर देश में कोई विशेष प्रतिक्रिया या चिंता देखने को नहीं मिली। दरअसल, जिस देश में मासूम बच्चे ‘मानव तस्करी के शिकार बनते रहे हों, जहां छोटे-छोटे बच्चे ट्रैफिक सिग्नलों पर भीख मांगते नजर आते हों, जगह-जगह ढाबों, रेस्तरां या दुकानों अथवा अन्य व्यावसायिक स्थलों पर बाल मजदूरी करते नजर आते हों, ऐसे माहौल में भला नवजात शिशुओं की मृत्यु को लेकर कौन चिंतित होगा!

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाने का दावा किया जा रहा है, भारी-भरकम बजट स्वास्थ्य के मद में आवंटित किया जाता है, फिर भी शिशु मृत्यु दर में कमी न आना चिंता का कारण तो है ही। हां, संतोषजनक स्थिति यह जरूर है कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर में कमी का लक्ष्य हासिल करने में सफलता प्राप्त हुई है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के मामले में हम अब दूसरे देशों से आगे हैं। ऐसे में अहम सवाल यह है कि आखिर क्या वजह है कि हम पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर पर अप्रत्याशित रूप से नियंत्रण पाने में सफल हो सके हैं, किंतु नवजात मृत्यु दर के मामले में हम पिछड़ रहे हैं? यह स्थिति चिंतित करने वाली इसलिए भी है कि यूनीसेफ के मुताबिक इन नवजात मौतों में से अस्सी फीसद मौतों का कोई गंभीर कारण नहीं होता। इन नवजातों को कुछ सतर्कता से बचाया जा सकता है। सतर्कता के अभाव में होने वाली इन मौतों के अहम कारण गर्भावस्था के दौरान माताओं को उचित पोषण न मिलना, समय पूर्व जन्म, जन्मजात बीमारी, प्रसव के दौरान संक्रमण, प्रसव पश्चात जच्चा-बच्चा को समुचित चिकित्सकीय सुविधाएं न मिलना और लोगों में जागरूकता की कमी है।

संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट में भी पानी, स्वच्छता, उचित पोषाहार और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव नवजातों की मौत के अहम कारण माने गए हैं। यूनीसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या विभाग और विश्व बैंक समूह द्वारा जारी शिशु मृत्यु दर के नए अनुमानों के अनुसार 2017 में पंद्रह वर्ष से कम आयु के तिरसठ लाख बच्चों की मृत्यु हुई, जिनमें से अधिकांश की मौतों को रोका जा सकता था। भले ही हम विकास के कितने ही सोपान तय कर चुके हों, किंतु कटु सत्य यही है कि आज भी देश में दूरदराज के हजारों गांव ऐसे हैं, जहां चिकित्सा सुविधाओं के मद में प्रतिवर्ष भारी-भरकम राशि आवंटित होने के बावजूद लोग प्राथमिक सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। आज भी बहुत से ऐसे इलाके मिल जाएंगे, जहां प्रसव के लिए महिलाओं को बैलगाड़ियों या ऐसे ही अन्य असुविधाजनक साधनों में लाद कर निकट के उन प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक ले जाया जाता है, जहां सुरक्षित प्रसव कराने के लिए पर्याप्त सुविधाएं व संसाधन उपलब्ध नहीं होते। अगर किसी तरह प्रसव सुरक्षित हो भी जाए तो प्रसव के पश्चात ऐसे केंद्रों पर समुचित चिकित्सकीय देखभाल की कोई व्यवस्था नहीं होती। लोगों को अनुभवहीन व अप्रशिक्षित लोगों पर ही आश्रित होना पड़ता है, यह भी शिशु मृत्यु का एक बड़ा कारण है। हालांकि मौजूदा शिशु मृत्यु दर 25.4 को वर्ष 2030 तक 12 फीसद पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन बिना ठोस प्रयासों के इस लक्ष्य को हासिल कर पाना संभव नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App