ताज़ा खबर
 

राजनीति: आतंकियों का नया निशाना

इसी साल आतंकियों ने करीब चालीस पुलिस अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर दहशतगर्दी और दरिंदगी का नया रक्तरंजित खेल शुरू कर दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं। ऐसा कर चरमपंथी न केवल पुलिस को भयभीत कर रहे हैं, बल्कि यह साफ संदेश भी दे रहे हैं कि तमाम दावों के बावजूद कश्मीर में उनका गहरा प्रभाव है, जो सेना की बटालियन बढ़ा देने भर से समाप्त होने वाला नहीं है।

Author October 6, 2018 1:40 AM
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने के लिए साल 1994-95 में विशेष पुलिस अधिकारियों के दस्ते का गठन किया गया था।

ब्रह्मदीप अलूने

वैधता, शक्ति और सत्ता के बीच की बेहद महत्त्वपूर्ण कड़ी है। वैधता से शक्ति को तार्किकता व स्थायित्व मिलता है, वैधता के द्वारा ही जनमत शक्ति को स्वीकार भी करता है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में जनमत की सर्वोच्चता की सामान्य और वैधानिक स्वीकार्यता के बाद भी उसकी वैधता को लेकर जम्मू-कश्मीर में विरोधाभास और अंतर्द्वंद्व साफ दिखाई देता है। सरहद पार की चुनौतियों और आंतरिक अशांति से जूझते इस राज्य में स्थिरता की सारी कवायदें नित नई समस्याओं से सामने हांफती नजर आ रही हैं। दरअसल, आतंक से अभिशप्त कश्मीर को अलगाव और आतंक से बचाने में महती भूमिका निभाने वाले स्थानीय पुलिस और सेना के जवानों की हत्याओं का बढ़ता सिलसिला इस समय सुरक्षा की नई चुनौती बन गया है। राज्य पर अधिकार के असंख्य दावों की अफवाहों ने कश्मीर की सुख शांति को गर्त में धकेल दिया है। प्रदेश को अस्थिरता के इस माहौल से उबारने और आतंक से बचाने की जिम्मेदारी सेना के हाथों में है और इस काम में उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सहयोगी स्थानीय पुलिस ही है। इस साल ही आतंकियों ने करीब चालीस पुलिस अधिकारियों की बेरहमी से हत्या कर दहशतगर्दी और दरिंदगी का नया रक्तरंजित खेल शुरू कर दिया है, जिसके दूरगामी परिणाम बेहद घातक हो सकते हैं। ऐसा कर चरमपंथी न केवल पुलिस को भयभीत कर रहे हैं, बल्कि यह साफ संदेश भी दे रहे हैं कि तमाम दावों के बाद भी कश्मीर में उनका गहरा प्रभाव है, जो सेना की बटालियन बढ़ा देने भर से समाप्त होने वाला नहीं है। जम्मू-कश्मीर में इस समय तकरीबन एक लाख बीस हजार जवान अपनी सेवाएं दे रहे हैं जिनमें अधिकांश कश्मीरी बाशिंदे ही हैं।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से निपटने के लिए साल 1994-95 में विशेष पुलिस अधिकारियों के दस्ते का गठन किया गया था। इस दस्ते में शामिल अधिकांश अधिकारी कश्मीरी ही होते हैं और चरमपंथियों की पहचान से लेकर वे सेना के अभियानों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा भी लेते हैं। कश्मीर की भौगोलिक स्थिति जटिल होने के बाद भी सेना को आतंकियों से निपटने में जो सफलता मिलती आई है, उसमें इन विशेष पुलिस अधिकारियों (एसपीओ) का बड़ा योगदान है। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए बड़ी संख्या में विशेष पुलिस अधिकारी मारे भी गए हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से अनेक पुलिसकर्मी और सेना के जवानों को खासतौर पर निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ी है और उनके अपहरण और हत्या की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। यहां तक कि उनके परिजनों को भी निशाना बनाया जाने लगा है। हालात इतने खराब हैं कि आतंकियों की दहशत और अपनी और परिवार की सुरक्षा की खातिर पुलिस से जुड़े कई जवानों ने तो बाकायदा मस्जिद में जाकर सार्वजनिक रूप से अपनी नौकरी छोड़ देने का एलान कर दिया। दूसरी ओर, स्थानीय युवाओं के आतंकियों से जुड़ने की घटनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। राज्य के खुफिया विभाग का कहना है कि बुरहान वानी की मौत के बाद विरोध-प्रदर्शनों के दौरान ही हिज्बुल मुजाहिदीन ने सिर्फ दक्षिणी कश्मीर में कम से कम पचास युवाओं को भर्ती किया है। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, ये वे लड़के हैं जिनके बारे में हमें पता है। कुछ ऐसे भी हैं, जो अचानक लापता हो जाते हैं और उनके परिवार वाले भी कोई शोर नहीं मचाते। इस तरह की स्थानीय मदद से सेना हैरान है और उसके लिए यह सब जानलेवा बन गया है।

आतंकियों की बढ़ती स्थानीय स्वीकार्यता का खौफनाक रूप चरमपंथियों के जनाजों में देखने को मिलता है। जहां कश्मीरी पुलिस और सेना के जवानों को मारा जा रहा है, वहीं कश्मीर में मारे गए आतंकियों के जनाजे आतंक और दहशत के पर्याय बन गए हैं। सेना के हाथों मारे जाने वाले आतंकियों के जनाजों में भारी भीड़ उमड़ती है और फिर उन्मादी ‘पाकिस्तान जिंदाबाद-भारत मुर्दाबाद’ जैसे नारे लगाए जाते हैं। इन जनाजों में शामिल होकर आतंकी खुले आम हथियारों का प्रदर्शन करते हैं और आतंक को धर्म और जिहाद से जोड़ कर युवाओं को हिंसक गतिविधियों में शामिल करने में कामयाब हो जाते हैं। इन जनाजों से प्रेरित युवाओं को अपने दल में शामिल कर जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन बकायदा इनकी तस्वीरें भी जारी करते हैं जिससे ज्यादा से ज्यादा कश्मीरी युवाओं को आतंकवाद से जोड़ा जा सके। इस साल फरवरी में कश्मीर में आतंकियों के जनाजे को लेकर पुलिस की एक खुफिया रिपोर्ट आई थी, जिसमें कहा गया था कि मुठभेड़ में मारे गए चरमपंथियों के जनाजे नए रंगरूटों की भर्ती के लिए जमीन तैयार करते हैं। यह रिपोर्ट अपराध जांच विभाग (सीआइडी) के इंस्पेक्टर जनरल आॅफ पुलिस की तरफ से पुलिस महानिदेशक को भेजी गई थी, जिसमें कश्मीर घाटी में चरमपंथियों के जनाजे में इकट्ठा होने वाली भीड़ को रोकने के लिए जम्मू-कश्मीर पुलिस को कदम उठाने के लिए कहा गया था। आतंकी जनाजों से पनपने वाले आतंक को कश्मीर के सुरक्षा अधिकारी बड़ी चिंता बताते रहे हैं। वे स्वीकार कर रहे हैं कि घाटी में जैश-ए-मोहम्मद और हिज्ब-उल-मुजाहिदीन जैसे आतंकी संगठन तेजी से प्रभावशील हो रहे हैं।देश का मस्तक समझे जाने वाले कश्मीर में अलगाव और आतंक का यह खेल लगभग तीन दशक से बदस्तूर जारी है। सेना और आतंकियों के बीच भौगोलिक कारणों से बहुत फासला हो जाता है, लेकिन कश्मीर की पुलिस सेना के लिए संजीवनी का काम करती रही है। वह न केवल कश्मीर की आबोहवा को जानती है, बल्कि इसके साथ वह इरादों और गैर-इरादों में फर्क कर आतंकियों के लिए मौत का सबब बन जाती है। लेकिन पिछले कुछ समय से हालात जटिल हो गए हैं। दहशतगर्दी और दरिंदगी के पसरते माहौल में स्थानीय पुलिसकर्मी लाचार और बेबस नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ समय से सेना और पुलिस से जुड़े कई लोगों की हत्याओं के बाद भी उनको सुरक्षा मुहैया कराने की अभी तक कोई नीति नहीं बन पाना सामरिक दृष्टि से भी आत्मघाती है। ऐसे हालात में यह भी जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि स्थानीय स्तर पर समाज में आतंकियों के पक्ष में खुलापन और सुरक्षाकर्मियों के मामले में नफरत कैसे पनप रही है।

पाकिस्तान ने भारत के जम्मू-कश्मीर में लगभग 78,000 वर्ग किलोमीटर भू-भाग पर अवैध कब्जा जमा रखा है, जबकि चीन ने भारत के इसी राज्य में लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर भू-भाग को अवैध रूप से कब्जाया हुआ है। इसके अलावा 5180 वर्ग किलोमीटर भारतीय भू-भाग अवैध रूप से पाकिस्तान ने चीन को सौंप दिया है। एलओसी यानी नियंत्रण रेखा पर भी अशांति बनी हुई है जो कश्मीर को दो-एक के अनुपात में बांटती है। जाहिर है, कश्मीर को लेकर भारत की चिंता आंतरिक के साथ बाहरी भी है और इसके लिए कई मोर्चों पर काम करने की जरूरत है। किसी राजनीतिक प्रणाली की वैधता तभी सही मायने में साकार हो सकती है जब उसमें लोगों के मन में विश्वास पैदा करने की क्षमता हो और उसके कायम रहने की भरपूर संभावना भी हो। जम्मू-कश्मीर में सत्ता और उसकी वैधानिकता को लेकर पाकिस्तान का दुष्प्रचार और बाहरी हस्तक्षेप के व्यापक विपरीत प्रभाव पड़े हैं। स्थानीय जनता में स्थापित वैधानिक व्यवस्था को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति बढ़ गई है, जिसे राष्ट्रीय कर्तव्यों की अनदेखी कहा जा सकता है। स्थानीय जनता के अलगावपसंद व्यवहार से उत्साहित आजादी के कथित पहरुए अधिकारों के नाम पर आतंक को प्रश्रय देने से गुरेज भी नहीं करते। इसलिए कश्मीर को लेकर परंपरागत नीतियों के साथ ही कूटनीतिक समन्वय की जरूरत है। सरहद पर आक्रामकता दिखाने के साथ अलगाववादियों और पाकिस्तान से बातचीत के रास्ते खोजने ही होंगे। इसके साथ ही कश्मीरी युवाओं का मनोबल बना रहे, उन्हें सेना और पुलिस में रोजगार मिलता रहे और उनकी सुरक्षा भी सुनिश्चित रहे, ऐसी नीति को भी अविलंब लागू करने की आवश्यकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App