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राजनीति: कैसे रुकेंगे सड़क हादसे

आमतौर पर देखा जाता है कि दो-पहिया वाहन चालक हेल्मेट और चार-पहिया वाहनों में सवार लोग सीट-बेल्ट लगाने से बचते हैं। इन मानवीय चूकों या असावधानियों की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। देश में शराब पीकर वाहन चलाने और गाड़ी चलाते समय फोन पर बात करने वालों की तादाद भी कम नहीं है।

Author August 24, 2018 2:59 AM
सांकेतिक तस्वीर

सुधीर कुमार

भारत में बढ़ते सड़क हादसे गंभीर चिंता का विषय हैं। देश में रोजाना होने वाले एक हजार से ज्यादा सड़क हादसों में करीब चार सौ लोग जान गंवा बैठते हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की सलाना रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल होने वाले औसतन साढ़े चार लाख सड़क हादसों में डेढ़ लाख से भी ज्यादा लोगों की मौत हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय सड़क संगठन के मुताबिक दुनियाभर में हर साल सड़क दुर्घटनाओं की वजह से बारह लाख लोग मारे जाते हैं और करीब पचास लाख लोग प्रभावित होते हैं। इनमें करीब बारह फीसद हादसे केवल भारत में होते हैं, जो दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले सर्वाधिक हैं। गौरतलब है कि ऐसे ज्यादातर हादसे यातायात नियमों का पालन नहीं करने, सड़कों की गुणवत्ता खराब होने, तेज गति से वाहन चलाने, थकान व नशे की हालत में वाहन चलाने, नाबालिगों को वाहन चलाने की अनुमति देने, वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करने और गाड़ियों में क्षमता से अधिक सवारियां भरने के कारण हुए हैं। ऐसे जानलेवा हादसों पर अंकुश लगाना इसलिए भी जरूरी है कि इस वजह से मानव संसाधन का व्यापक स्तर पर असमय विनाश हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन के मुताबिक सड़क दुर्घटनाओं के कारण भारत को हर साल अट्ठावन अरब डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। यह राशि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के तीन फीसद से अधिक बैठती है। यह भी उल्लेखनीय है कि हमारे यहां जितने लोगों की मौत आतंकी घटनाओं की वजह से होती है, उससे कई गुना ज्यादा मौतों की एकमात्र वजह सड़क हादसे हैं। ऐसे हादसे कई बार लोगों के महत्त्वपूर्ण अंग छीन लेते हैं। कृत्रिम विकलांगता का यह रूप आमतौर पर लोगों को आर्थिक रूप से लाचार बना देता है, जबकि किसी परिवार के कमाने वाले एकमात्र सदस्य की सड़क दुर्घटना में मौत से परिवार बेसहारा हो जाता है।

रिपोर्ट बताती है कि सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों में अठारह से पैंतीस वर्ष के युवाओं की तादाद सर्वाधिक यानी छियालीस फीसद है। देश की आबादी में युवाओं की हिस्सेदारी करीबन पैंसठ फीसद है। लेकिन कई युवा अपने वाहन की उच्च गति से समझौता नहीं करना चाहते, जिससे कई बार वाहन पर नियंत्रण नहीं रह जाता और वे हादसे का शिकार हो जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि चालक अगर अपनी रफ्तार में पांच फीसद की भी कमी लाता है, तो जानलेवा दुर्घटना की संभावना को तीस फीसद तक कम किया जा सकता है। सड़कें किसी भी देश के आर्थिक व सामाजिक विकास की धुरी होती हैं। इनसे न सिर्फ भौतिक वस्तुओं की ढुलाई आसान होती है, बल्कि इन्हीं सड़कों पर गतिमान परिवहन के विविध साधनों ने देश के नागरिकों को सस्ती और घर-घर तक पहुंचाने वाली सेवाएं उपलब्ध कराई हैं। इसके अलावा, अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में सड़कों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। हालांकि विकास की प्रक्रिया में उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ एक तरफ जहां सड़कों की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ है, वहीं दूसरी तरफ नागरिकों के खून से लथपथ होती सड़कों ने विकास के आधुनिक मॉडल और नागरिकों के विवेक पर प्रश्नचिह्न भी लगाए हैं। देश में सड़क हादसे रोकने के लिए सरकारें लंबे समय से प्रयास करती रही हैं। लेकिन आधुनिक व भागदौड़ भरी जिंदगी के आगे यातायात नियमों के प्रति बढ़ती लापरवाही और गंतव्य स्थल तक पहुंचने की बेचैनी कई बार हमें मौत के दरवाजे तक ले जाती है। जाहिर है, यातायात नियमों का पालन नहीं करके हम अपना जीवन खतरे में डाल रहे हैं। सड़क अनुशासन का पहला नियम दो-पहिया वाहन चलाते हुए हेल्मेट और चार-पहिया वाहनों की सवारी करते समय सीट-बेल्ट का प्रयोग करना है। लेकिन दुर्भाग्य है कि लापरवाही की वजह से इन आदतों को हम एक संस्कृति के रूप में विकसित करने में विफल रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हेल्मेट का इस्तेमाल कर सड़क हादसों में होने वाली मौत के खतरे को चालीस फीसद तक कम किया जा सकता है। इसके अलावा, हेल्मेट दुर्घटना में गंभीर चोट लगने की संभावना को सत्तर फीसद तक कम कर देता है। लेकिन आमतौर पर देखा जाता है कि दो-पहिया वाहन चालक हेल्मेट और चार-पहिया वाहनों में सवार लोग सीट-बेल्ट लगाने से बचते नजर आते हैं।

इन मानवीय चूकों या असावधानियों की वजह से सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। देश में शराब पीकर वाहन चलाने और गाड़ी चलाते समय फोन पर बात करने वालों की तादाद भी कम नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शराब पीकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ बनाए गए कानून को अच्छी तरह अमल में लाया जाए तो सड़क हादसों में बीस फीसद तक की कमी लाई जा सकती है। दुनियाभर में होने वाले सड़क हादसों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहली बार ‘सड़क सुरक्षा दशक’ की संकल्पना इस दशक के प्रारंभ में प्रस्तुत की गई थी। मई, 2011 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2011-2020 की समयावधि को ‘सड़क सुरक्षा दशक’ के रूप में मनाने की घोषणा की थी। इसका लक्ष्य दशक के अंत तक यानी 2020 तक दुनियाभर में होने वाले सड़क हादसों में पचास फीसद तक कमी लाना है। संयुक्त राष्ट्र के इस अभियान के हिस्सेदार रहे दुनिया के सौ से अधिक देश अपने यहां सड़क सुरक्षा प्रबंधन, सड़कों की आधारभूत संरचना, वाहन सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने पर जोर दे रहे हैं। इसके अलावा सड़क हादसों को रोकने की दिशा में दूसरा बड़ा अंतरराष्ट्रीय मंथन 18-19 नवंबर, 2015 को ब्राजील के ब्रासीलिया शहर में सड़क सुरक्षा पर आयोजित दूसरे वैश्विक सम्मेलन में किया गया था। सम्मेलन के बाद दुनियाभर के दो हजार से ज्यादा प्रतिनिधियों ने ‘ब्रासीलिया घोषणापत्र’ पर हस्ताक्षर कर दशक के अंत तक सड़क दुर्घटनाओं को आधी करने के लक्ष्य के प्रति अपनी वचनबद्धता दिखाई थी। भारत भी उस मुहिम का हिस्सा रहा है।

लेकिन बीते दिनों मोटर वाहन (संशोधन) विधेयक-2017 के राज्यसभा से पारित नहीं होने और एक सशक्त कानून के रूप में धरातल पर न उतर पाने से वर्ष 2020 तक सड़क हादसों को आधा करने की भारत की प्रतिबद्धता को गहरा झटका लगा है। सड़क हादसों रोकने का एक सबल पक्ष नागरिकों का राष्ट्र के प्रति अपने दायित्व समझने और यातायात नियमों के समुचित पालन से जुड़ा है। देश में सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले इंसानी ‘फरिश्तों’ को कानूनी सुरक्षा देकर अन्य लोगों को भी घायलों के प्रति संवेदनशील बनने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च, 2016 में एक फैसले में कहा था कि सड़क हादसों में घायल की मदद करने वाले से अस्पताल प्रबंधन या पुलिस कोई अनावश्यक पूछताछ नहीं करेगी। इसके अलावा सरकार ने एक महत्त्वपूर्ण घोषणा की थी कि सड़क हादसों में घायलों की मदद करने वाले भी अब वीरता पुरस्कार के हकदार होंगे। केरल सरकार ने पिछले साल नवंबर में एक कानून बना कर सड़क हादसे में घायल किसी भी शख्स के शुरुआती अड़तालीस घंटे तक होने वाले इलाज का पूरा खर्च उठाने की घोषणा की थी। केरल का यह अनूठा कदम अन्य राज्यों के लिए भी अनुकरणीय है। देश में अधिकांश सड़क हादसे सड़क सुरक्षा के प्रति लापरवाही, यातायात नियमों के उल्लंघन और मानवीय चूक की वजह से होते हैं। सड़क हादसों को रोकना भी हमारे हाथों में ही है। सरल यातायात नियमों का सहजता से पालन कर और वाहन चालकों और यात्रियों को जागरूक बना कर सड़क हादसों में कमी लाई जा सकती है। जरूरत इस बात की है कि लोग यातायात नियमों के प्रति अपनी सच्ची वफादारी निभाना सीख जाएं।

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