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राजनीति: शताब्दी के बड़े सवाल

जहां महाविनाशक हथियारों जैसे खतरों के प्रति सचेत होना जरूरी है, वहीं यह समझ बनाना भी जरूरी है कि इनके उपयोग की संभावना क्यों बढ़ रही है। विश्व में विभिन्न देशों विशेषकर अधिकतर ताकतवर देशों का संचालन मूलत: अपने देश की आर्थिक व राजनीतिक शक्ति व आधिपत्य बढ़ाने के लिए हो रहा है। इस स्थिति में धरती पर जीवन की रक्षा करने जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पीछे रह जाते हैं।

Author October 5, 2018 2:55 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

भारत डोगरा

इक्कीसवीं शताब्दी में पहले से कहीं गंभीर चुनौतियां मानवता के सामने हैं। यदि मात्र एक वाक्य में इस शताब्दी को परिभाषित करना है तो यह धरती पर जीवन के अस्तित्व मात्र के लिए संकट उत्पन्न होने की शताब्दी है। धरती पर अनेक छोटे बदलाव होते रहे हैं, लेकिन मानव के धरती पर आगमन के बाद ऐसे हालात पहली बार इक्कीसवीं शताब्दी में ही निर्मित हुए हैं कि मानव निर्मित कारणों से जीवन को संकट में डालने वाली स्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। इस संकट के चार पक्ष हैं। पहला है, पर्यावरणीय संकट। पर्यावरणीय संकट के भी अनेक पक्ष हैं। जैसे- जलवायु परिवर्तन, जल संकट, वायु प्रदूषण, समुद्र प्रदूषण, जैव विविधता का तेज ह्रास, फास्फोरस और नाइट्रोजन चक्र में बदलाव, अनेक खतरनाक नए रसायनों व उत्पादों का बिना पर्याप्त जानकारी के प्रसार, ओजोन परत में बदलाव आदि। दूसरा पक्ष है- महाविनाशक हथियारों विशेषकर परमाणु, रासायनिक, जैविक और रोबोट हथियार। इनमें रासायनिक व जैविक हथियार प्रतिबंधित हैं। रोबोट हथियार अभी विकास की आरंभिक स्थिति में हैं। इसके बावजूद परमाणु हथियारों के साथ ऐसे अन्य हथियार भी जीवन के अस्तित्व को संकट में डाल सकते हैं। तीसरा पक्ष है कुछ तकनीकों, जैसे जेनेटिक इंजीनियरिंग व रोबोट का एक सीमा से आगे विकास। चौथा पक्ष है- संक्रामक रोगों का सामना करने में नई समस्याएं खड़ी होना (जैसे एंटीबायोटिकों के दुरुपयोग के कारण इनका बेअसर होना) और इस स्थिति में जैविक हथियार के उपयोग की संभावना।

अस्तित्व का संकट उत्पन्न करने वाले खतरों को चार या अधिक श्रेणियों में विभाजित करने से उनकी समझ बेहतर बन सकती है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि इन संकटों से हमें अलग-अलग ही जूझना होगा। इनमें से अनेक संकट साथ-साथ बढ़ रहे हैं और व्यावहारिक स्तर पर हमें इनके मिलेजुले असर को ही सहना होगा। जलवायु बदलाव के संकट का असर जो हम झेलेंगे, वह जल-संकट, समुद्रों में आ रहे बदलावों, जैव विविधता के ह्रास आदि से नजदीकी तौर पर जुड़ा है। दूसरी ओर, यदि परमाणु हथियारों का उपयोग वास्तव में होता है तो उसके बाद एक बड़े क्षेत्र में जो बदलाव आएंगे, वे विभिन्न अन्य पर्यावरणीय संकटों के साथ मिल कर धरती की जीवनदायिनी क्षमता को प्रभावित करेंगे। इसी तरह रोबोट तकनीक के सिविल उपयोग से उसके सैन्य उपयोग की संभावनाएं बढ़ेंगी। कृषि व स्वास्थ्य में जेनेटिक इंजीनियरिंग के उपयोग से नए बायोलोजिकल हथियारों की संभावनाएं खुलने लगती हैं। इस तरह ये विभिन्न गंभीर खतरे एक-दूसरे से विभिन्न स्तरों पर जुड़े हुए हैं। वर्ष 1992 में लगभग डेढ़ हजार वैज्ञानिकों ने धरती के जीवन को संकट में डालने वाले कारकों के प्रति एक चेतावनी जारी की थी। इस चर्चित चेतावनी के पच्चीस साल पूरे होने पर एक अन्य चेतावनी वर्ष 2017 में जारी की गई, जिस पर लगभग पंद्रह हजार वैज्ञानिकों ने हस्ताक्षर किए। इसमें कहा गया है कि ‘वर्ष 1992 से अब तक जिन पर्यावरणीय चुनौतियों के बारे में पहले से चेतावनी दी गई थी, मानवता उनके समाधान में पर्याप्त प्रगति नहीं कर सकी है। सबसे चिंता की बात तो यह है कि इनमें से अधिकांश चुनौतियां पहले से अधिक विकट हो रही हैं। समय तेजी से निकल रहा है। कहीं बहुत देर न हो जाए। हमें अपने दैनिक जीवन में व हमारी शासन संस्थानों को यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने तमाम तरह के जीवन के साथ यह धरती ही हमारा एकमात्र घर है।’

इस समय धरती की स्थिति उस विशाल हवेली की तरह है जिसकी नींव बहुत कमजोर हो गई थी और वह गिरने वाली थी, लेकिन उसके प्रबंधकों ने उसे किराए पर चढ़ाने के लिए बहुत चमक-दमक से बाहरी तौर पर सजा दिया। इस तरह वे खूब पैसा तो कमा रहे हैं, और बाहरी तौर पर हवेली में बहुत सजावट व चमक है। पर वास्तविक स्थिति यह है कि वह ढहने वाली है। इस हकीकत के बारे में उन चंद व्यक्तियों को ही पता है जो इस समय हवेली से खूब पैसा कमा रहे हैं और बाद में अपना बचाव करने में सक्षम होंगे। पर अधिकांश साधारण लोगों का क्या होगा? उनकी स्थिति तो निरंतर संकटग्रस्त होती जा रही है। यही स्थिति आज धरती की है। अत: एक बड़ी जरूरत तो इस बात की है कि लोग जीवन को संकट में डालने वाले खतरों के प्रति कहीं अधिक सचेत और सक्रिय हों। जहां महाविनाशक हथियारों जैसे खतरों के प्रति सचेत होना जरूरी है, वहीं यह समझ बनाना भी जरूरी है कि इनके उपयोग की संभावना क्यों बढ़ रही है। विश्व में विभिन्न देशों विशेषकर अधिकतर ताकतवर देशों का संचालन मूलत: अपने देश की आर्थिक व राजनीतिक शक्ति व आधिपत्य बढ़ाने के लिए हो रहा है। इस स्थिति में धरती पर जीवन की रक्षा करने जैसे सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य पीछे रह जाते हैं। विभिन्न देशों की आंतरिक राजनीति भी प्राय: क्षुद्र उद्देश्यों, तरह-तरह की स्वार्थी व संकीर्ण राजनीतिक उठापटक, उग्र पूंजीवाद व क्रोनी कैपिटलिज्म से प्रभावित है। इस स्थिति में राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी कोई बड़ी पहल नहीं हो पा रही है जो अन्य देशों को धरती की रक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित कर सके। यदि धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं की रक्षा करनी है तो इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व विभिन्न देशों के आंतरिक स्तर पर सबसे पहले अमन-चैन आधारित कानून-व्यवस्था कायम करना बहुत जरूरी है। जो बहुत से बुनियादी कार्य बड़े स्तर पर करने जरूरी हैं, उनके लिए आवश्यक है कि विश्व में अमन-शांति, कानून-व्यवस्था और मजबूत लोकतंत्र हो। यह तभी संभव है जब जनशक्ति से लोकतंत्र, अमन-शांति और न्याय-समता के पक्ष में एक बड़ा उभार आए।

लोकतंत्र मजबूत नहीं होगा तो जीवन को संकट में डालने वाली स्थितियों के दौर में स्वार्थी तत्त्व तरह-तरह के अटपटे समाधान सामने लाएंगे, जिससे समस्याएं और बढ़ सकती हैं। न्याय व समानता की दिशा में प्रयास नहीं हुए तो जनसाधारण के समर्थन वाला कोई बड़ा उभार नहीं आ सकेगा। इसके लिए आर्थिक समानता के साथ सामाजिक समानता जैसे लिंग, जाति, धर्म, नस्ल, रंग आदि पर आधारित समानता जरूरी है। तभी धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं की रक्षा के लिए एकजुटता व एकता से कार्य निरंतरता से हो सकेगा। अत: धरती की रक्षा के लिए जो भी व्यापक कार्यक्रम बनने हैं, वे अमन-शांति, न्याय व लोकतंत्र के दायरे में ही बनाने होंगे। अत: जरूरत इस बात की है कि जो भी न्याय, समता, अमन-शांति और लोकतंत्र को मजबूत करने वाले संगठन व जन-आंदोलन हैं, वे आपसी एकजुटता बढ़ाएं और साथ में धरती की जीवनदायिनी शक्ति की रक्षा से जुड़ने के लिए अपने कार्य में जरूरी विस्तार भी करें। धरती की रक्षा के व्यापक मुद्दों को लोगों के दुख-दर्द कम करने के मुद्दों से जोड़ कर इनके लिए व्यापक समर्थन हासिल किया जा सकता है। ऐसे प्रयासों के दौरान जनसाधारण की धरती की जीवनदायिनी क्षमताओं संबंधी समझ भी बढ़ाई जा सकती है। उदाहरण के लिए, अमन-शांति के आंदोलन दैनिक जीवन में हिंसा के विरुद्ध कार्य करें, पर साथ में महाविनाशक हथियारों के विरुद्ध क्या करना जरूरी है, इसकी समझ भी बनाएं। इस तरह जमीनी स्तर पर जब धरती की रक्षा संबंधी मुद्दों की समझ व्यापक बनेगी और नीचे से ऊपर तक निरंतरता से इसके लिए जरूरी कदम उठाने का दबाव बनेगा, तब राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनके बारे में असरदार कार्रवाई की संभावना बढ़ सकेगी। इन संकटों को कम करने के लिए उचित समय पर जरूरी कदम उठाए जा सकें, इसके लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत सुधार भी जरूरी हैं। उदाहरण के लिए, ऐसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान बन सकते हैं जो लोकतांत्रिक ढंग से गठित हों और धरती की रक्षा के मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य निर्णय ले सकें, जो धरती की जीवनदायिनी क्षमता की रक्षा के निर्णय समय रहते ले सकें और उन पर अमल कर सकें।

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