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राजनीति : बेटियों को बचाने के लिए

लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन का बड़ा कारण अशिक्षा और अंधविश्वास हैं। पर आज शिक्षित समाज में भी यह समस्या नासूर की भांति फैल रही है। सवाल है कि हमारा तथाकथित आधुनिक समाज किस दिशा में जा रहा है? अगर उच्चशिक्षित, संपन्न, शहरी लोग भी यह धारणा पाले बैठे हैं कि उनका वंश बेटे से ही चलेगा, तो अनपढ़ और ग्रामीण परिवेश से जुड़े लोगों की सोच पर किस मुंह से सवाल उठाएं?

Author May 18, 2018 3:50 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

योगेश कुमार गोयल

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान के तहत कम लिंगानुपात वाले दो सौ चौवालीस जिलों के जिलाधिकारियों के साथ हुई एक बैठक के दौरान यह खुलासा हुआ कि बेहद कम लिंगानुपात वाले इन जिलों में मध्यप्रदेश के पचास, बिहार के अड़तीस, महाराष्ट्र के पैंतीस, राजस्थान के तैंतीस, तमिलनाडु के बत्तीस, ओड़िशा के तीस, कर्नाटक के तीस, गुजरात के छब्बीस, झारखंड के चौबीस, जम्मू-कश्मीर के बाईस, उत्तर प्रदेश के इक्कीस, हरियाणा के इक्कीस और पंजाब के बीस जिले शामिल हैं। इन सभी जिलों में लिंगानुपात दर राष्ट्रीय औसत दर नौ सौ अठारह से कम या लगभग बराबर है। हरियाणा, पंजाब व राजस्थान को ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान को अच्छी तरीके से लागू कर ‘जीरो से हीरो’ तक का सफर तय करने के लिए सराहा गया है, वहीं बिहार और जम्मू कश्मीर सरीखे राज्य इसमें फिसड्डी साबित हुए हैं। कुछ राज्यों में हालात बहुत बदतर हैं। बिहार में यह अभियान असफल होने का प्रमुख कारण यह रहा कि कोष कभी जिलों में नहीं पहुंचा और कई मामलों में जिलाधिकारियों का जल्दी-जल्दी तबादला भी हो गया। कहने को हरियाणा, पंजाब और राजस्थान की स्थिति अभी इतनी नहीं सुधरी है कि उसे लेकर संतोष व्यक्त किया जा सके, लेकिन कुछ जगहों पर बेहतरीन परिणाम सामने आए हैं। जैसे हरियाणा के झज्जर जिले में अप्रैल 2017 में लिंगानुपात की दर महज 882 थी, जो अप्रैल 2018 में 982 पहुंच गई है।

उल्लेखनीय है कि हमारे समाज में बेटे-बेटी में फर्क करने की मानसिकता में बदलाव लाने और लड़कियों की दशा सुधारने के लिए अभियान चलाए जाने के बावजूद लिंगानुपात की स्थिति बेहद चिंताजनक है। ‘स्वस्थ राज्य और प्रगतिशील भारत’ नामक एक रिपोर्ट से पता चला था कि देश के इक्कीस बड़े राज्यों में से सत्रह में लिंगानुपात में गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक जन्म के समय लिंगानुपात मामले में गुजरात की हालत सबसे खराब है, जहां लिंगानुपात नौ सौ सात से घट कर आठ सौ चौवन रह गया है। कन्याभ्रूण हत्या के लिए पहले से ही बदनाम हरियाणा लिंगानुपात मामले में पैंतीस अंकों की गिरावट के साथ दूसरे स्थान, राजस्थान में बत्तीस, उत्तराखंड में सत्ताईस, महाराष्ट्र में अठारह, हिमाचल प्रदेश में चौदह, छत्तीसगढ़ में बारह और कर्नाटक ग्यारह अंकों की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि पंजाब, उत्तर प्रदेश और बिहार में लिंगानुपात में क्रमश: उन्नीस, दस और नौ अंकों का सुधार हुआ, जो आशाजनक तो है, पर स्थिति ऐसी भी नहीं है जिसे लेकर हम ज्यादा उत्साहित हो सकें। लिंगानुपात में मामूली सुधार के बावजूद इन राज्यों की स्थिति भी इस मामले में कोई बहुत बेहतर नहीं है। नीति आयोग के अनुसार उत्तर प्रदेश में अभी भी प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या मात्र आठ सौ उनयासी है, जबकि बिहार में यह संख्या नौ सौ सोलह है। कन्याभ्रूण हत्या को रोकने के लिए जिस तरह सरकारी योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जाता रहा है, उसके बावजूद लिंगानुपात का बिगड़ता संतुलन गंभीर चुनौती है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’, ‘लाडली बेटी योजना’, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ सरीखी योजनाओं के अलावा ‘सेल्फी विद डॉटर’ अभियान नारी सशक्तीकरण की दिशा में बहुत अच्छा प्रयास है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो इन महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के परिणाम आशाजनक नहीं रहे। ऐसे में सवाल यही है कि लिंगानुपात की स्थिति क्यों नहीं सुधर रही है? आखिर कहां कमी रह गई हमारे प्रयासों में?

सबसे अहम कारण तो यही है कि हमारी रूढ़िवादी मानसिकता में खास बदलाव नहीं आ पाया है। लिंग परीक्षण को लेकर देश में कड़े कानूनों के बावजूद आज भी अधिकांश लोग बेटे की ख्वाहिश के चलते लिंग परीक्षण का सहारा ले रहे हैं, जिससे कन्याभ्रूण हत्याएं जारी हैं। आर्थिक सर्वे 2017-18 की एक रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि देश में इस दौरान दो करोड़ दस लाख अनचाही लड़कियों का जन्म हुआ। एक अन्य रिपोर्ट में उजागर हुआ है कि पिछले कुछ वर्षों से प्रतिवर्ष देश में तीन से सात लाख कन्याभ्रूण नष्ट कर दिए जाते हैं, जिसके फलस्वरूप देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में करीब पांच करोड़ कम है। लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन का बड़ा कारण अशिक्षा और अंधविश्वास है। इसी कारण लड़के-लड़कियों में भेदभाव किया जाता रहा है। पर आज शिक्षित समाज में भी यह समस्या नासूर की भांति फैल रही है। सवाल है कि हमारा तथाकथित आधुनिक समाज किस दिशा में जा रहा है? आज भी हमारा शिक्षित समाज मध्यकालीन सोच से ग्रस्त है। अगर उच्चशिक्षित, संपन्न, शहरी लोग भी यह धारणा पाले बैठे हैं कि उनका वंश बेटे से ही चलेगा, तो अनपढ़ और ग्रामीण परिवेश से जुड़े लोगों की सोच पर किस मुंह से सवाल उठाएं? जब तक हमारे दिलोदिमाग में बेटे से ही वंश चलने जैसी सोच बरकरार रहेगी, तब तक महज सरकारी योजनाओं के सहारे हालात सुधरने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

देश में जहां वर्ष 1950 में लैंगिक अनुपात नौ सौ सत्तर के करीब था, वह वर्ष 2011 की जनगणना में नौ सौ उनतालीस रह गया था। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी लैंगिक अनुपात में आई गिरावट को लेकर चिंता जताते हुए इसका कारण जानना चाहा था। एक सरकारी अध्ययन में सामने आया है कि अगर यही हालात रहे तो वर्ष 2031 तक प्रति एक हजार लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या सिर्फ आठ सौ अनठानवे रह जाएगी। लिंगानुपात के बढ़ते असंतुलन के खतरनाक परिणामों का आभास इसी से हो जाता है कि आज कुछ जगहों पर लोग बेटों की शादी के लिए दूसरे राज्यों से गरीब परिवारों की लड़कियों को खरीद कर लाने लगे हैं। कन्याभ्रूण हत्या के लिए बदनाम हरियाणा जैसे राज्य में तो ‘मोलकी’ नामक यह प्रथा कुछ ज्यादा ही प्रचलित हो रही है। दूसरी ओर लड़कों के विवाह के लिए लड़कियों के अपहरण की घटनाएं भी जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे हमारा सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह छिन्न-भिन्न हो रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की 2016 की एक रिपोर्ट में उजागर हुआ है कि देशभर में कुल 66225 लड़कियों का अपहरण हुआ, जिनमें से 33855 लड़कियों का अपहरण सिर्फ शादी के लिए किया गया। नीति आयोग की रिपोर्ट में पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994’ (पीसीपीएनडीटी) को लागू करने और लड़कियों के महत्त्व के बारे में प्रचार करने के लिए जरूरी कदम उठाने की जरूरत पर बल दिया गया है और राज्यों से लिंग चयन कर गर्भपात की प्रवृत्ति पर कड़ाई से अंकुश लगाने का आग्रह किया गया है। हालांकि यह सुखद बात है कि हमारे समाज के सभी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है, बल्कि कई क्षेत्रों में तो लड़कियां लड़कों से कहीं आगे हैं। लेकिन लैंगिक असमानता को लेकर जब तक लोगों की मानसिकता में अपेक्षित बदलाव नहीं आता, हालात में सुधार की उम्मीद बेमानी होगी। जहां तक लोगों की मानसिकता में बदलाव लाने की बात है तो नारी सशक्तीकरण और बेटियों को गरिमामय जीवन देने के लिए सरकार द्वारा कई बेहतरीन योजनाएं तो चलाई जा रही हैं। लेकिन यहां यह ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसा न हो कि विभिन्न सरकारी योजनाएं सरकारी फाइलों या विभिन्न मंचों पर सरकारी प्रतिनिधियों द्वारा फोटो खिंचवाने की प्रथा तक ही सीमित होकर रह जाएं। इसके लिए युद्धस्तर पर जनजागरण अभियान की महती आवश्यकता है।

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