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फिर भ्रष्टाचार से कौन लड़ेगा

खबर है कि नेशनल प्रिंटिंग प्रेस में व्याप्त कथित अनियमितताएं जिस शख्स की जनहित याचिका की वजह से उजागर हुर्इं, उसने अपने उत्पीड़न के बारे में शिकायत की है। दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने वाले रमाकांत दीक्षित ने कहा है कि उन पर दबाव डाला जा रहा है कि अपनी जनहित याचिका […]

Author नई दिल्ली | August 29, 2015 11:15 am
उच्चतम न्यायालय

खबर है कि नेशनल प्रिंटिंग प्रेस में व्याप्त कथित अनियमितताएं जिस शख्स की जनहित याचिका की वजह से उजागर हुर्इं, उसने अपने उत्पीड़न के बारे में शिकायत की है। दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने वाले रमाकांत दीक्षित ने कहा है कि उन पर दबाव डाला जा रहा है कि अपनी जनहित याचिका वापस लें। संस्थान के अंदर उन पर ‘मानसिक दबाव डाला जा रहा है।’

गौरतलब है कि सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठान सिक्युरिटी प्रिंटिंग ऐंड मिंटिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एसपीएमसीआइएल) बैंक नोट्स, सिक्के, गैर-न्यायिक स्टाम्प, डाक टिकट और सरकारी दस्तावेजों से संबंधित अन्य सामग्री निर्मित करता है। जनहित याचिका में उनके सीएमडी की नियुक्ति को चुनौती दी गई है। याचिका में प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर उच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह इस बात पर गौर करे कि ऐसे शख्स को वहां कैसे नियुक्त किया जा सकता है, जो उस पद के लिए अपात्र और कथित तौर पर दागी हो।

विडंबना है कि अदालत द्वारा दी गई छह सप्ताह की मोहलत बीत जाने के बावजूद केंद्र सरकार की तरफ से इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया है। फिलवक्त यह बताया नहीं जा सकता कि याचिकाकर्ता विसलब्लोअर की ‘मानसिक यंत्रणा’ कब समाप्त होगी?

वैसे प्रस्तुत मामले में जो भी कार्रवाई केंद्र करे, मगर अब यह सच्चाई है कि जैसा वातावरण बन रहा है उसमें विसलब्लोअर बनने के जोखिम बढ़ते जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर संसद के बजट सत्र में विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम के कई प्रावधानों को हल्का करने के लिए संशोधन पारित किए गए। बिना किसी सार्वजनिक बहस के लाए गए और संसद में विरोध के बावजूद उठाए गए इस कदम को लेकर विचित्र मौन से हम सभी रूबरू रहे हैं।

लोकसभा में पारित हो चुके इस विधेयक को अब राज्यसभा के अगले सत्र में पेश किया जाएगा। जनतांत्रिक अधिकार संगठनों और सरोकार रखने वाले अन्य लोगों द्वारा चलाई गई देशव्यापी मुहिम के बाद पिछले साल संसद ने विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम पारित किया था, जो अभी तक प्रभावी नहीं हुआ है। इसके पहले ही उसे हल्का करने वाले प्रावधानों पर लोकसभा ने अपनी मुहर लगा दी है।

विचित्र है कि ऐसे समय विसलब्लोअर कानून को कमजोर किया जा रहा है, जब भ्रष्टाचार उजागर करने वाले खुद को खतरे में पा रहे हैं। चाहे मध्यप्रदेश का व्यापमं महा घोटाला हो या आस्था के नाम पर कायम अपने ‘साम्राज्य’ में विवादास्पद संत द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे यौन अत्याचारों के प्रसंग हों- कई वर्चस्वशाली लोगों के सलाखों के पीछे जाने की गुंजाइश बन रही है। ऐसे समय विसलब्लोअर कानून को कमजोर करने का क्या औचित्य है?

पिछले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने काले धन और भ्रष्टाचार को एक अहम मुद््दा बनाया था। इसका उसे फायदा भी मिला, खासकर इसलिए कि यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में एक के बाद एक उजागर हुए कई बड़े घोटालों के कारण लोगों के भीतर तीखी प्रतिक्रिया पहले से सुलग रही थी। आंदोलन को मिले व्यापक जन-समर्थन की भी बड़ी वजह यही थी। मगर सत्ता में आने पर भाजपा भ्रष्टाचार को लेकर कितनी चिंतित है, यह लोकपाल का गठन लटके रहने और विसलब्लोअर कानून को कमजोर किए जाने से जाहिर है।

भारत जैसे मुल्क में, भ्रष्टाचार पर अगर वाकई काबू पाना हो तो यह किसी केंद्रीकृत प्रणाली से मुमकिन नहीं है, जब तक ऐसी संस्थाएं और प्रणालियां मजबूत न की जाएं जो अनियमितताएं उजागर करने वालों को सशक्त करती हैं, उन्हें सुरक्षा प्रदान करती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि उनकी शिकायतों पर कार्रवाई होगी। इस मायने में विसलब्लोअर संरक्षण अधिनियम-2014 काफी महत्त्वपूर्ण प्रावधानों के साथ बनाया गया था और उसे जनांदोलनों के दबाव में संसद ने पारित भी किया था।

इंडियन एक्सप्रेस में लिखे अपने साझा लेख (13 अगस्त 2015) में अमृता जौहरी और अंजलि भारद्वाज बताती हैं कि इस कानून के तहत अगर किसी विसलब्लोअर के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई की जाती है तो वह सक्षम प्राधिकार के पास, जिसे यह अधिकार दिया गया था कि वह ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करे, शिकायत दर्ज कर सकता था। स्पष्ट था कि व्यापमं घोटाले का खुलासा करने वाले आनंद राय जैसे डॉक्टर, जिन्हें जान-बूझ कर आदिवासी जिले में स्थानांतरित कर दिया गया है और जिन्हें जान से मारने की धमकियां मिल रही हैं, वे प्राधिकार के पास जाकर शिकायत करते और उन्हें इस कानून के तहत सुरक्षा प्रदान की जाती। और ऐसे लोग भी सक्षम प्राधिकार के पास जा सकते थे, जो जांच में मदद कर रहे हैं, मगर जिन्हें धमकियां मिल रही हैं। लेखिकाद्वय के मुताबिक ये संशोधन लोकपाल विधेयक के पिछले डेढ़ साल से लागू न होने की पृष्ठभूमि में आए हैं। वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकपाल विधेयक को भी हल्का करने के लिए संसद में दस पेज का संशोधन पेश किया है।

वर्तमान कानून में सभी जनसेवकों को- नेताओं, नौकरशाहों को- न केवल अपनी संपत्ति, बल्कि अपनी पत्नी/पति और आश्रित बच्चों की संपत्ति का खुलासा करना अनिवार्य है। जबकि प्रस्तावित संशोधनों के तहत अब अपने जीवनसाथी और संतानों की संपत्ति का खुलासा करने की अनिवार्यता को समाप्त करने की बात है। यह साधारण व्यक्ति भी जानता है कि गलत तरीकों से अर्जित धन को लोग परिवारजनों के नाम प्रदर्शित करते हैं। इस अनुभव के बावजूद लोकपाल कानून में जिस फेरबदल की तैयारी की गई है वह हैरानी का विषय है। लोकपाल कानून को लेकर जिन दिनों देश में जोरदार बहस चल रही थी, भारतीय जनता पार्टी यह दोहराते नहीं थकती थी कि वह मजबूत लोकपाल के पक्ष में है। लेकिन अब वह अपने उस रुख से दूर खड़ी दिखती है।

कहां तो 2014 के विसलब्लोअर कानून को लागू करने के लिए सरकार को नियम बनाने चाहिए थे, और कहां वह इस कानून को कमजोर करने की कवायद में जुटी हुई है। मूल कानून में विसलब्लोअर के लिए अधिक सुरक्षा प्रदान करने वाली कई धाराओं को हटा दिया गया है। 2014 के कानून में स्पष्ट उल्लेख था कि इसके तहत विसलब्लोअर को सरकारी गोपनीयता अधिनियम के तहत मुकदमे का सामना नहीं करना होगा। पर अब इस प्रावधान को हटा दिया गया है।

इतना ही नहीं, ऐसी कोई भी जानकारी जो ‘राज्य की संप्रभुता, एकता, सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों को प्रभावित करती हो’ उसे प्रसारित करने पर भी रोक लगाने की बात कही गई है। विधेयक के तहत एक नए प्राधिकार के गठन का प्रावधान है- जिस पर केंद्र और राज्य सरकारों की सहमति होगी। यह प्राधिकार इस बात को प्रमाणित करेगा कि कोई भी सूचना, जो खुलासे का हिस्सा है या मांगी गई कोई भी जानकारी, संशोधन के तहत संवेदनशील प्रकृति की है या नहीं। इस प्राधिकार द्वारा दिया जाने वाला प्रमाणपत्र बाध्यकारी होगा। निश्चित तौर पर ऐसा कदम किसी खुलासे में रोड़ा बन सकता है।

इन संशोधनों के मद्देनजर- जो विसलब्लोअर्स के हितों के खिलाफ हैं- नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टु इनफार्मेशन ने सांसदों को आवेदन भेजा है कि धारा 125 के तहत इसमें संशोधन किया जाए। इस मुहिम ने एक हद तक उम्मीद जगाई है। सांसदों की एक प्रवर समिति संशोधन विधेयक की एक-एक धारा की समीक्षा करेगी और नागरिकों को अपनी बात रखने का मौका देगी।

ध्यान रहे कि भारत में किसी आपराधिक मामले में गवाहों को धमकाने या उन्हें प्रताड़ित करने के मामले आम होने के बावजूद अब भी यहां ऐसा कोई कानून नहीं है, जो उन्हें ऐसी मुसीबतों से बचा सके। ऐसा नहीं है कि विधि आयोग इस मामले में मौन रहा है। उसने कई बार कोशिशें की हैं और केंद्र सरकार को विसलब्लोअर सुरक्षा की जरूरत के बारे में बताया है, मगर उसका कोई फायदा नहीं हुआ। आयोग की आखिरी रिपोर्ट 2006 में सरकार को भेजी गई थी। जहां तक राजधानी दिल्ली की बात है, दिल्ली हाइकोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य के कानून विभाग ने ‘दिल्ली गवाह सुरक्षा योजना’ नाम से मसविदा जारी किया है, मगर 2013 से वह अधर में ही है।

जहां तक विकसित मुल्कों की बात है, वहां गवाहों की सुरक्षा के लिए सुपरिभाषित कानून बने हैं, जिनमें उनकी पहचान बदलने से लेकर उन्हें सुरक्षा, आश्रय/ सहारा और जीवनयापन के साधन देने तक के प्रावधान हैं। अमेरिका में महज गवाह को ही नहीं, बल्कि उसके करीबी रिश्तेदारों तक को सुरक्षा प्रदान की जाती है। ब्रिटेन में गवाह को धमकाना अदालत की अवमानना समझा जाता है और इस तरह के कृत्य के खिलाफ कार्रवाई के लिए विशिष्ट कानून है।

प्रस्तावित संशोधन अगर कानून का हिस्सा बनेंगे तो भविष्य में न कोई सत्येंद्रनाथ दुबे दिखाई देंगे, जिन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर किया था, और न ही कोई मंजुनाथ नजर आएंगे, जिन्होंने तेल कंपनियों और माफिया की मिलीभगत का खुलासा किया था, जिन्हें भ्रष्टों के हाथों जान गंवानी पड़ी। इससेपहले कि उनकी शिकायत पर अमल हो, उन्हीं के खिलाफ तरह-तरह के प्रावधानों के तहत कार्रवाई शुरू हो सकती है। ऐसे संभावित विसलब्लोअर हो सकता है कि पहले ही सरकारी गोपनीयता कानून के उल्लंघन के नाम पर सलाखों के पीछे डाल दिए जाएं।

(सुभाष गाताडे)

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