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परिवहन और पर्यावरण

राजेंद्र रवि दिल्ली की हवा में फैलते जहर को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण काफी सक्रिय है। न्यायाधिकरण एक जनहित याचिका की त्वरित सुनवाई के दौरान लगातार अंतरिम आदेश दे रहा है जिससे इसकी चिंताओं और जवाबदेही को समझा जा सकता है। न्यायाधिकरण ने पहला आदेश 26 नवंबर 2014 को जारी किया, जिसमें उसने कहा कि […]

Author May 21, 2015 8:19 AM

राजेंद्र रवि

दिल्ली की हवा में फैलते जहर को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण काफी सक्रिय है। न्यायाधिकरण एक जनहित याचिका की त्वरित सुनवाई के दौरान लगातार अंतरिम आदेश दे रहा है जिससे इसकी चिंताओं और जवाबदेही को समझा जा सकता है। न्यायाधिकरण ने पहला आदेश 26 नवंबर 2014 को जारी किया, जिसमें उसने कहा कि पंद्रह साल पुरानी कोई भी मोटरगाड़ी दिल्ली में नहीं चल सकती। इसे जब्त कर लिया जाए। आरटीओ इसका रजिस्ट्रेशन, फिटनेस और नवीनीकरण नहीं कर सकता है। अगर ऐसी मोटरगाड़ी सार्वजनिक स्थान पर पार्क की गई हो तो उसे जब्त कर उसके मालिक के खिलाफ चालान किया जाए। न्यायाधिकरण ने यह भी कहा कि कोई भी मोटर-वाहन सड़क पर खड़ा कर सुचारु रूप से चल रहे यातायात में व्यवधान पैदा नहीं किया जा सकता। व्यावसायिक परिसरों की सड़कों पर सिर्फ एक तरफ वैधानिक रूप से पार्किंग की सुविधा दी जाए। साइकिल को बढ़ावा देने के लिए साइकिल लेन उपलब्ध कराई जाए। मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली परिवहन विभाग ने न्यायाधिकरण को बताया कि मोटर रजिस्ट्रेशन विभाग के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में पंद्रह साल पुराने वाहनों की संख्या अट्ठाईस लाख है।

हरित न्यायाधिकरण ने फिर अपने छह अप्रैल, 2015 के आदेश में कहा है कि दस साल पुरानी डीजल से चलने वाली मोटरगाड़ियों को प्रतिबंधित कर दिया जाए। अब देखना यह है कि सरकार इस पर कितनी तत्परता से अमल करती है और लोगों की सेहत का खयाल रख पाती है।

राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण इस बात को लेकर चिंतित है कि वायु-प्रदूषण की वजह से शहर के स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आ रही है। विभिन्न अध्ययन और शहर के अस्पतालों से मिलने वाले आंकड़े बता रहे हैं कि हवा में घुला जहर शहर को अपने आगोश में लेता जा रहा है। मोटरगाड़ियों से निकलने वाले धुएं में सीसा, आर्सेनिक और निकिल जैसे तत्त्व होते हैं, जो सांस की तकलीफ को बढ़ा देते हैं और दमे से पीड़ित मरीज के दिल और गले को नुकसान पहुंचाते हैं। हवा में बढ़ते नाइट्रोजन-आॅक्साइड से फेफड़ों को नुकसान पहुंचता है। यह संक्रमण प्रतिरोधक-क्षमता को कम कर देता है और इसके कारण उच्च रक्तचाप, मानसिक अवसाद, नेत्ररोग जैसी बीमारियां शहर के जीवन पर कहर बरपा रही हैं। अलग-अलग मौसम में वायु में इसका उतार-चढ़ाव होता रहता है।

मोटर-वाहनों की नित बढ़ती तादाद ने वायु प्रदूषण के अलावा ध्वनि प्रदूषण को भी विकराल बनाया है। बच्चों, वयस्कों और बुजुर्गों में ध्वनि-प्रदूषण के कारण या तो सुनने की क्षमता कम हो गई है या फिर ये लोग स्थायी बहरेपन के शिकार हो रहे हैं। बढ़ते ध्वनि-प्रदूषण का असर समय-पूर्व प्रसव के मामलोंमें इजाफे से भी आंका जा सकता है। पंद्रह से बीस डेसीबल तक आवाज कानों को नुकसान नहीं पहुंचाती। पर मोटर वाहनों से निकली अनुमानित ध्वनि पचहत्तर से नब्बे डेसीबल तक होती है।

ऐसा ही एक ऐतिहासिक फैसला सर्वोच्च न्यायालय ने 1998 में दिया था और कहा था कि शहर के स्वास्थ्य को देखते हुए सार्वजनिक परिवहन के बेड़े में शामिल सभी मोटरगाड़ियों को सीएनजी में तब्दील कर दिया जाए और जो मोटरगाड़ियां उपयुक्त न हों उन्हें सड़कों से हटा दिया जाए। इस निर्देश पर अमल होते ही शहर में अफरा-तफरी मच गई। सीएनजी की अनुपलब्धता और अचानक बड़ी संख्या से बसों, आॅटो और टैक्सियों को सड़क से हटाए जाने के कारण लोगों को आवागमन के दौरान भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। सरकार ने मोटरगाड़ियों को तो सड़कों से हटाया, लेकिन जिस पैमाने पर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करनी चाहिए थी वह नहीं की। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद अगर सरकार सचेत होकर कदम उठाती तो शहरवासियों को आज जहर-घुली हवा से बचाया जा सकता था।

दिल्ली और देश के दूसरे शहरों में जिस किस्म के ढांचागत विकास और परिवहन-सुविधा की जरूरत है उसे उपलब्ध कराने में हमारी सरकारें विफल हुई हैं। सरकारों के एजेंडे में तो सिर्फ सड़कों का चौड़ीकरण, फ्लाइओवरों का निर्माण, सिग्नल-फ्री कॉरिडोरों की संख्या में इजाफा, मल्टीलेवल कार-पार्किंगों का निर्माण ही रहा है, जो कारों की संख्या को बढ़ाने में मदद करता है। यही वजह है कि दिल्ली में वर्ष 2000 से लेकर 2015 तक कारों की वृद्धि का ग्राफ ऊंचा होता गया, साथ ही प्रदूषण का भी।

कार-आधारित ढांचागत विकास ने शहर की हरियाली को लील लिया। पार्क पार्किंग में बदल गए। 2006 में शहरी विकास मंत्रालय ने राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति बनाई, जिसमें इस बात का उल्लेख किया गया कि सार्वजनिक परिवहन प्राथमिक होगा और निजी कारों को हतोत्साहित किया जाएगा। इससे बस-आधारित सार्वजनिक परिवहन का ताना-बाना बनाने की अपेक्षा थी और इसके अगले कदम के रूप में बसों को सड़क-जाम से बाहर निकाल कर एक सुरक्षित लेन देने की बात थी। इसी से बीआरटी की अवधारणा का प्रादुर्भाव हुआ।

यह योजना कुछ कदम ही आगे बढ़ पाई थी कि राजनीतिक इच्छाशक्ति का शिकार होती रही और इसकी भ्रूणहत्या हो गई। इस अवधारणा का प्रयोग दिल्ली, पुणे, इंदौर, अमदाबाद, राजकोट, जयपुर जैसे कई शहरों में हुआ और हर शहर की यही कहानी है। सार्वजनिक परिवहन आज के दौर में वैश्विक जरूरत है। जो सरकार इसे प्राथमिकता नहीं देती, वह पूरे समाज को संकट में धकेल देती है।

दिल्ली में तैंतीस हजार किलोमीटर लंबी सड़कों का नेटवर्क है और यह पूरी तरह कारों और मोटर-वाहनों को समर्पित है। इन सड़कों पर चलने वाली बसों की संख्या महज छह हजार है। जबकि सरकार खुद स्वीकार करती है कि कुल ग्यारह हजार बसों की जरूरत है। बसें जाम में फंसी रहती हैं। इसके बावजूद इन बसों से प्रतिदिन सफर करने वालों की संख्या पचास से पचपन लाख है। अगर इन बसों को सुरक्षित बस-लेन दी जाए, तब इनके यात्रियों को अपने गंतव्य तक सुरक्षित और समय पर पहुंचने में मदद मिलेगी। अगर जरूरत के अनुसार बसें बढ़ा दी जाएं, तब बसों में अधिक भीड़, असुरक्षा, छेड़छाड़, यात्रा के दौरान अपराध के ग्राफ में कमी हो सकती है और यात्रियों की संख्या में आश्चर्यजनक बढ़ोतरी भी।

सिर्फ बसें किसी शहर की परिवहन व्यवस्था का समाधान नहीं कर सकतीं। इसके लिए यात्रा के आरंभ और अंतिम पड़ाव की जो दूरी है और उनके लिए परिवहन के जो साधन हैं, उसके अनुकूल ढांचागत सुविधा मुहैया कराया जाना अगला कदम होगा। इसमें प्राथमिक तौर पर पैदलयात्रियों (जिनमें हर वर्ग और उम्र के लोग शामिल हैं) के लिए पैदल पथ और सुरक्षित जेब्रा क्रॉसिंग जरूरी हैं, तभी सार्वजनिक परिवहन का ताना-बाना ठीक से चल पाएगा।

दिल्ली में साइकिल-स्वामियों का आंकड़ा भी चौंकाने वाला है। राष्ट्रीय जनगणना 2001 और 2011 के आधार पर दिल्ली में साइकिल स्वामियों की संख्या क्रमश: 36.60 और 30.50 प्रतिशत है। यह संख्या शहर में किसी भी प्रकार के वाहन के मालिकों की तुलना में सबसे ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1960 और 1970 के बीच दिल्ली में चलने वाले प्रत्येक दस वाहनों में सात वाहन साइकिलें हुआ करती थीं। इसके बावजूद इनके आने-जाने के लिए सुरक्षित रास्ते नहीं हैं। इसकी वजह से साइकिल चलाना जोखिम-भरा काम है।

शहर में साइकिल रिक्शों की अच्छी-खासी तादाद है। यह वाहन न सिर्फ प्रदूषण-रहित है, बल्कि रोजगारपरक भी है। इसे शहरी परिवहन के ढांचे में अनुकूल स्थान देकर न सिर्फ शहर की समस्याओं के समाधान में इससे मदद ली जा सकती है, बल्कि इसके बारे में ‘गरीबी और पिछड़ेपन के प्रतीक’ की अवधारणा को भी बदला जा सकता है। ये सब परिवहन के ऐसे उपाय हैं जिनमें लागत आनुपातिक तौर पर कम है और हमारी पहुंच के अंदर भी है और जरूरत पड़ने पर परिवर्तनीय भी। चूंकि मेट्रो भी शहर में है, इसलिए आवश्यक होगा कि शहरी परिवहन के तमाम ताने-बाने एक-दूसरे से जुड़े हों और एक-दूसरे के पूरक हों।

यातायात संचालन की समस्या किसी भी समाज में सिर्फ कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है जिसे पुलिस के हवाले कर दिया जाए। यातायात संचालन के लिए एक विभाग अवश्यंभावी होगा, भले ही वह पुलिस विभाग से जुड़ा हो। पूरी दुनिया में यातायात के विभिन्न दृष्टिकोणों से किए गए अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर ट्रैफिक लाइटिंग की समयावधि आदि का निर्धारण किया गया है। हमारे देश का नेतृत्व चीन का मॉडल अपनाना चाहता है। उसके परिणाम से दुनिया वाकिफ है। चीन ने शहरी विकास की जो राह पकड़ी उसकी वजह से उसने अपने नागरिकों की जान को जोखिम में डाल दिया। इसके कारण 2013 में चीन के कई शहरों में लोग सूरज के दर्शन को तरस गए। न सूर्योदय हुआ, न सूर्यास्त। बच्चों-किशोरों ने गले की जलन और सांस फूलने की शिकायत की, जिससे स्कूल बंद कर दिए गए। सरकारी अस्पतालों में भीड़ उमड़ पड़ी। इसकी वजह थी हवा में जहरीले तत्त्वों का अत्यधिक मात्रा में घुल जाना। दुनिया चीन को साइकिलों के देश के रूप में जानती थी; नए दौर के नेतृत्व ने उसे कारों के देश के रूप में पहचान दी। अब संकट सामने था।

चीन की सरकार ने इस पर काबू पाने के लिए कारों के पंजीकरण की सीमा बांध दी। लॉटरी या बोली लगाने के माध्यम से कारों की संख्या को हतोत्साहित किया गया। आज यह प्रक्रिया चीन के तमाम शहरों में अपनाई जा रही है। भारत चीन से अभी दूर है, लेकिन उतना भी दूर नहीं- यह विभिन्न अध्ययनों के निष्कर्षों और अदालत के निर्देश से जाहिर है।

एक ओर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण कारों पर लगाम लगाने की हिदायत दे रहा है, दूसरी ओर दिल्ली में ‘आप’ की सरकार ने बिना हिसाब-किताब और मूल्यांकन किए सिर्फ छह किलोमीटर लंबे बीआरटी कॉरिडोर को तोड़ने के लिए सैद्धांतिक मंजूरी का एलान किया है। यह वही पार्टी है जिसे आम लोगों ने अपार बहुमत और प्यार से जिताया है। अदालत के आदेश, राष्ट्रीय शहरी परिवहन नीति और संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार ऐसा कदम लोकतांत्रिक तो कतई नहीं हो सकता। दिल्ली सरकार के इस कदम के खिलाफ नौजवानों के एक समूह ने ‘बस को रास्ता दो’ के बैनर तले अभियान छेड़ दिया है। ज्ञातव्य हो कि ब्राजील और दुनिया के कई देशों में ‘फ्री पब्लिक ट्रांसपोर्ट’ के नाम से अभियान चल रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छह अप्रैल को वायु-गुणवत्ता सूचकांक की शुरुआत की। इसकी वजह से भारत दुनिया के उन पांच देशों की सूची में आ गया है, जो ऐसा सूचकांक जारी करते हैं। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि हम हर रविवार को साइकिल क्यों न चलाएं। कई मुल्कों के राष्ट्रीय नेतृृत्व ने लोगों को प्रेरित करने के लिए सादगी और सरल जीवन-शैली अख्तियार की है, लोगों से कहने से पहले खुद पहल की है। प्रधानमंत्री के साइकिल चलाने के आह्वान की खबरों के साथ ही दुनिया के कई मुल्कों के राष्ट्राध्यक्षों को रोज-रोज साइकिल चलाते हुए तस्वीरें भी दिखाई गई हैं जिनमें हॉलैंड के प्रधानमंत्री, डेनमार्क के प्रिंस, लंदन के मेयर और भूटान के राष्ट्राध्यक्ष भी शामिल हैं।

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