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राजनीति: विकास के दावे और उठते सवाल

यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि सरकारी खजाने से विकास के नाम का निकला पैसा आखिरी छोर पर नहीं पहुंचने के पीछे की वजहें क्या हैं? विकास की अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के रहते तमाम तरह की गरीबी की मौजूदगी अपने आप में बड़ा सवाल है। ऐसे सवाल लोकतंत्र को लांछित करते हैं। अगर सही मायनों में देश में विकास की धारा बही होती तो जंगलों में रहने वाले अल्प-शिक्षित या ग्यारह फीसद से भी कहीं कम साक्षरता की तथाकथित उपलब्धियां देखने को नहीं मिलती।

UNDP, PovertyUNDP की ताजा रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े। (फोटो- ADB)

अमरेंद्र किशोर

अक्सर यह बात बहस मुबाहिसों में शुमार होती है कि देश के समृद्ध इलाकों के लोग निर्धन हैं। यानी जिन इलाकों में कुदरत के कुबेर की मेहरबानी है, वहां के लोग इतने बदहाल होते हैं कि आजादी हासिल किए जाने का मतलब समझ में नहीं आता। जैसे सात दशकों के बाद भी किसी तरह के बदलाव या सुधार का रास्ता हम तय नहीं कर सके हैं। यह सच भी है कि यदि सब कुछ ठीक रहता तो फिर देश में निर्धनतम जिलों की सूची व्यवस्था और सरकार को चुनौती देती क्यों दिखती!

इलाकों की समृद्धि से अलग हट कर संसाधनों की उपयोगिता और समाज की आजीविका के काम आने वाले संसाधनों की उपलब्धता व वितरण को लेकर देश के कोने-कोने से कई तरह के सवाल उभर रहे हैं। सवाल अनाज और पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन की हकदारी और उससे आगे जीवन जीने के सवालों को लेकर भी है। तभी तो झारखंड के पाकुड़ जिले के एक पहाड़िया बहुल गांव की सोमारी ने आज से दो साल पहले पूछा था कि उसकी गलती कहां है?

उल्लेखनीय है कि साल 2019 में प्राथमिक इलाज के अभाव में सोमारी की बीस दिन की नवजात बेटी को बचाया नहीं जा सका था। व्यवस्था से सीधा सवाल नहीं पूछ सकने की विवशता लेकर जीने वाले ओड़िशा के जाजपुर जिले के नागदा गांव के जुआंग आदिवासियों ने भी सरकार से जानना चाहा था कि आखिर उनका कसूर क्या है, क्योंकि साल 2016 में भूख-कुपोषण के कारण इन आदिवासियों के बीस बच्चों की मौत ने उन्हें सदमे में डाल दिया था। इसी राज्य के सुंदरगढ़ जिले के बोनाई अनुमंडल के किरी, केटा, कुंडला और कुनु जैसे दर्जन भर गांवों के आदिवासियों ने भी अपना गुनाह इस मुल्क की व्यवस्था से पूछा था, जहां भात के बिना उपजे भुखमरी के हालात में दरवाजे-दरवाजे मौत के हरकारे दस्तक देने लगे थे।

विकास से मुक्त बदहाल समाज को लेकर कही गई ये बातें साधारण नहीं हैं। पिछले चार दशकों का भारत का राजनीतिक इतिहास खंगालें तो देखने को मिलेगा कि बदहाल राज्यों में राजनीतिक नेतृत्व के तमाम प्रयोग और प्रयास पूरे किए जा चुके हैं। लगभग सारे राजनीतिक दलों को सूबों से लेकर केंद्र तक आजमाया जा चुका है, बल्कि जहां सत्ता में बदलाव का जोखिम उठाया गया, जहां राजनीति के तमाम प्रयोग किए गए, जहां लोकतंत्र के अनेकानेक अनुष्ठानों का यज्ञ भी किया गया, वहां खासतौर से निर्धनता और वंचना के आंतरिक यथार्थ का रंग ज्यादा गहराया।

इस प्रकार, गांवों को लेकर कागजी आंकड़े कितने भी दुरुस्त क्यों न किए गए हों, लेकिन विकास के तमाम नुस्खे असाध्य गरीबी के सामने निष्फल साबित हुए हैं। आरोपों की राजनीति के दो पाटों के बीच बहती सामाजिक न्याय और समरसता की धार में कल्याण, विकास, आत्मनिर्भरता जैसे शब्दों को निखारे जाने का जम कर प्रचार जरूर किया गया है, मगर गरीबी का दायरा सिमटने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे में सवाल है कि आजादी का असली मकसद और मतलब क्या है?

स्थानीय संसाधनों की महत्तम उपयोगिता से मजबूत आत्मनिर्भरता और टिकाऊ विकास के दावे देखने को मिलते रहे हैं। लेकिन विडंबनाओं की फेहरिस्त भी छोटी नहीं है। सात दशक से भी ज्यादा पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं के बीच जीर्ण-शीर्ण साक्षरता दर को लेकर उस वक्त उदासी छा जाती है जब मध्यप्रदेश के अलीराजपुर में महिला साक्षरता दर का आंकड़ा 30.29 फीसद और बीजापुर में 50.46 फीसद होने का सच खुल कर सामने आता है।

इसी तरह दक्षिण ओड़िशा के मलकानगिरी में दिमागी मलेरिया से देश में सबसे ज्यादा मौतें होतीं हैं। आंकड़ों के इस समीकरण में ये तमाम जिले उन्हीं वजहों से बेहद पिछड़े हैं जिन वजहों से देश के आदिवासी मुख्यधारा से बहुत दूर नजर आते हैं। अन्यथा, 2011 की जनगणना में ऐसे तिरानवे जिले (पाकुड़ को छोड़ कर) जहां आदिवासियों की आबादी पचास फीसदी से ज्यादा है, निर्धनतम जिलों की सूची में क्यों आते?

सवाल यह है कि पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी कितना विकास हुआ। उदाहरण के तौर पर, ओड़िशा में संयुक्त राष्ट्र की चार विकास एजेंसियों- यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम, यूनाइटेड नेशन वर्ल्ड फूड प्रोग्राम, यूनाइटेड नेशन चिल्ड्रन फंड (यूनिसेफ) और यूनाइटेड नेशन पापुलेशन फंड के अलावा विश्व बैंक की भी मौजूदगी है। लेकिन वहां की जिंदगी में विडंबनाओं के अंबार और विरोधाभास देखने को मिलते हैं। ओड़िशा में सुखद नैसर्गिक सुंदरता है, किंतु जिंदगी सुखद नहीं है। लोगों के पक्के मकान हैं, घर में अनाज है, बैंक में खाते हैं, खातों में पैसे हैं, लेकिन इसके बावजूद उनके पास चावल वाला खैराती कार्ड भी है। भयानक बर्बादी के बाद भी वहां कुदरती संसाधन हैं। जल-जंगल और जमीन है। लेकिन वहां वंचना है, शोषण है और पलायन है।

गांवों में पंचायत है, वहां राजनीतिक दलों के एजेंट हैं, जनवादी विकास के पोस्टर हैं, पर साथ ही उन्ही गांवों में राशन कार्ड गिरवी रख कर कर्ज जुटाते किसान हैं। बाहर जाकर अपना श्रम बेचने वाले मजदूर हैं। महिलाएं नवजात शिशु बेचने को मजबूर होती हैं। सवाल है कि फिर गलती कहां हो रही है? अकेला ओड़िशा ही क्यों, यवतमाल, मुर्शिदाबाद और बेलगाम को कोई भला कैसे भूल सकता है? देश भर में सबसे ज्यादा अनब्याही माताएं यवतमाल जिले में हैं।

मुर्शिदाबाद देह तस्करी में बहुत आगे है और बेलगाम में आज भी देवदासी प्रथा मौजूद है। इस तरह के कुत्सित व्यापार, कलंक प्रथाएं और नारी शोषण की बेलौस उपस्थिति के कारणों को खोजें तो प्रश्न उठता है कि क्या देश में गरीबी और गुलामी पर विजय हासिल करने की कोई मुहिम पूरी हुई है? बाल दासता, बंधुआ मुक्ति, पतिता उद्धार से लेकर पहाड़ों और कुदरती संसाधनों को बचाने की कोई जिद्द सार्थक हुई है?

इस बात के लिए कौन उत्तरदायी है कि उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की राजपुरा तहसील में मात्र 11.10 फीसद महिलाएं साक्षर हैं तो राजस्थान के उदयपुर जिले के कोटरा तहसील में यह आंकड़ा 11.11 फीसद का है। एक बड़ा सच यह भी है कि उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा बाल मजदूर राजस्थान में हैं। विकास के विरोधाभास के ढांचे में बलिया जिला की तस्वीर कितनी डरावनी है जहां सालाना शिशु मृत्यु दर बावन फीसद है।

विकास के सारी दावेदारियों के बावजूद हकीकत यह है कि ग्रामीण इलाकों के बयालीस फीसद घरों को डेढ़ से दो किलोमीटर पैदल चल कर पीने का पानी जुटाना पड़ता है। इस दूरी को सरकारें पाट नहीं सकी हैं। बारिश के दिनों में बाढ़ से बिहार में गांव डूबते हैं तो साथ में कागजों पर पहले तालाबों खोद कर बाद में उन्हें भरने का टेंडर भी निकाले जाने का इतिहास है। झारखंड के पलामू में कागज पर इतने कुएं खोदे गए हैं कि यदि उन्हें वास्तविक धरातल पर लाया जाए तो हर कदम पर कुआं दिखेगा। तभी तो प्यासों की सूची में पलामू काफी आगे दिखता है।

ऐसे में यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि सरकारी खजाने से विकास के नाम का निकला पैसा आखिरी छोर पर नहीं पहुंचने के पीछे की वजहें क्या हैं? विकास की अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के रहते तमाम तरह की गरीबी की मौजूदगी अपने आप में बड़ा सवाल है। ऐसे सवाल लोकतंत्र को लांछित करते हैं। अगर सही मायनों में देश में विकास की धारा बही होती तो जंगलों में रहने वाले अल्प-शिक्षित या ग्यारह फीसद से भी कहीं कम साक्षरता की तथाकथित उपलब्धियां देखने को नहीं मिलती। आदिवासी जब अंग्रेजी में लिखे ‘विकास विरोधी’ और ‘सरकार विरोधी’ पोस्टर लेकर जंगलों से और अपनी बस्तियों से निकलते हैं तो यह सवाल जरूर पूछना होगा कि विकास के नाम पर हमने अब तक किया क्या है?

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