ताज़ा खबर
 

जेल सुधार की दीवारें

सबसे अहम सवाल यह है कि जब देश भर में मानवाधिकारों पर बहस छिड़ी हुई है तब कैदियों के अधिकार के लिए सरकारें गंभीर क्यों नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारें सिर्फ इसलिए खामोश रहती हैं कि कैदियों का मुद्दा किसी दल के वोट बैंक में इजाफा नहीं करता? या फिर यह मान लिया जाए कि हमारी सरकारें महंगे होते इंसाफ और जेल में कैदियों की बढ़ती भीड़ से होने वाले आर्थिक नुकसान से अनजान हैं।

Author January 3, 2019 3:47 AM
चित्र का इस्‍तेमाल केवल प्रस्‍तुतिकरण के लिए किया गया है।

रिजवान अंसारी

पिछले दिनों दो अच्छी बातें देखने को मिलीं और ये दोनों ही सर्वोच्च न्यायालय की कोशिशों का नतीजा हैं। पहली तो यह कि अधीनस्थ न्यायालयों में खाली पदों को भरने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को अपने हाथ में लेने की चेतावनी राज्य सरकारों को दी और दूसरी यह कि देश भर में जेल सुधारों के सभी पहलुओं को देखने और उन पर सुझाव देने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। दरअसल, देश की 1382 जेलों में कैदियों की अमानवीय स्थिति के बारे में 2013 की एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह समिति बनाई। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि कैदियों को जानवरों की तरह जेल में नहीं रखा जा सकता है। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च अदालत ने कैदियों की स्थिति पर चिंता जताई है। मई और अक्तूबर, 2016 में भी सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कई निर्देश देकर जेलों में बढ़ती भीड़ के मुद्दे पर सुझाव मांगे थे। लेकिन कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश तय समय-सीमा के भीतर रिपोर्ट नहीं सौंप सका। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कैदियों की सुरक्षा और उनके मानवाधिकारों के लिए हमारी सरकारें कितना संजीदा हैं।

सबसे अहम सवाल यह है कि जब देश भर में मानवाधिकारों पर बहस छिड़ी हुई है, तब कैदियों के अधिकारों के लिए सरकारें गंभीर क्यों नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारें सिर्फ इसलिए खामोश रहती हैं कि कैदियों का मुद्दा किसी दल के वोट बैंक में इजाफा नहीं करता? या फिर यह मान लिया जाए कि हमारी सरकारें महंगे होते इंसाफ और जेल में कैदियों की बढ़ती भीड़ से होने वाले आर्थिक नुकसान से अनजान हैं। जाहिर है, कैदियों की सुरक्षा और कानूनी तंत्र के बीच की यह लड़ाई चिंता का विषय बनती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2015 में भी क्षमता से चौदह फीसद से ज्यादा कैदी जेलों में बंद थे और कुछ मामलों में तो यह तादाद इससे भी कहीं ज्यादा थी। 2015 के इन आंकड़ों के मुकाबले 2018 तक कैदियों की संख्या में लगातार इजाफा हुआ है, जबकि जेलों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हुआ। ऐसे में इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन जेलों में बंद कैदियों की हालत कितनी बदहाल होगी। एक आंकड़े के मुताबिक जेलों की बदहाल स्थिति के कारण 2015 में 1584 कैदियों की मौत हो गई थी। यदि महिला कैदियों की बात करें तो इस एक साल के दौरान इक्यावन महिला कैदियों की मृत्यु हुई।

जेलों में क्षमता से अधिक कैदी होने की सबसे बड़ी वजह न्यायालयों में लंबित पड़े लाखों मुकदमे हैं। विचाराधीन मामलों के लिहाज से भारत दुनिया का दसवां देश है, जहां 31 मार्च, 2016 तक देश के विभिन्न न्यायालयों में तीन करोड़ से अधिक मामले लंबित थे। एनसीआरबी के मुताबिक देश में प्रत्येक तीन कैदियों में से दो विचाराधीन कैदी हैं। साल 2015 में सड़सठ फीसद मामले विचाराधीन थे और ऐसे मामलों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। सवाल है कि इतने मामलों के विचाराधीन होने के पीछे क्या वजहें हैं? दरअसल, इसकी दो वजहें हैं। पहली यह कि भारत की न्याय व्यवस्था जजों और त्वरित अदालतों की कमी से जूझ रही है। देश की विभिन्न अदालतों में अड़तीस फीसद जजों की कमी है। एक आंकड़े के मुताबिक देश के उच्च न्यायालयों में लगभग चार सौ जज कम हैं, जबकि निचली अदालतों में लगभग छह हजार जजों की कमी है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस बाबत चिंता जताना और भर्ती प्रक्रिया को अपने हाथों में लेने की बात इसी का दूसरा पहलू है।

दूसरी बड़ी वजह है इंसाफ का महंगा होना। यह हैरत की बात है कि किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए सालों तक जेलों में रहना पड़ता है कि वह जमानत कराने में सक्षम नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक जेलों में बंद सत्तर फीसद लोग ऐसे होते हैं जिनके खिलाफ कोई दोष साबित नहीं हो पाता। इनमें से ज्यादातर दलित, मुसलिम और जनजातीय आबादी है जो आर्थिक रूप से कमजोर होती है। ज्यादातर कैदी गरीबी की वजह से सही समय पर जमानत नहीं करा पाते और उन्हें मजबूरन जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा जेलों में गुजारना पड़ता है। भारत में जेलों की दयनीय स्थिति की सबसे बड़ी वजह जेल कर्मचारियों की भारी कमी है। नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी (नालसा) के मुताबिक देश भर की जेलों में कर्मचारियों की अनुमोदित क्षमता 77230 है। लेकिन इनमें से तकरीबन 24588 यानी तीस फीसद से भी अधिक पद खाली हैं। जहां दो सौ पच्चीस कैदियों पर केवल एक मेडिकल स्टाफ है, वहीं सात सौ दो कैदियों पर केवल एक कैदी-सुधारक है। हालांकि सभी राज्य सरकारों को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि वे कैदियों, खासतौर पर पहली बार अपराध करने वालों की काउंसलिंग के लिए परामर्शदाताओं और मदद देने वालों की नियुक्ति करें। इसी तरह, कैदियों के लिए चिकित्सा सहायता की उपलब्धता का अध्ययन करने का भी निर्देश दिया गया था। लेकिन इस दिशा में कोई खास प्रयास नहीं किए गए।

जेलों में कैदियों की हालत खराब होने के लिए जो और बड़े कारण हैं उनमें कैदियों की ज्यादा तादाद के कारण उचित और पर्याप्त भोजन न मिल पाना, रहने और सोने के लिए जगह की भारी कमी और स्वच्छ माहौल का अभाव है। ये ऐसे कारण हैं जो कैदियों की मौत के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे में सवाल है कि जेल सुधार के लिए क्या उपाय हो? व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो, जेल सुधार का मसला एक मानवीय मसला है। जेलों का मकसद अपराधियों को सुधार कर एक बेहतर इंसान बनाना होता है। ऐसे में हमारी सरकारों को चाहिए कि वे जेलों को सुधारने के लिए ठोस कदम उठाएं। इसके लिए सबसे पहले तो सरकार को सीआरपीसी की धारा 436 और 436(ए) को प्रभावी रूप से लागू करने की कोशिश करनी होगी। धारा 436 (ए) में साफ तौर पर लिखा है कि अगर किसी कैदी का मामला विचाराधीन है और उसने कथित अपराध के लिए मिलने वाली अधिकतम सजा का आधा समय जेल में गुजार लिया है तो उसे निजी मुचलके पर रिहा कर देना चाहिए। लेकिन अफसोस की बात है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों के लिहाज का दावा करने वाली हमारी सरकारें इस बिंदु पर अक्सर मौन रह जाती हैं।

सच तो यह है कि आजादी के बाद जेल सुधार के लिए कई समितियां बनीं, मसलन-1983 में मुल्ला समिति, 1986 में कपूर समिति और 1987 में अय्यर समिति। पर इन सारी समितियों के सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यही वजह है कि जेलों की हालत बिगड़ती ही चली गई। कैदियों के सुधार के लिए ऐसा बोर्ड बनाया जाना चाहिए जिसमें समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल हों, ताकि उनके जरिए मॉडल जेल मैन्युअल को लागू कराया जाए। साथ ही जेलों में कैदियों के कौशल विकास की व्यवस्था की जाए ताकि बाहर निकलने के बाद उन्हें आजीविका संबंधी समस्या का सामना न करना पड़े।
समझना होगा कि एक जीवित व्यक्ति, वह चाहे जेल में हो या जेल से बाहर, उसे पूरी तरह सम्मान से जीने का अधिकार है। यह सच है कि जेल खुद में एक अलग दुनिया होती है। लेकिन अगर वह इतनी अलग हो कि अमानवीय यातना की जगह में तब्दील हो जाए तो, उसे फौरन बदलने की जरूरत है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App