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योजनाबद्ध विकास की विदाई

अरविंद मोहन संसद के बीते सत्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने एक नहीं, अनेक अवसरों पर यह शिकायत की कि उनके मंत्रालय के तहत चल रहे लगभग सभी कार्यक्रमों के बजट आबंटन में बड़ी कटौती हो गई है और वे गरीब बच्चों और लरकोरी औरतों के लिए चल रही योजनाओं में […]

Author June 16, 2015 3:55 PM

अरविंद मोहन

संसद के बीते सत्र में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने एक नहीं, अनेक अवसरों पर यह शिकायत की कि उनके मंत्रालय के तहत चल रहे लगभग सभी कार्यक्रमों के बजट आबंटन में बड़ी कटौती हो गई है और वे गरीब बच्चों और लरकोरी औरतों के लिए चल रही योजनाओं में पहले जितना भी धन खर्च नहीं कर पा रही हैं। यह शिकायत कई और मंत्रियों की थी, क्योंकि शिक्षा समेत कई मदों का खर्च कम हुआ है और सामाजिक सुरक्षा की आठ योजनाओं पर तो काफी कम बजट दिया गया है, पर वे खुल कर मेनका गांधी की तरह बोलने से बच रहे थे।
चौदहवें वित्त आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद से यह स्थिति आई है जिसमें राज्यों का हिस्सा बढ़ाने का सुझाव दिया गया था। प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ने जिस अंदाज में रिपोर्ट पर हां की और तत्काल बजट में उसका प्रभाव भी दिखा उससे एक ही बात सबके जेहन में रह गई कि आयोग ने केंद्रीय धन में राज्यों का हिस्सा एक बार में दस फीसद यानी बत्तीस फीसद से बढ़ा कर बयालीस फीसद कर दिया है। इसे रुपए के हिसाब में देखें तो राज्यों को 1860 अरब रुपए ज्यादा मिलेंगे।

अब सरकार द्वारा रिपोर्ट को मान लेने के पीछे कोई षड्यंत्र नहीं देखना चाहिए, पर ऐसे लोग कम नहीं हैं जिनका मानना है कि अगर सुझाव बाजार अर्थव्यवस्था के अनुकूल न होते तो इस तेजी से उन्हें मानना मुश्किल था। और यह भी कहा जा रहा है कि यह वित्त आयोग देश के वित्तीय संसाधनों के बंटवारे में जिस हद तक आगे बढ़ कर राज्यों पर जिम्मा डालने वाला रहा है वैसा अभी तक के किसी आयोग ने नहीं किया था। मगर रिपोर्ट पर इतनी खामोशी भी पहले कभी नहीं थी। राज्य सिर्फ ज्यादा धन मिलने-न मिलने का हिसाब लगा रहे हैं; उन्हें अपने ऊपर आई जिम्मेवारी का अहसास भी नहीं है। रिपोर्ट को बजट से तीन दिन पहले माना गया और बजट में उसके अनुकूल प्रावधान कर दिए गए। तो सबसे पहला काम यह हुआ कि केंद्र की सहायता से चलने वाली कई योजनाओं से केंद्र ने हाथ खींचना शुरू किया और उनका बजट लगभग एक तिहाई कम हो गया। मेनका गांधी ने तो संसद के अंदर भी यह बात कह दी और पिछले साल जितनी रकम मांग कर सरकार को खासी परेशानी में डाल दिया।

असल में आयोग ने सिर्फ धन के पुनर्वितरण का काम न करके कामों के बंटवारे में भी फेरबदल किया है। और कायदे से अब इस कटौती की भरपाई और एकीकृत बाल विकास वाली सभी योजनाओं, लरकोरी महिलाओं की योजनाओं और स्कूलों में दोपहर का भोजन जैसे कार्यक्रमों में राज्यों को वित्तीय भागीदारी भी करनी होगी। पर मुश्किल यह है कि गैर-योजना खर्च के धन का तो नया फार्मूला आ गया है, पर योजना आयोग के बंद होने और नीति आयोग का काम स्पष्ट न होने से योजना-खर्च का पुनर्वितरण कैसे होगा, यह स्पष्ट नहीं है। ऐसे में अगर ज्यादा समय अस्पष्टता बनी रही तो गैर-योजना खर्च की लूट तो शुरू हो जाएगी, लेकिन लंबे समय में लाभ देने वाला योजनाकृत निवेश थम जाएगा। इससे वित्त आयोग और सरकार दोनों की मंशा पर पानी फिरे-न फिरे, राज्यों की खासकर कमजोर राज्यों की स्थिति पर बहुत असर पड़ेगा।

वित्त आयोग का प्रावधान संविधान में देश के आर्थिक विकास में आने वाली क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर अर्थात केंद्र-राज्य के बीच या विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की असमानताओं को दूर करने के लिए किया गया था और इसने यह काम बखूबी किया भी है। पर अस्सी के दशक के बाद राज्यों की राजनीतिक ताकत और केंद्र में गठबंधन की राजनीति के जिस उभार को सरकारिया आयोग ने 1988 की अपनी रिपोर्ट से काफी हद तक दुरुस्त शक्ल दे दी है, वैसा वित्तीय मामले में नहीं हुआ था।

पहले की तरह केंद्र अब अपनी मनमानी करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की गलती नहीं करता या नहीं कर सकता। पर जब राष्ट्रीय राजनीति राज्यों की राजनीति का योग भर रह गई हो और केंद्र में बीस-बीस दलों के गठबंधन का शासन होना आम हो जाए, तब राज्यों के धुरंधर केंद्र के आगे कटोरा लेकर खड़े हों या गठबंधन का दोहन करते हुए अपने-अपने राज्य का खजाना भरें तब किसी न किसी राज्य के साथ अन्याय भी होगा। हमने कभी द्रविड़ पार्टियों को ज्यादा लाभ उठाते देखा है तो कभी ममता बनर्जी को केंद्र से मदद के लिए लड़ते-गिड़गिड़ाते। सो अगर नया वित्त आयोग सहकारी संघवाद का नारा बुलंद करता है तो उसका स्वागत होना चाहिए।

पर यह नहीं भूलना चाहिए कि राजनीति में राज्यों की सत्ता उभरने का भी वही दौर है, जो आर्थिक नीतियों में भूमंडलीकरण का है और आयोग के अध्यक्ष वाइवी रेड्डी इसी बीच में लंबे समय तक रिजर्व बैंक के गवर्नर रह कर इन्हीं आर्थिक नीतियों को अंजाम तक पहुंचाने का काम भी करते रहे हैं।

असल में अभी तक योजना आयोग योजनाकृत खर्च के चालीस फीसद हिस्से को मंजूरी और दिशा दिया करता था। वह क्या होगा, अभी स्पष्ट नहीं है। वह राज्यों की आबादी, क्षेत्रफल, प्रतिव्यक्ति आय, वित्तीय अनुशासन जैसे अनेक कारकों को ध्यान में रख कर अपने फैसले करता था। संयोग से जो गरीब राज्य हैं वे इससे कुछ लाभ पा जाते थे। वित्त आयोग की चिंता सिर्फ क्षेत्रफल की होती रही है। इस बार अगर आबादी को हिसाब बनाया गया है तो ऋणात्मक ढंग से ही, जिसके चलते केंद्रीय राजस्व में राज्यों का हिस्सा दस फीसद बढ़ने पर भी बिहार, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु वगैरह को अभी की स्थिति से भी कम मिलेगा अर्थात इन सभी को नुकसान होगा।
पूरब और पश्चिम के बीच जिस बढ़ती असमानता पर वित्त आयोग को ध्यान देना चाहिए था वह मुद्दा कहीं पीछे छूट गया है। और भी गड़बड़ यह है कि अब राज्य ज्यादा स्वायत्त हुए हैं तो बाजार के भरोसे हो गए हैं। केंद्र पहले ही लघु बचत जैसी चीजों और उनकी देनदारियों को राज्यों के हवाले कर चुका है।

अभी जो हालत है उसमें पश्चिम बंगाल, केरल और पंजाब जैसे राज्य पहले से ही उधार में डूबे हुए हैं, उत्तर प्रदेश के बजट का सबसे बड़ा हिस्सा कर्ज और सूद की अदायगी पर जा रहा है। और अब मुश्किल यह होगी कि गरीब और पिछड़े राज्यों को बाजार से कर्ज भी नहीं मिलेगा। अभी तक यही देखने में आ रहा है कि जिन राज्यों में बिजली, सड़क जैसा संरचनात्मक विकास है उन्हें ही आसानी से कर्ज मिल पाता है। और राज्यों में लोकलुभावन कामों पर ज्यादा खर्च करने और दीर्घकालिक लाभ देने वाली संरचनात्मक योजनाओं पर कम खर्च करने की प्रवृत्ति रही है। इस पर इस बार राज्यों पर केंद्र के ऋण की सीमा अड़सठ फीसद बांध दी गई है। उन्हें अपना राजकोषीय घाटा तीन फीसद से ऊपर न जाने देने का सुझाव भी दिया गया है। कुल मिला कर केंद्र की आठ योजनाओं को डिलिंक किया गया है और बाकी के शेयरिंग पैटर्न में भी बदलाव हुआ है। राज्यों को 2014-15 में जो 3.48 लाख करोड़ मिला था उसकी तुलना में 2015-16 में 5.26 लाख करोड़ मिलेंगे। और 2010-20 तक कुल 39.48 लाख करोड़ मिलेंगे।
आयोग के नए फार्मूले से किस राज्य को कितना लाभ और कितना घाटा होगा यही सर्वाधिक दिलचस्पी का विषय है।

पर आयोग ने अभी आंध्र प्रदेश (जो बंटवारे का दर्द झेल रहा है), हिमाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, पश्चिम बंगाल, जम्मू-कश्मीर, केरल और नगालैंड के लिए विशेष अनुदान दिया है। हम जानते हैं कि बिहार भी बंटा था और वहां से विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग उठती रही है। बिहार में इसी साल चुनाव होना है और उसके बाद बंगाल का नंबर है। सो बजट और अन्य तरीकों से इन प्रदेशों की नाराजगी दूर करने और अपने चुनावी भविष्य को दुरुस्त करने की कोशिशें भी जारी हैं। पर नीतीश कुमार की नाराजगी खत्म नहीं हुई है।
बिहार को मिलने वाली रकम 1.3 फीसद कम होगी, जबकि छोटे उत्तराखंड को लगभग एक तिहाई कम मिलेगा। तेलंगाना को भी नुकसान होगा, पर 777 करोड़ का ही। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल का अनुदान 27,962 करोड़ से बढ़ कर 49,079 करोड़ और आंध्र का अनुदान 15,720 करोड़ से बढ़ कर 30,530 करोड़ हो जाएगा। तमिलनाडु को मिलने वाली रकम 2700 करोड़ रुपए कम हो जाएगी। विभिन्न तरह की कटौतियों के बावजूद राज्यों के खाते में कुल करीब पंद्रह सौ अरब रुपए अधिक पहुंचना होगा।

पर आयोग ने सिर्फ कर-राजस्व के पुनर्वितरण का काम नहीं किया है। जैसा पहले कहा गया है, इसने राज्यों को बाजार पर ज्यादा आश्रित कर दिया है। साथ ही उसने राज्यों को बिजली, पानी, सड़क परिवहन जैसे मामलों में अपने साधन जुटाने और अपनी कमाई बढ़ाने के निर्देश भी दिए हैं। जिन राज्यों में बिजली-मूल्य के लिए नियामक आयोग नहीं है वहां इसका गठन करने और आयोग को बाजार के अनुरूप काम करने की पूरी स्वायत्तता देने का सुझाव दिया गया है।

किसान-कर्ज माफी योजनाएं रोकने का सुझाव भी दिया गया है। जहां भी जलापूर्ति की व्यवस्था है और कीमतें तय करने के लिए नियामक नहीं है वहां इसकी नियुक्ति करने और मुफ्त पानी देना बंद करने का सुझाव भी आयोग ने दिया है। सबसे बड़ा मसला तो सिंचाई के पानी की कीमत तय करने के लिए नियामक आयोग बनाने का सुझाव है। ये सभी काम 2017 तक हो जाने चाहिए। इसी प्रकार परिवहन नियामक आयोग बनाने का सुझाव देने के साथ ही सबसिडी के मर्ज से मुक्त होने का सुझाव दिया गया है। वित्त आयोग ने रेल टैरिफ अथॉरिटी को पूरी आजादी देने की सिफारिश भी की है। यहां आकर यह बात साफ होती है कि आयोग राज्यों की चिंता और क्षेत्रीय पिछड़ेपन की जगह असल में किसकी चिंता कर रहा था।

आयोग के सदस्य अभिजीत सेन कर-राजस्व ‘लुटाने’ से असहमत थे। उनका यह कहना जायज है कि घाटे के अनुदान के आकलन में योजना-खर्च को आधार बनाना उचित नहीं है, राज्यों के बीच ‘विशेष’ और ‘अन्य’ का फर्क अभी नहीं मिटाया जाना चाहिए था; केंद्र के अनुदान के साथ अब शर्तें नहीं होंगी जिससे अनुशासनहीनता आ सकती है, फिर सहकारी संघवाद के अनुरूप निगरानी के लिए सांस्थानिक बदलाव नहीं हुए हैं। असल में राज्यों को ज्यादा राजनीतिक ताकत के साथ ही ज्यादा वित्तीय ताकत देने के खतरे भी हैं। कायदे से शासन को पंचायत, ब्लाक, जिला, राज्य और केंद्र, चार या पांच स्तरों पर बांट देना चाहिए। अगर आयोग ने सीधे पंचायत और नगर निकायों से खेलने के लिए केंद्र के हाथ में ये पैसे पकड़ाए हैं, तब तो गलत बात है, वरना यह नई शुरुआत हो सकती है।

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