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राजनीति का सत और असत

आनंद कुमार प्रकृति ने मानव शरीर की रचना में नौ द्वार बनाए हैं तो ऐसा लगता है कि समाज में लोकतांत्रिक राजनीति में आठ राहें रची हैं। राजनीति के प्रमुख तरीकों को हम चार सकारात्मक और चार नकारात्मक आधारों में बांट कर पहचान सकते हैं। सकारात्मक चार तरीकों में राजनीति से जुड़ने के लिए पहला […]

Author April 10, 2015 11:20 PM

आनंद कुमार

प्रकृति ने मानव शरीर की रचना में नौ द्वार बनाए हैं तो ऐसा लगता है कि समाज में लोकतांत्रिक राजनीति में आठ राहें रची हैं। राजनीति के प्रमुख तरीकों को हम चार सकारात्मक और चार नकारात्मक आधारों में बांट कर पहचान सकते हैं। सकारात्मक चार तरीकों में राजनीति से जुड़ने के लिए पहला आकर्षण व्यक्तियों का होता है, दूसरा विचारों का, तीसरा कार्यक्रमों का और चौथा संगठनों का। इसी तरह से कई बार व्यक्तियों में राजनीति में हस्तक्षेप का कारण व्यक्ति का विरोध या विचारों का विरोध या कार्यक्रमों का विरोध अथवा संगठनों का विरोध पाया जाता है।

इन आठों तरीकों के अपने गुण-दोष हैं। स्थिरता और अस्थिरता की प्रवृत्ति है। इनसेसमाज के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक शुभ और अशुभ परिणाम हुआ करते हैं। लेकिन यह गुणा-भाग तो हर राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए राजनीतिक यात्राओं का लंबा सफर तय करने के बाद ही संभव हो पाता है। दूसरों के बताने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि राजनीति बड़ी आसक्ति के साथ की जाती है। कुछ देने की दीवानगी पैदा करती है। कुछ पाने का आसरा भी हुआ करता है। यह सही है कि बहुत कम लोग इन आठ तरीकों का शुद्ध रूप में इस्तेमाल करते हैं। प्राय: कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक की खिचड़ी बनाते हैं। लेकिन इन आठ भावों में से किसी एक भाव की सर्वोच्चता होती है।

अगर कोई यह दावा करता मिले कि मैं राजनीति में रुचि रखता हूं और योगदान करता हूं तो अगला सवाल मुक्तिबोध की तर्ज पर जरूर होना चाहिए ‘पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है’! क्या आप किसी व्यक्ति को पूजा करने की हद तक अनुकरणीय मानते हैं? प्राय: व्यक्ति के सत्संग से राजनीति में जुड़ना आसान होता है। व्यक्ति का अपना आकर्षण होता है। वह सुख-दुख में काम आता है। वह अपनी उपलब्धियों में आपको साझीदार बनाता है। उसकी चमक बढ़ने पर आपका चेहरा भी चमकने लगता है।

लेकिन व्यक्ति प्राय: समय के साथ बदलते हैं। कभी समाज के लिए पूरी तरह समर्पित दिखते हैं और फिर एकाएक सब कुछ अपने हित-अहित से जोड़ कर मापने-तोलने लगते हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति की प्रेरणा से राजनीति करने वाले के लिए दुविधा की स्थिति पैदा हो जाती है। व्यक्ति को अपना नायक मान कर जब आप आधी नदी पार कर चुके हैं, फिर बीच धार में अगर उसने अपनी नाव की दिशा बदली तब नाव से कूदने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। अगर आप तैरना नहीं जानते तो नैया के खेवैया के मन से ही अपना घाट चुनना पड़ता है। इसलिए व्यक्तिपूजक राजनीति प्राय: हताशा और मोहभंग पैदा करती है या फिर अवसरवादी बनाती है। आप विनायक की पूजा करते-करते वानर के पूजक बन जाते हैं। इसीलिए प्राय: व्यक्तिवादी राजनीति को सबसे खराब किस्म की राजनीति माना जाता है।

इसके दूसरे छोर पर विचारों के आकर्षण से राजनीति करने का दरवाजा है। यह आहिस्ता-आहिस्ता खुलता है। गहरा आत्ममंथन करना पड़ता है। दिल के बजाय दिमाग से काम लेना पड़ता है। लेकिन जब एक बार विचारों की गांठ बांध ली जाती है तब वह प्राय: उम्रभर काम आती है। विचारों की अपनी सुगंध होती है। प्रकाश होता है। ऊर्जा होती है। विचारों के जरिए राजनीति करने वाले बड़े सपने देखते हैं। देश-काल, पात्र के प्रति सजग होते हैं। विवेक-शक्ति से संचालित होते हैं। विचारमार्गी राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए यह बराबर एक चुनौती होती है कि अपने विचारों को मांजते और चमकाते रहें। बासी न पड़ने दें। क्योंकि विचार सदाबहार नहीं होते। उनके भी जन्म, विकास, विस्तार और क्षय का चक्र होता है। फिर भी व्यक्तिमूलक राजनीति की तुलना में विचार आधारित राजनीति दीर्घजीवी होती है।

राजनीति का तीसरा सकारात्मक रूप कार्यक्रमों से जुड़ा होता है। कुछ कार्यक्रम हमें अपनी ओर खींचते हैं। उन कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए अपना तन-मन-धन देने की इच्छा जागती है।

कार्यक्रम की राजनीति माला के धागे की तरह अनेक प्रकार के लोगों को कुछ समय के लिए एक-दूसरे से जोड़ती है। समूह-शक्ति पैदा करती है। सगुण होती है। कार्यक्रमों के पक्ष में सक्रियता के जरिए आप कुछ ठोस करने का अहसास पाते हैं। सार्थकता का संतोष मिलता है। कार्यक्रम सफल हुए तो समाज से सम्मान मिलता है। अगर सफल नहीं भी हुए तो कुछ कर गुजरने की कोशिश के लिए अपने समकालीनों और आने वाली पीढ़ियों की तरफ से प्रशंसा मिलती है। यह अलग बात है कि कार्यक्रमों पर आधारित राजनीति आकाश के इंद्रधनुष की तरह कुछ समय के लिए लोक-लुभावन का जरिया होती है। फिर बासी हो चुके माला के फूलों की तरह ऐसी राजनीति के सहयात्री एक-दूसरे के साथ टिकाऊ रिश्ते बचा कर नहीं रख पाते। फिर भी कार्यक्रम आधारित राजनीति में समझौता और अवसरवाद का दोष न्यूनतम होता है।

राजनीति का चौथा सकारात्मक तरीका संगठन के जरिए सुलभ होता है। अपने सामाजिक सरोकारों को आप किसी संगठन के साथ जुड़ कर साकार करते हैं। संगठन काम का बंटवारा पैदा करता है। संगठन के जरिए काम करने वाले लोग व्यक्तियों के प्रति उदासीन, विचारों के प्रति आग्रहमुक्त और कार्यक्रमों के प्रति सहज भाव रखते हैं। उनकी आस्था और आदर का आधार संगठन होता है। इसके बदले में संगठन ऐसे लोगों को सामूहिकता का भाव देता है। व्यक्तियों, विचारों और कार्यक्रमों की तुलना में संगठनमूलक राजनीति कम जोखिमभरी होती है, क्योंकि संगठनों के बनने में समय लगता है।

अगर बिखरे भी तो कुछ न कुछ साथ होता है। इसमें दोष की बात यही है कि संगठन सामूहिकता के आगे आपके विवेक को मामूली बना देता है। संगठन आपको एक झुंड के हिस्से के रूप में देखता है। संगठन पर अक्सर कुछ लोगों की जकड़बंदी होती है। संगठन में गुटबंदी तो अनिवार्यत: पाई जाती है। संगठन अपने सदस्यों को अपनी संपत्ति की तरह देखता है। अगर संगठन किसी व्यक्ति या गुट की जागीर बन जाए तो आपकी राजनीतिक भूमिका गुलामों जैसी हो जाती है। इसीलिए बहुत सारे सिद्ध संगठनकर्ताओं ने अपनी राजनीति के अंतिम दौर में संगठनमुक्त राजनीति की कल्पना को प्रोत्साहित किया है।

अब हम राजनीति के नकारात्मक तरीकों की ओर आते हैं। व्यक्ति-विरोधी राजनीति सबसे ज्यादा उकसाने वाली होती है। क्रोध, हिंसा, भर्त्सना और निंदा इसके सहज तरीके रहते हैं। यह सबसे ज्यादा उकसाती है। लेकिन सबसे कम ठहरती है। जब व्यक्ति ही अल्पजीवी है तो व्यक्तिवादी राजनीति की क्या उम्र हो सकती है! व्यक्ति दृश्य से हटा और इससे जुड़ी नकारात्मक राजनीति बालू में खिंची लकीर की तरह मिट जाती है। लोकतंत्र में यह सर्वसुलभ तरीका है। यही राजनीति का सबसे खराब रास्ता भी है। इसके विपरीत विचार-विरोधी राजनीति ज्यादा लंबी चलती है। आशंकाओं के आधार पर अनगिनत भूतों से डराती है। आपकी नापसंदगी से जुड़े व्यक्तियों से भी आपकी तकरार कराती है। किताबें जलाना, पत्रिकाओं पर प्रतिबंध लगवाना, लेखकों पर हमले करना, पुस्तकालयों को तहस-नहस करना इस तरह की राजनीति के ढेर तरीके हैं।

यह संवाद के बजाय विवाद और सहानुभूति के बजाय घृणाभाव से आपको सराबोर करती है। लेकिन वैचारिक दुश्मन को देख कर जो उत्तेजना पैदा होती है उसमें हजार हाथियों जैसा बल आ जाता है। एक तरह से विचार-आधारित राजनीति करने वालों और विचार-विरोधी राजनीति करने वालों में एक और दस का अनुपात होता है, क्योंकि विचार का वाहक बनने के लिए अपनी जिंदगी बदलनी पड़ती है। जबकि विचार का विरोध करने में आपको अपने दिल या दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की कहां जरूरत है!

नकारात्मक राजनीति का तीसरा दरवाजा कार्यक्रमों के विरोध से जुड़ा होता है। कोई भी कार्यक्रम किसी विचार या सिद्धांत की तात्कालिक अभिव्यक्ति होता है। इसके साथ समाज के विविध हिस्सों का हित और अहित का नाता है। जिसका अहित होता है, वह उस विचार और सिद्धांत को अनदेखा करते हुए कार्यक्रम की जड़ें काटने के लिए हर उपाय को उचित मानता है।

आशंकाओं और अफवाहों का औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं। कार्यक्रम के विरोध में विभिन्न प्रकार के लोगों का जमावड़ा करते हैं। कार्यक्रमवादियों की तरह ही कार्यक्रम-विरोधियों का भी एक समय-सीमित साझा मोर्चा बनता है। लेकिन कार्यक्रम के सफल या विफल होने के साथ ही ऐसी राजनीति की सीमा बंध जाती है। यह मीठी या खट््टी याद की तरह लोगों की जीवन-कथा में सिमट जाती है।

राजनीति का आखिरी और सबसे नकारात्मक दरवाजा संगठन-विरोध का होता है। भारत समेत दुनिया के हर हिस्से में संगठन-विरोधी राजनीति का लंबा सिलसिला रहा है। अच्छे से अच्छे संगठनों के विरोधियों की भी लंबी जमात देखते-देखते खड़ी हो जाती है। इन संगठनों की दशा परजीवी जैसी होती है। आप जिस संगठन का विरोध करते हैं, उसके अत्यंत बलशाली होने पर विरोध रस्मअदायगी हो जाता है। अगर आपके विरोध के निशाने पर आया संगठन स्वयं में ही क्षीण और क्षणभंगुर है तो उस पर कितनी देर तक राजनीति की खिचड़ी पकेगी?

संगठन-विरोधी राजनीति में संयुक्त मोर्चा बनाना आसान भी होता है। लेकिन यही संगठन-विरोधी संयुक्त मोर्चे कुछ ही समय में गले की हड््डी भी बन जाते हैं। आप अपने निशाने पर लिए संगठन का विरोध करने में इतने व्यग्र हो जाते हैं कि नीर-क्षीर विवेक छोड़ हरेक के लिए दरवाजे खोल देते हैं। न पथ का ध्यान रखते हैं, न पथिक को चुन पाते हैं। उचित-अनुचित का विवेक तो सबसे पहले नष्ट हो जाता है। इसीलिए संगठन-विरोधी राजनीति विफल होने पर वितृष्णा पैदा करती है, सफल होने पर विखंडन पैदा करती है।

सारांशत: राजनीति युगधर्म है। नागरिक धर्म है। राष्ट्रीयता और राष्ट्र-निर्माण की बुनियाद है। समाज को अन्यायों से न्याय की ओर ले जाने का महामार्ग है। व्यक्ति को सामाजिक और सामुदायिक बनाने का अचूक तरीका है। लेकिन हर तरह की राजनीति व्यक्ति और समाज के लिए स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। अगर राजनीति में प्रवाह है, टिकाऊपन है और समाज के शुभ को साधने की क्षमता है तभी राजनीति काम की चीज है, वरना अगर हमने गलत तरीके की राजनीति की, तो चाहे जितनी दवा करें, मर्ज बढ़ता ही जाता है।

पिछली दो शताब्दियों के लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में शुभ और अशुभ की महागाथाएं बनी हैं। राजनीति ने हाड़-मांस के पुतलों को संत-महात्मा का दर्जा दिलवाया है। राजनीति की ही कोख से सीधे-सरल लोग शैतान और संहारक भी बने हैं। राजनीति ने करोड़ों लोगों को पशुवत जीवन से मुक्ति दिलाई है। राजनीति ने ही लाखों निर्दोष स्त्री-पुरुष और बच्चों को अकाल मौत का शिकार बनाया है। इसीलिए लोकतांत्रिक राजनीति की इस मिली-जुली असलियत को जानने वाले इसे माया और मुक्ति, दोनों से जोड़ कर देखते हैं। अगर हमारे मन में स्वार्थों का आवेग है तो राजनीति से ज्यादा मायावी कुछ भी नहीं है। अगर हम अपने युगधर्म के निर्वाह के लिए निस्वार्थ होकर राजनीति का वरण करते हैं तो इससे सुगम मुक्तिमार्ग भी कोई नहीं है।

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