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रेलवे की प्राथमिकताएं क्या हों

रघु ठाकुर कई दशकों से यह चलन रहा है कि हर रेलमंत्री संसाधनों के अभाव का रोना रोता है और बताता है कि रेलवे के आधुनिकीकरण या लंबित योजनाओं को पूरा करने के लिए कितने लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता है। कभी-कभी किराया बढ़ाने के उपाय भी नौकरशाही के द्वारा सुझाए जाते हैं। ममता बनर्जी […]

Author February 18, 2015 1:20 PM

रघु ठाकुर

कई दशकों से यह चलन रहा है कि हर रेलमंत्री संसाधनों के अभाव का रोना रोता है और बताता है कि रेलवे के आधुनिकीकरण या लंबित योजनाओं को पूरा करने के लिए कितने लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता है। कभी-कभी किराया बढ़ाने के उपाय भी नौकरशाही के द्वारा सुझाए जाते हैं। ममता बनर्जी के रेलमंत्री पद से हटने के बाद लगभग सभी रेलमंत्री इस किराया-वृद्धि की दवा का प्रयोग करते रहे हैं। पिछले रेल बजट में जब मोदी सरकार ने एकमुश्त चौदह प्रतिशत किराया बढ़ाया था तब यह तर्क दिया था कि यात्री सुविधा और विकास के लिए रेल किराया बढ़ाया जाना जरूरी है, पर रेल किराया बढ़ने के बाद भी यात्री सुविधाएं या तो जस की तस हैं या और बदतर हो गई हैं।

‘शताब्दी’ जैसी गाड़ियों में, जिनमें विमान सेवा की तर्ज पर सुविधाएं देने का दावा किया जाता रहा, हालत यह है कि संडासों के दरवाजे उखड़े पड़े हैं, कुर्सियां टूटी हैं, कांच टूटे हैं और ढांचा इतना कमजोर हो चुका है कि पूरी यात्रा भर यात्रियों को जोरदार झटकों को सहना पड़ता है। वातानुकूलित शयनयान में यात्रियों को दिए जाने वाले कंबल धुलते नहीं हैं और कई गाड़ियों में इतने जर्जर कंबल दिए जाते हैं कि जेल में मिलने वाले कंबल उनसे बेहतर होते हैं। मैं जानता हूं कि कंबल का धुलना जल्दी संभव नहीं है, पर नए तरीकों से उन्हें साफ और कीटाणु-मुक्त किया जा सकता है। आजकल कई प्रकार के दवायुक्त छिड़काव के उपाय दुनिया में हैं जिनके माध्यम से उनकी सफाई हो सकती है और बहुत पुराने कंबलों को बदला जा सकता है। मगर रेलवे का लक्ष्य यात्री सुविधा के बजाय केवल पैसा कमाना और अफसरशाही की विलासिता पर खर्च करना हो गया है।

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनते ही बुलेट ट्रेन के सपने मध्यमवर्गीय और उच्चवर्गीय लोगों के मन में जगा दिए। इन बुलेट ट्रेनों के ढांचों के निर्माण के लिए जापान और चीन से भारी-भरकम कर्ज और तकनीक लेने की योजनाएं बनाई गर्इं। जहां हालत यह हो कि दिल्ली से बिहार और उत्तर प्रदेश जाने वाली यात्री गाड़ियों में दो-दो माह तक टिकट मिलना संभव न हो, और गाड़ी छूटने के छह घंटे पहले से यात्री लंबी कतार लगाकर मय सामान के प्लेटफार्म पर खड़े होने को लाचार हों, जहां सामान्य डिब्बे में घुसने के लिए पुलिस को सौ रुपए रिश्वत देनी पड़ती हो, जहां लाखों यात्रियों को स्लीपर का पैसा देने के बाद भी केवल डिब्बे में घुसने का पट््टा मिलता हो, वहां पहले कौन-सी गाड़ियां चलनी चाहिए? बुलेट ट्रेन या सामान्य यात्री गाड़ियां?

इस समय पैंतालीस हजार सामान्य यात्री डिब्बों की आवश्यकता है; हर यात्री गाड़ी में अगर पांच से दस सामान्य डिब्बे लगाए जाएं तब जाकर कुछ राहत मिल सकती है। और इसलिए सरकार की प्राथमिकता नई रेल लाइनों का निर्माण, सामान्य यात्री गाड़ियों की वृद्धि होना चाहिए। अगर भारत सरकार जापान से प्रस्तावित साठ हजार करोड़ का कर्ज लेकर अमदाबाद से मुंबई के बीच बुलेट ट्रेन चलाएगी तो इससे केवल उन संपन्न लोगों को विकल्प मिलेगा जिनके पास हवाई जहाज से चलने की सुविधा और क्षमता है जो हजारों रुपया किराए में दे सकते हैं। इस विदेशी कर्ज की कीमत उस गरीब जनता को चुकानी होगी जो बुलेट ट्रेन में बैठने की बात सोच भी नहीं सकती।

रेलवे के विकास के नाम पर भारत सरकार एक तरफ संसाधनों की कमी का रोना रोती है, दूसरी तरफ विदेशी पूंजीपतियों को पूंजीनिवेश के लिए आमंत्रित करती है। ऐसा वातावरण बनाया जाता है जैसे रेल का सारा घाटा आम यात्री गाड़ियों और आम यात्रियों की वजह से है।

रेलवे में सुधार, आधुनिकीकरण आदि के नाम पर जब-तब विशेषज्ञ समितियां बनाई जाती हैं, रेलवे के सेवानिवृत्त नौकरशाहों या फिर प्रशासनिक अधिकारियों की अध्यक्षता में। जबकि यही नौकरशाह रेलवे को घाटे में लाने और डुबाने के जिम्मेदार या सहभागी होते हैं।

रेलवे के आर्थिक संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। लोग अभी भूले नहीं होंगे कि पिछले रेलमंत्री पवन बंसल के कार्यकाल में उनके परिवारजनों पर रिश्वत लेने के आरोप लगे थे। अगर रेलवे की खरीदी और निर्माण-कार्य के भ्रष्टाचार को रोक दिया जाए तो हजारों करोड़ रुपए की बचत हो सकती है।

भारतीय रेलवे के विकास की मूल कल्पना में ही कुछ खामियां हैं। आजकल बड़े-बड़े स्टेशनों पर विद्युत स्वचलित सीढ़ियां (एक्सेलेटर) लगाई जा रही हैं। एक-एक एक्सेलेटर की लागत करोड़ों रुपए में होती है।

दूसरी तरफ देश में हजारों रेलवे क्रासिंगों पर न पुल हैं न फाटक, जिससे आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं। प्लेटफार्म पर पैदल पारपुल नहीं हैं जिसके परिणामस्वरूप यात्रियों को पैदल पटरी पार करनी पड़ती है, जिससे जाने कितने लोग कट कर मर जाते हैं और भीड़ आक्रोशित होकर निर्दोष रेल कर्मचारियों पर हमला बोल देती है। मध्यप्रदेश के गुलाबगंज रेलवे स्टेशन पर इसी प्रकार की घटना के कारण निर्दोष रेल कर्मचारी मारे गए। मगर सरकार की दृष्टि में इन गरीबों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है, उसे तो केवल संपन्न तबके के लिए स्वचालित सीढ़ियां लगाना है।

रेलवे नौकरशाही का व्यवहार अब भी राजतंत्रीय है। आजादी के सड़सठ साल के बाद भी रेलवे के बड़े-बड़े अधिकारियों को लाने-ले जाने के लिए विशेष ट्रेन और कूपे या डिब्बे चलाए जाते हैं। जिस प्रकार राजाओं की सवारियां निकलती थीं उसी प्रकार इन उच्चाधिकारियों की ये विशेष गाड़ियां (सेलून) होती हैं जिनमें वे सपरिवार, सदलबल सफर करते हैं। एक महाप्रबंधक महोदय ने माधुरी दीक्षित की फिल्म की शूटिंग के लिए राजस्थान में एक छोटे-से स्टेशन को फिल्म निर्माता टीम के लगभग हवाले कर दिया और आरपीएफ, जीआरपी को उनकी सुरक्षा और रेलवे कर्मचारियों को उनकी व्यवस्था पर लगा दिया। इसके बदले में हीरोइन ने अपनी वापसी के दिन महाप्रबंधक के परिवार को मुलाकात और फोटो के लिए कुछ समय देकर उन्हें कृतार्थ किया। जयपुर से उक्त स्टेशन पर आने के लिए सरकारी साधनों के खर्च का कोई बहाना चाहिए था, इसलिए वहां एक छोटी-सी पुलिस चौकी का निर्माण किया गया जिसके उद््घाटन के लिए महाप्रबंधक और उनके साथ मंडल प्रबंधक और तमाम अधिकारी पहुंचे।

एक महाप्रबंधक महोदय ने रेलवे परिसर में स्वीमिंग पूल बनाने की योजना मंजूर कर दी और तर्क दिया कि यह कर्मचारियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। जो कर्मचारी तृतीय या चतुर्थ वर्ग के हैं उनके सरकारी घरों की हालत यह है कि बरसात में वे पोखर बन जाते हैं, ठंड में पहाड़ी क्षेत्र और गर्मी में भट्ठी बन जाते हैं। उनके घरों के पास कीचड़ भरा रहता है, जानवर और इंसान साथ-साथ समय गुजारते हैं। मैंने इन दोनों घटनाओं के बारे में तत्कालीन रेलमंत्री और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखा था, पर इन ‘राजा-महाराजाओं’ के खिलाफ कोई शिकायत कैसे सुन सकता है! हमारे सांसदों को भी इन सवालों पर संसद में चर्चा करने की न तो फुरसत है, न दिलचस्पी, क्योंकि अमूमन ये सांसद अपने पद का इस्तेमाल अधिकारियों से निजी लाभ जैसे अपने रिश्तेदारों, परिचितों और जातीय बंधुओं के तबादलों, पदोन्नतियों और ठेकों आदि के लिए करते हैं।

करीब दो महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सफाई दी कि उनकी सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है। यह सफाई पिछली सरकार के रेलमंत्री और रेल राज्यमंत्री ने भी दी थी। पर क्या यह स्पष्टीकरण विश्वसनीय है? खान-पान, सफाई, माल ढुलाई, निजी कोच खरीद आदि रेलवे के सत्रह विभागों में निजीकरण हो चुका है। ये सारे कार्य निजी ठेकेदारों को दे दिए गए हैं। खुद प्रधानमंत्री ने कहा है कि रेलवे में साढ़े तेरह लाख कर्मचारी हैं। अच्छा होता कि वे यह पता करते कि जब चालीस साल पूर्व रेलवे में बाईस लाख कर्मचारी थे तो घट कर साढ़े तेरह लाख कैसे रह गए? यह कैसा रेलवे का विकास है कि कर्मचारी घट रहे हैं? अफसरों की फौज बढ़ रही है और नीचे के कर्मचारियों की संख्या में कटौती हो रही है? कुछ श्रेणियों के कर्मचारियों पर काम का इतना बोझ है कि वे शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ हो रहे हैं; कुछेक ने तो आत्महत्या भी कर ली है।

प्रधानमंत्री का यह कहना कि उनकी सरकार रेलवे का निजीकरण नहीं कर रही है कुछ ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति किसी के हाथ-पैर, नाक-कान काटता चला जाए और कहे कि मैं उसे मार नहीं रहा हूं! ऐसा ही कुछ सरकार रेलवे के साथ कर रही है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि वे तो रेलवे में धन्नासेठों का पैसा लगवा रहे हैं। क्या उन्हें यह नहीं पता कि धन्नासेठ तभी पैसा लगाते हैं जब उन्हें कोई स्पष्ट लाभ हो। जिन धन्नासेठों को पैसा लगाने का न्योता दिया जा रहा है वे किस मद में पैसा लगाएंगे इसका खुलासा प्रधानमंत्री को करना चाहिए। रेलवे प्लेटफार्म के प्रबंधन को जो नीलामी में लेंगे वे रेलवे की भूमि का इस्तेमाल निजी व्यापार के लिए करेंगे और प्लेटफार्म के टिकट की दर भी वे ही तय करेंगे।

पिछले कुछ वर्षों में मैंने कई बार भारत सरकार और योजना आयोग (अब नीति आयोग) को यह सुझाया है कि मनरेगा की राशि को नई रेल लाइन के निर्माण पर खर्च करने का प्रावधान करें। इससे जहां एक तरफ काम मिलेगा और नई रेल लाइन बिछेगी वहीं दूसरी तरफ भ्रष्टाचार भी सिकुड़ेगा। इस राशि को उसी अंचल में रेल लाइन के निर्माण पर खर्च किया जाना चाहिए जहां के लिए वह निर्धारित है ताकि क्षेत्रीय न्याय हो और सभी हिस्सों में रेल का विकास हो। जितनी राशि में अमदाबाद से मुंबई बुलेट ट्रेन की सुरंग तैयार होगी उतनी राशि में देश में बीस हजार किलोमीटर रेल लाइन बिछ सकती है जो बीस करोड़ जनता के लिए उपयोगी होगी। अब तय सरकार को करना है कि वह बीस करोड़ जनता की कीमत पर दो-चार लाख लोगों को अतिशय महंगी सुविधा देना चाहती है या फिर इस नीति को बदलना चाहती है।

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