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राजनीति: जहरीली होती सब्जियां

हालांकि सीवर और गंदे नालों में सब्जियां उगाना पूर्णतया प्रतिबंधित है, फिर भी निगरानी की कमी के कारण ऐसा धड़ल्ले से हो रहा है। कई सब्जियां शहर के किनारे फैक्ट्रियों से निकले रसायनयुक्त पानी के गंदे नालों में उगाई जा रही हैं। साथ ही साथ जो खेतों में ट्यूबवेल के पानी से सिंचित सब्जियां होती हैं, उनको भी तोड़ कर गंदे नालो में ही धोया जाता है।

Author December 7, 2018 6:09 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

नरपत दान चारण

हरी सब्जियों का सेवन स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। पोषकता से भरपूर होने के कारण ये हमारे आहार का अनिवार्य हिस्सा हैं। इसीलिए ‘गो ग्रीन’ इस वक्त सबसे ज्यादा प्रचलन में भी है। लेकिन आजकल मंडी से लेकर सड़क किनारे तक जो हरी भरी, चमकती-दमकती सब्जियां बड़े चाव से हम खरीदते और खाते हैं, उनमें ज्यादातर सब्जियां मिलावट के कारण स्वादहीन और गुणहीन तो होती ही हैं, साथ जहरीली भी होती हैं। हम में से हर कोई जाने-अनजाने हर दिन बाजार से कीटनाशकों के छिड़काव वाली सब्जियां और फल खरीद रहे हैं। प्राकृतिक रूप से पकी सब्जियां थोड़ी पीली और कुम्हलाई हुई हो सकती हैं, लेकिन जो एकदम हरी और साफ सब्जियां दिखाई देती हैं, जिन्हें देखते ही खरीदने की इच्छा होने लगती है, वही सेहत के लिए खराब होती हैं। लेकिन मजबूरी यह भी है कि उसको खरीदने के अलावा कोई और विकल्प भी दिखाई नहीं देता।

आजकल कम समय में ज्यादा उपज और कमाई के लालच में मुनाफाखोर और मिलावटखोर सब्जियों की कुदरती उपज को कीटनाशक व अन्य घातक रसायनों व दवाइयों के प्रयोग से जहरीला बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। विभिन्न प्रकार के कीटनाशक, धातुओं और रसायनों का उपयोग इस स्वस्थ आहार को ‘धीमा जहर’ बना रहे हैं। पत्तेदार सब्जियों के पत्ते कीटनाशक और धातुओं को अवशोषित कर लेते हैं जो खाने के साथ पेट में चले जाते हैं। सामान्यतया धोने से कीटनाशक निकल जाते हैं, लेकिन ज्यादा मात्रा में प्रयोग होने से ये स्थायी हो जाते हैं। जागरूकता के अभाव में और प्रशासनिक लापरवाही, दोनों ही कारणों से किसान सब्जियों को कीट पतंगों से बचाने, खरपतवार मिटाने और अधिक से अधिक पैदावार के लालच में प्रतिबंधित कीटनाशकों, दवाइयों और अन्य कई रसायनों का भारी तादाद में प्रयोग करते हैं। इनमें डायल्ड्रिन, डीडीआइ, डाइआॅक्सीन, आर्सेनिक, आॅक्सीटोसिन आदि प्रमुख हैं। ये सभी तत्व मानव स्वास्थ्य के लिहाज से बेहद खतरनाक होते हैं।

हालांकि सीवर और गंदे नालों में सब्जियां उगाना पूर्णतया प्रतिबंधित है, फिर भी निगरानी की कमी के कारण ऐसा धड़ल्ले से हो रहा है। कई सब्जियां शहर के किनारे फैक्ट्रियों से निकले रसायनयुक्त पानी के गंदे नालों में उगाई जा रही हैं। साथ ही साथ जो खेतों में ट्यूबवेल के पानी से सिंचित सब्जियां होती हैं, उनको भी तोड़ कर गंदे नालो में ही धोया जाता है। देश के ज्यादातर शहरों में ऐसा ही हो रहा है। राजधानी दिल्ली और इससे सटे नोएडा, गाजियाबाद तक में जहरीली सब्जियां धड़ल्ले से बिक रही हैं। इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब देश की राजधानी में ऐसा हो रहा है तो शहरों में इन पर रोक लगाने वाला कौन है? दिल्ली में तो यमुना के आसपास की मिट्टी भी खेती के लिहाज से खराब हो चुकी है। कारखानों से निकलने वाले रासायनिक पानी को सोखने से जमीन ही जहरीली हो गई है। इन सब के अलावा सब्जियों को ताजा रखने और गहरा हरा रंग दिखाने के लिए उन्हें हरे रंग में डुबोया जाता है जो रसायनों से बना होता है। भिंडी, गोभी, टमाटर, मटर, लौकी, खीरा आदि को ताजा रखने के लिए रसायनयुक्त पानी में भिगो कर रखा जाता है। जब सब्जियां कृत्रिम रूप से चमकदार हो जाती हैं तो महंगी भी बिकती हैं।

कद्दू या लौकी जैसी सब्जियों को सामान्य रूप से पकने के लिए ढाई से तीन महीने का समय चाहिए होता है और एक बीघा खेती में करीबन सत्तर से अस्सी क्विंटल पैदावार प्राप्त होती है। लेकिन किसान रसायनों और दवाइयों के प्रयोग से इतने ही समय में तीन से चार गुना पैदावार ले रहे हैं। कई सब्जियां तो बेमौसम भी बाजार में उपलब्ध रहती हैं। यह सब कृत्रिम रूप से पैदा की गई होती हैं। कुछ रसायन तो इतने असरदार होते हैं कि रात में इनका प्रयोग करने के उपरांत सुबह होते ही सब्जियों में अप्रत्याशित वृद्धि हो जाती है। लौकी के उत्पादन में अमूमन इसका प्रयोग अधिक देखने में मिलता है। बैंगन, करेला, ककड़ी, गोभी आदि में मिलावट के कारण आकार बड़ा हो जाता है। इसके लिए सर्वाधिक उपयोग ओक्सीटोसिन इंजैक्शन का होता है। यह आसानी से बेहद सस्ते दाम पर मिल जाता है।

सब्जियों और फलों को जल्द पकाने के लिए इस्तेमाल उपयोगी कैल्शियम कारबाइड भी बाजार में उपलब्ध है। मिलावट के पीछे आमदनी के लालच के आलावा जो प्रमुख कारण है वह खेती योग्य भूमि की कमी और बढ़ती जनसंख्या की मांग की पूर्ति करना है। ऐसी सब्जियों के सेवन से मुंह के घातक रोग, पेट संबंधी बीमारियां, डायरिया, फेफड़ों और आंतों में संक्रमण, एलर्जी, तंत्रिका तंत्र संबंधी रोग और कैंसर जैसी बीमारियां तक हो जाती हैं। घातक रसायनों में क्रोमियम तत्व की मौजूदगी से चर्म, श्वास, प्रतिरोधी क्षमता का नष्ट होना, आंखों की बीमारियां, लीवर संबंधी रोग और उच्च रक्तचाप जैसे खतरे तेजी से बढ़ जाते हैं।

दरअसल, सब्जियों की गुणवत्ता पर किसी तरह का सीधी सरकारी निगरानी और नियंत्रण नहीं होने से मिलावटखोरों के हौसले बुलंद हैं। बाजार में प्रतिबंधित कीटनाशकों की बिक्री बदस्तूर जारी है। विडंबना यह भी है कि जानकारी के अभाव में किसानों को खुद को कीटनाशकों के मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव का पता नहीं है। लोगों के स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी तो सरकार की ही बनती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि आम आदमी की थाली में हरा जहर न पहुंचे। हालांकि यह भी सच है कि कीटनाशकों की बिक्री पर पूर्ण रूप से पाबंदी लगाना मुमकिन नहीं है, लेकिन इतना जरूर है कि इनके सही इस्तेमाल की मात्रा को सीमित किया का सकता है। भारत में यूरोपीय देशों की तुलना में कई गुना ज्यादा कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। इसलिए सरकार और प्रशासन के साथ ही आम लोगों और किसानों को भी जागरूक रहने की आवश्यकता है। कहने को तो देश में खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकार है, पर फल-सब्जियों में कीटनाशकों के अवशेष की कितनी इजाजत है, इसका सीमा निर्धारण अभी तक नहीं हो पाया है। जबकि यह देश की जनता के सीधा सेहत से जुड़ा गंभीर मामला है।अगर इस पर समय रहते नियंत्रण नहीं पाया गया तो हम दवाइयों और अस्पताल पर ही निर्भर हो जाएंगे।

हालांकि हमारे यहां इसके लिए कानून भी है। प्रिवेंशन आॅफ फूड एडल्ट्रेशन एक्ट 1955 की धारा 44ए के अनुसार फल एवं सब्जियों को पकाने के लिए कारबाइड या आॅक्सीटोसिन का प्रयोग वर्जित है। इसी तरह धारा 48 ई के अंतर्गत फल-सब्जियों को खनिज तेल, मोम या रंगों की सहायता से चमकाना भी प्रतिबंधित है। राज्य सरकारों को यह अधिकार है कि ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करें, लेकिन सरकारी उदासीनता और निगरानी की पुख्ता व्यवस्था नहीं हो पाने से कानून का पूर्णतया पालन नहीं हो पाता है। समय रहते फल और सब्जियों के नमूनों की जांच की पुख्ता व्यवस्था होनी चाहिए।

दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, मुंबई, कोलकाता सहित तमाम बड़े शहरों में दूरस्थ क्षेत्रों से सब्जियां आती हैं। वहां भंडारण की व्यवस्था नहीं के बराबर है, इसलिए सब्जियों को ताजा रखने के लिए रसायनों का प्रयोग किया जाता है। मिलावटी सब्जी को मंडी में बिकने पर प्रतिबंध लगना चाहिए। साथ ही जैविक कृषि के लिए किसानों को जागरूक करने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाने की भी जरूरत है। इसके लिए व्यापक स्तर पर योजना बनाकर अधिकारियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने की जरूरत है। इसके लिए हमें चीन सहित उन दूसरे देशों से सीखना चाहिए, जहां खाद्य सामग्री में मिलावट पाए जाने पर मिलावटखोर को फांसी की सजा तक देने का प्रावधान है।

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