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चुनौतियों के बीच दिव्यांगों का संघर्ष

दिव्यांगों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और उपेक्षा के कारण सामाजिक चुनौतियां जटिल हो जाती हैं। ऐसे में दिव्यांगों का सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना आवश्यक है। इसलिए उन्हें सामान्य शिक्षा के स्थान पर विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है।

Author February 4, 2019 3:20 AM
प्रतीकात्मक फोटो

देवाशीष उपाध्याय

देश की आबादी का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा शारीरिक या मानसिक नि:शक्तता और सामाजिक रवैये के कारण समाज की मुख्यधारा के साथ कदमताल करने में खुद को कमतर महसूस करता है। किसी प्राकृतिक या आनुवंशिक कारण, असंतुलन, असाध्य बीमारी, दुर्घटनावश शारीरिक-मानसिक रूप से असामान्य व्यक्ति को दिव्यांग कहा जाता है। ऐसे लोगों को जीवन निर्वहन में कदम-कदम पर कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जबकि ये लोग सामान्य लोगों की तरह बहुमूल्य मानवीय संपदा हैं। यह तथ्य है कि अस्सी प्रतिशत दिव्यांग गरीब परिवार से संबंधित होते हैं, जिसके कारण उनके लिए मूलभूत आवश्यकताओं, यानी रोटी, कपड़ा और मकान की पूर्ति कर पाना भी चुनौतीपूर्ण होता है। सामाजिक रवैये के कारण उन्हें कई बार उपेक्षा, उपहास और तिरस्कार का सामना करना पड़ता है, जिससे वे हीन भावना से ग्रस्त हो जाते हैं। सामाजिक रूढ़ियों, प्रथाओं, मान्यताओं और समाज में जागरूकता के अभाव के कारण दिव्यागों के प्रति अन्याय होता रहा है, जिसके कारण ये लोग दोयम दर्जे की जिंदगी व्यतीत करने को मजबूर हैं।

यों भी संविधान द्वारा सभी नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के विधि के समक्ष समानता और समान अवसर की गांरटी दी गई है। लोककल्याणकारी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सरकार समाज के निशक्त, वंचित और उपेक्षित वर्ग के लिए जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन करती है। उनके विकास और सामाजिक सुरक्षा के लिए केंद्र सरकार ने 1995 में ‘विकलांग व्यक्ति (समान अवसर, अधिकार, सुरक्षा तथा पूर्ण भागीदारी) अधिनियम’ बनाया। इसके तहत दिव्यागों के सम्मानपूर्वक जीवन निर्वहन, शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और अधिकार आधारित समाज निर्माण की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।

बढ़ती जनसंख्या, घटते प्राकृतिक संसाधनों के कारण मनुष्य के बीच संसाधनों की प्राप्ति के लिए कठिन प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है। सामाजिक असमानता, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, भौतिक संसाधनों और चिकित्सीय सुविधाओं के अभाव के कारण दिव्यांगों को पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं, जिसके कारण वे समाज की मुख्यधारा में सम्मिलित होने की बजाय और पिछड़ते जा रहे हैं। इन्हें शिक्षा, रोजगार और चिकित्सा के लिए चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। एक अनुमान के मुताबिक मूलभूत आवश्यकताओं यानी रोटी, कपड़ा और मकान की पूर्ति के अभाव के कारण लगभग पैंतीस फीसदी दिव्यांग बीस वर्ष की आयु भी पूर्ण नहीं कर पाते हैं। जबकि लगभग चालीस प्रतिशत दिव्यांगों को आधुनिक चिकित्सीय सुविधा और वैज्ञानिक तकनीकी का उपयोग कर विकास की मुख्यधारा में शामिल किया जा सकता है।

दिव्यांगों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में चार प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त दिव्यांगता के सात के बजाय इक्कीस वर्ग तय किए गए हैं। दृष्टिहीनता, कम नजर आना, सुनने में असमर्थता, मंदबुद्धिता और शरीर के किसी अंग के काम न करने या न होने के अतिरिक्त मस्कुलर डिस्ट्राफी, क्रोनिक न्यूरोलॉजिकल सेरेब्रल पॉल्सी, हीमोफीलिया, मल्टिपल स्कलेरोसिस, ऑटिज्म, एसिड अटैक, पार्किन्सन रोग और थैलेसीमिया को भी दिव्यांगता की श्रेणी में रखा गया है। आरक्षण और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ उन दिव्यांग व्यक्तियों को मिलता है, जिनके सामान्य कामकाज इन रोगों या अक्षमता के कारण चालीस प्रतिशत तक प्रभावित होता है। अगर कोई व्यक्ति किसी दिव्यांग के साथ भेदभाव, तिरस्कार या उपेक्षा करे तो कानूनन उसे छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा और दस हजार रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है। सार्वजनिक स्थलों और भवनों में दिव्यांगों के आसानी से प्रवेश के लिए रैम्प और सार्वजनिक परिवहन में भी सहायक उपकरणों और संसाधनों का प्रबंध करना आवश्यक है।

दिव्यांगों के कौशल, रचनात्मक पोषण जीवन में सुगमता के लिए सरकार शिक्षा और रोजगार का विशेष प्रावधान किया है। शारीरिक अक्षमता के प्रभावों को कम करने के लिए उच्च तकनीकी आधारित सहायक उपकरण और चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार प्रयासरत है। दिव्यांग बच्चों के लिए 6-18 वर्ष की आयु तक मुफ्त शिक्षा के अधिकार की व्यवस्था की गई है। समुचित टीकाकरण, फीजियोथेरेपी, आॅडियोलॉजी, स्पीच थिरैपी, क्लिनिकल मनोविज्ञान, व्यावसायिक चिकित्सा, विशेष शिक्षा, शल्य क्रिया से सुधार और उपचार, दृष्टि मूल्यांकन, दृष्टि संवर्धन और आनुंवशिक विज्ञान में किए गए अद्यतन शोधों का उपयोग कर जन्मजात विकलांगता और मानसिक अपंगता के प्रभाव को कम किया जा सकता है। इसी प्रकार आकस्मिक दुर्घटना में घायलों का समय से वैज्ञानिक तकनीकी द्वारा उपचार कर संभावित विकलांगता के प्रभाव को कम किया जा सकता है।

सहायक यंत्र और उपकरण दिव्यांगता के प्रभाव को कम कर शारीरिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पुनर्वास में सहायक होते हैं। दिव्यांगों को प्रति वर्ष राष्ट्रीय संस्थान, राज्य सरकारें, जिला विकलांगता पुनर्वास केंद्र और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रोस्थेसिस और आॅर्थोसिस, ट्राईसाइकिल, व्हील चेयर, सर्जिकल फुट वियर और दैनिक जीवन के कार्यकलापों के लिए सहायक यंत्र, सीखने वाले उपकरण (ब्रेल राइटिंग उपकरण, डिक्टाफोन, सीडी प्लेयर, टेप रिकार्डर) कम दृष्टि के सहायक यंत्रों सहित कई यंत्र मुहैया कराए जाते हैं।

लेकिन इन सबके बावजूद दिव्यांगों के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और उपेक्षा के कारण सामाजिक चुनौतियां जटिल हो जाती हैं। ऐसे में दिव्यांगों का सामाजिक रूप से आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना आवश्यक है। इसलिए उन्हें सामान्य शिक्षा के स्थान पर विशिष्ट शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है। संविधान के भाग-तीन में मूल अधिकार के अनुच्छेद 21 (क) में शिक्षा को मूल अधिकार घोषित किया गया है। नि:शक्त व्यक्ति अधिनियम 1995 की धारा 26 के अंतर्गत 18 वर्ष की आयु तक के समस्त दिव्यांगो को निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गई है। मगर विडंबना है कि आज भी लगभग 60-70 प्रतिशत दिव्यांग निरक्षर हैं। सरकार दिव्यांगों की शिक्षा के लिए सामान्य विद्यालयों में विशिष्ट शिक्षा के साथ ही विशिष्ट विद्यालयों की स्थापना कर रही है और उन्हें समावेशी शिक्षा प्रणाली द्वारा सामान्य शिक्षा पद्धति की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है।

दिव्यांगों को सामाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा के लिए आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। सरकार द्वारा दिव्यांगों की सरकारी सेवाओं में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए विशेष सुविधाएं और अवसर दिए जा रहे हैं। दिव्यांगों के आर्थिक पुनर्वास, स्वरोजगार और निजी क्षेत्र में भी रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए कौशल विकास प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं। दिव्यांग व्यक्तियों वाले उद्यमों के उत्पाद और सेवाओं को प्राथमिकता देने के लिए कर रियायत का प्रावधान किया गया है। दिव्यांगों द्वारा गठित स्वयं सहायता समूहों को विशेष प्रोत्साहन के साथ-साथ वित्तीय सहायता उदारतापूर्वक दिया जाता है।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम- 2016 की धारा 100 के अंतर्गत हरेक संस्थान दिव्यांगजनों के लिए समान अवसर नीति का प्रकाशन करेगा। दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव करना कानूनन अपराध है, जिसकी शिकायत मुख्य आयुक्त या राज्य आयुक्त के समक्ष की जा सकती है। दिव्यांगजन को अनुसंधान का विषय नहीं समझा जा सकता है। ऐसे बच्चों को विद्यालयों में प्रवेश, शिक्षा संबंधित सभी मामलों और अधिनियम की धारा 16 और 31 के संबंध में आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए जिला शिक्षा कार्यालय में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाना आवश्यक है।

समाज के महत्त्वपूर्ण अंग और अन्य प्रकार से बेहद सक्षम होने के बावजूद दिव्यांग लोग उपेक्षाओं के शिकार होते रहे हैं। इसके बावजूद कई ऐसी शख्सियतों ने कठोर चुनौतियों का सामना करते हुए, दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास के दम पर विभिन्न क्षेत्रों में बुलंदियों को छुआ है और साबित कर दिया है कि दिव्यांगता किसी को मंजिल हासिल करने से नहीं रोक सकती है। समाज भी अब उनके संघर्षमय प्रयास, महत्त्वपूर्ण योगदान और सामाजिक महत्त्व को स्वीकारने लगा है। आधुनिक वैज्ञानिक शोधों और अनुसंधानों, उन्नत तकनीकी और चिकित्सा पद्धति की सहायता से दिव्यांगता के प्रभावों को कम किया जा रहा है। दिव्यांगों की सामाजिक समानता और सम्मान के लिए सामाजिक की सोच में सकारात्मक परिवर्तन आवश्यक है, ताकि उन्हें उपेक्षा की बजाय समाज में सम्मानजनक स्थिति प्राप्त हो सके।

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