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राजनीति: लपटों में घिरते आयुध भंडार

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने 2012 की आयुध कारखानों से संबधित अपनी रिपोर्ट में पुलगांव स्थित आयुध भंडार सहित कई अन्य आयुध भंडारों में व्याप्त खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था। कैग ने अपनी रिपोर्ट में पुलगांव स्थिति आयुध भंडार में आग से बचाव के उपायों की उपेक्षा, अग्निशमन यंत्रों और दमकलकर्मियों की कमी और इसी कमान के अन्य आयुध भंडारों में आवश्यकता से अधिक दमकलकर्मियों की उपलब्धता पर सवाल उठाया था।

Author December 6, 2018 3:39 PM
बीते 20 नवंबर को महाराष्ट्र के पुलगांव स्थित आयुध भंडार के पास कबाड़ को नष्ट को करते समय हुए जबर्दस्त धमाका हो गया था। (फोटो – एएनआई)

अभिजीत मोहन

कुछ दिन पहले महाराष्ट्र के पुलगांव स्थित आयुध भंडार के पास कबाड़ को नष्ट को करते समय हुए जबर्दस्त विस्फोट में छह लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग झुलस गए थे। यह एशिया के सबसे बड़े आयुध भंडारों में से है। यह हादसा इस बात को रेखांकित करता है कि आयुध फैक्टरी के पुराने पड़ चुके विस्फोटकों को नष्ट करने के लिए उचित सुरक्षा मानकों का पालन और आयुध भंडारों का रखरखाव समुचित ढंग से नहीं हो रहा है। यह संयोग रहा कि विस्फोट की जद में आयुध भंडार नहीं आया, वरना यह आयुध भंडार एक बार फिर भीषण हादसे का शिकार हो सकता था। ध्यान रखना होगा कि मई, 2016 में भी इसी आयुध भंडार में आग लगी थी जिसमें दो सैन्य अधिकारियों सहित तेरह लोगों की मौत हो गई थी। इससे पहले 1989, 1995 और 2005 में भी यह आयुध भंडार आग की लपटों में घिर चुका है। समझना कठिन है कि बार-बार हो रहे हादसे के बाद भी आयुध भंडारों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम क्यों नहीं हो रहा है। गौर करें तो पुलगांव स्थित केंद्रीय आयुध भंडार भारतीय सेना का सबसे बड़ा आयुध भंडार है। यह लगभग दस हजार एकड़ में फैला है। इसमें किस्म-किस्म के हथियार रखे गए हैं। लेकिन बार-बार आग की घटनाओं से साफ है कि आयुध भंडारों का रखरखाव समुचित ढंग से नहीं हो रहा है।

ध्यान दें तो वर्ष 2000 से 2018 के बीच आधा दर्जन से अधिक आयुध भंडार आग की लपटों की भेंट चढ़ चुके हैं और हजारों करोड़ रुपए की सैन्य संपत्ति नष्ट हुई है। वर्ष 2000 में राजस्थान के भरतपुर में सेना के आयुध डिपो में आग से करीब चार अरब रुपए का गोला-बारूद नष्ट हो गया था। इसी तरह दिसंबर, 2015 में विशाखापत्तनम स्थित नौसेना हथियार डिपो में आग लग गई थी और अरबों रुपए का गोला-बारूद नष्ट हो गए। 1988 में जबलपुर के हथियार निर्माण कारखाने में आग लग गई थी। 2007 में जम्मू-कश्मीर स्थित अनंतनाग डिपो में भयंकर आग लगी जिसमें एक नागरिक समेत तीन सैन्यकर्मियों की मौत हो गई थी। 2010 में पारागढ़ और कोलकाता स्थित आयुध भंडार भी भीषण अग्निकांड का शिकार हुआ जिसमें सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्ति नष्ट हुई थी।

यह स्थिति तब है जब केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय द्वारा आयुध भंडारों की सुरक्षा का पुख्ता दावा किया जाता रहा है। ध्यान रखना होगा कि आयुध फैक्टरी बोर्ड द्वारा रख-रखाव में नाकामी को लेकर सेना द्वारा बार-बार चिंता जताई जा चुकी है। इसके अलावा यहां उल्लेखनीय तथ्य यह भी है कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने 2012 की आयुध कारखानों से संबधित अपनी रिपोर्ट में पुलगांव स्थित आयुध भंडार सहित कई अन्य आयुध भंडारों में व्याप्त खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया था। कैग ने अपनी रिपोर्ट में पुलगांव स्थिति आयुध भंडार में आग से बचाव के उपायों की उपेक्षा, अग्निशमन यंत्रों और दमकलकर्मियों की कमी और इसी कमान के अन्य आयुध भंडारों में आवश्यकता से अधिक दमकलकर्मियों की उपलब्धता पर सवाल उठाया था। लेकिन बार-बार हो रहे हादसों से साफ है कि कैग द्वारा उजागर खामियों को दूर करने का समुचित प्रयास नहीं हुआ।

जहां तक पुलगांव के आयुध भंडार की सुरक्षा का सवाल है तो यह केंद्रीय आयुध भंडार है, जिसमें सिर्फ सामान्य गोला-बारूद ही नहीं, बल्कि विशेष किस्म के महत्त्वपूर्ण हथियार व मिसाइलें जिनमें ब्रह्मोस भी शामिल है, भी रखी जाती हैं। लिहाजा इसकी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। गौर करें तो भारतीय आयुध फैक्टरियां भारत की एक औद्योगिक संरचना है जो रक्षा मंत्रालय के रक्षा उत्पादन विभाग के अंतर्गत कार्य करती हैं। इसका मुख्यालय कोलकाता में है। यह उनतालीस फैक्टरियों, नौ प्रशिक्षण संस्थान, तीन क्षेत्रीय विपणन केंद्रों और चार क्षेत्रीय संरक्षा नियंत्रणालयों का समूह है। यह जल, थल और वायु प्रणालियों के व्यापक उत्पादों का उत्पादन, परीक्षण, अनुसंधान, विकास एवं उसका विक्रय करती है।

भारतीय आयुध निर्माणियों के चुनिंदा ग्राहक भारतीय सशस्त्र सेनाएं हैं। सशस्त्र सेनाओं को आयुध की आपूर्ति के अतिरिक्त आयुध फैक्टरियां अन्य दूसरे उपभोक्ताओं के मांगों का भी पूरा करती हैं, जैसे गोला, बारूद, वस्त्र, बुलेटपू्रफ वाहन और सुरंग प्रतिरोधी वाहन इत्यादि। निर्यात में वृद्धि एवं इसके कार्य विस्तार में फैलाव आयुध निर्माणियों का प्रमुख उद्देश्य होता है। भारत में उनतालीस आयुध फैक्टरियां देश के विभिन्न चौबीस भौगोलिक स्थानों पर स्थित हैं, जिनमें महाराष्ट्र में दस, उत्तर प्रदेश में आठ, मध्यप्रदेश में छह, तमिलनाडु में छह, पश्चिम बंगाल में चार, उत्तरांचल में दो, आंध्रपदेश में एक, चंडीगढ़ में एक और ओड़ीशा में एक है। चालीसवीं आयुध निर्माणी (फैक्टरी) की स्थापना बिहार राज्य के नालंदा में हो रही है।

भारतीय आयुध निर्माणियों के इतिहास में जाएं तो यह अंग्रेजी शासनकाल से जुड़ा हुआ है। इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपने आर्थिक लाभ और अपनी राजनीतिक शक्ति को बढ़ाने के लिए सैन्य सामग्री को महत्त्वपूर्ण हथियार के रूप में स्थापित किया। सन 1775 के दौरान ब्रिटिश प्राधिकारियों ने फोर्ट विलियम-कोलकाता में आयुध निर्माणी की स्थापना की स्वीकृति प्रदान की। यह भारत में थल सेना आयुध के प्रारंभ को रेखांकित करता है। सन 1787 में ईशापुर गन पाउडर फैक्टरी की स्थापना की गई और 1791 से इसका उत्पादन शुरू हुआ। इसके बाद तो आयुध फैक्टरियां लगने का सिलसिला तेज होता गया। 1801 में काशीपुर, कोलकाता में गन कैरिज एजेंसी की स्थापना हुई। 1906 में भारतीय आयुध निर्माणियों को प्रशासन के दायित्व ‘आइजी आयुध निर्माणियों’ के अधीन आ गया। 1933 में निदेशक, आयुध निर्माणियों को प्रभार प्रदान किया गया। 1948 में यह रक्षा मंत्रालय के सीधे अधीन आ गया। 1962 में रक्षा मंत्रालय में रक्षा उत्पादन विभाग की स्थापना की गई। 2 अप्रैल, 1979 से आयुध निर्माणी बोर्ड अस्तित्व में आ गया।

आयुध भंडारों की सुरक्षा इसलिए भी आवश्यक है कि देश भर में सेना के आयुध भंडार आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं। गृह मंत्रालय को पहले से ही इस आशय की गुप्त सूचनाएं हैं कि देश के सभी आयुध भंडार आतंकी संगठनों के निशाने पर हैं। पठानकोट में सेना के एयरबेस पर आतंकियों का हमला बोला सेना के साजो-सामान को नष्ट करने के लिए ही किया गया था। यहां ध्यान देना होगा कि पिछले कुछ वर्षों में आयुध भंडार ही नहीं, बल्कि आश्चर्यजनक रूप से भारतीय नौ सेना की पनडुब्बियां भी हादसे का शिकार हुई हैं। इनमें आइएनएस सिंधुरत्न, आइएनएस सिंधुघोष, आइएनएस ऐरावत और आइएनएस सिंधुरक्षक का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। जब आइएनएस सिंधुरत्न को मुंबई में मरम्मत के बाद नौसेना को सुपुर्द किया गया तो परीक्षण अभियान की कसौटी पर खरा उतरने से पहले ही वह मुंबई के समुद्र तट से करीब 80 किलोमीटर दूर हासदे का शिकार हो गई थी। इसी तरह आइएनएस सिंधुरक्षक अचानक हुए धमाकों के साथ समुद्र में समा गई थी और अठारह नौसैनिक मारे गए।

ऐसे हादसों से देश बुरी तरह प्रभावित होता है। देश की साख को धक्का पहुंचता है और दुनिया में संदेश जाता है कि भारत अपने आयुध भंडारों तक को सुरक्षित रखने में विफल है। भारत को ध्यान देना होगा वह एक परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्र है। वह विश्व के कई देशों को सैन्य उपकरण निर्यात करता है। इस तरह के हादसों से उसकी विश्वसनीयता कमजोर होती है। किसी भी राष्ट्र की सुरक्षा के लिए उसके सैन्य संसाधनों का रखरखाव समुचित तरीके से होना चाहिए। उसकी अनदेखी से न तो देश की सीमाएं सुरक्षित रह सकती हैं और न ही आंतरिक सुरक्षा मजबूत की जा सकती है। जब भी कोई देश सैन्य-संसाधनों की कमी से जूझता है तो वह किसी भी आसन्न संकट को रोकने की क्षमता खो देता है।

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