ताज़ा खबर
 

राजनीति: गवाह की सुरक्षा की दरकार

भारतीय दंड संहिता में भी गवाहों को सुरक्षा मुहैया कराने का प्रावधान है। महज आरोप पत्र दाखिल कर देने से जांच एजंसियों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि गवाहों को सुरक्षा देना भी उनका दायित्व होता है। लेकिन अफसोस! पुलिस और जांच एजंसियां अपनी जिम्मेदारियों का सही तरह से निर्वहन नहीं करतीं और इस वजह से कई खतरनाक और रसूखदार अपराधी गवाहों को डरा-धमका कर अपने पक्ष में कर लेते हैं और ज्यादातर मामलों में बरी हो जाते हैं।

Author December 13, 2018 5:13 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (एक्सप्रेस फाइल फोटो)

जाहिद खान

हाई प्रोफाइल और अति संवेदनशील मामलों में गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार की ओर से तैयार ‘गवाह संरक्षण योजना-2018’ के मसौदे को हाल ही में मंजूरी देते हुए सभी राज्य सरकारों को इस संबंध में संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक इसका पालन करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति एके सीकरी की अध्यक्षता वाले पीठ ने इस मसौदे पर रजामंदी देते हुए कहा कि गवाह अदालत के आंख और कान होते हैं। गवाह और सबूतों के आधार पर ही अदालत इंसाफ करती है, लिहाजा उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है। अदालत का यह कहना वाजिब भी है। ज्यादातर गवाह अपने बयानों से इसलिए मुकर जाते हैं कि सरकार उन्हें पर्याप्त सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाती और आरोपित लोग गवाहों और उनके परिवार वालों को डराने-धमकाने में कामयाब हो जाते हैं। बहरहाल, अदालत ने इस योजना के मसौदे में कुछ जरूरी बदलाव भी किए हैं, जो केंद्र ने राज्यों के परामर्श से तैयार किया था। अदालत के इस निर्देश के बाद यह उम्मीद बंधी है कि हाई प्रोफाइल और अति संवेदनशील मामलों में गवाह और उसके परिवार को सरकार की ओर से पर्याप्त सुरक्षा मिलेगी। अपराधी या रसूखदार लोग गवाहों को डरा-धमका कर मामले से बरी नहीं हो पाएंगे। गवाह संरक्षण कानून के अमल में आ जाने के बाद अपराध तय करने और सजा दिलाने की प्रक्रिया आसान हो जाएगी। गवाह बेखौफ होकर अपराधी के खिलाफ अपनी गवाही दे सकेगा।

शीर्ष अदालत ने यह आदेश आसाराम बापू से जुड़े दुष्कर्म मामले में गवाहों के संरक्षण के लिए दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया था। अदालत ने सुनवाई के दौरान सरकार से जवाब तलब करते हुए कहा था कि देश में गवाहों की सुरक्षा के लिए एक योजना का मसौदा तैयार क्यों नहीं हो सकता, जबकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी कानून में पहले से ही इस बारे में स्पष्ट प्रावधान हैं। अदालत ने यह बात जरूर मानी कि गवाह संरक्षण योजना सभी मामलों में लागू नहीं हो सकती, लेकिन कम से कम संवेदनशील मामलों में तो लागू की जा सकती है। लिहाजा, इसके लिए गृह मंत्रालय एक व्यापक योजना तैयार करे। अदालत के इस सख्त रुख के बाद सरकार ने ‘गवाह संरक्षण योजना’ तैयार की और इसे अदालत में पेश करते हुए विश्वास दिलाया कि इस मसौदे को निश्चित समय में कानून में बदल दिया जाएगा। तब तक अदालत, राज्यों से इस मसौदे का पालन करने के लिए कह सकती है। सरकार के इस हलफनामे के बाद अदालत ने राज्यों को निर्देश देते हुए कहा कि जब तक गवाह संरक्षण योजना के मसौदे को कानून नहीं बनाया जाता, तब तक वे इस मसौदे का पालन करें। नया कानून आने तक गवाह संरक्षण योजना, 2018 संविधान के अनुच्छेद 141 और 142 के तहत कानून रहेगी।

‘नेशनल लीगल सर्विस अथॉरिटी’ (नालसा) और ‘ब्यूरो आॅफ पुलिस रिसर्च एंड डवलपमेंट’ (बीपीआरडी) से विस्तृत चर्चा के बाद सरकार ने ‘गवाह संरक्षण योजना’ को अंतिम रूप दिया है। सही मायने में यदि देखें, तो गवाहों को संरक्षण मुहैया कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर यह पहली गंभीर कोशिश है। मसौदे की भूमिका में कहा गया है कि न्याय की आंख और कान होने वाले गवाह, अपराध करने वालों को न्याय के कठघरे तक लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बहरहाल, इस मसौदे में गवाह की पहचान को सुरक्षित रखने और उसे नई पहचान देने समेत गवाहों के संरक्षण के लिए कई प्रावधान हैं। मसौदे में कई अहम बाते हैं, जो कि गवाह की हिफाजत के लिहाज से बेहद जरूरी हैं। मसलन, अति संवेदनशील आपराधिक मामले में आरोपी के साथ गवाह का आमना-सामना नहीं कराया जाएगा, उसमें भी कुछ विशेष मामलों में सरकार, अहम गवाहों की पहचान को भी बदल सकने में मदद कर सकती है। धमकी को देखते हुए गवाह को तय समय के लिए ही सुरक्षा दी जाएगी और समय-समय पर इस सुरक्षा की समीक्षा भी की जाएगी। कुछ अन्य सुरक्षात्मक उपायों में गवाह के ई-मेल और फोन कॉल की निगरानी, गवाह के घर पर सीसीटीवी कैमरे लगाना और उसकी पहचान को छुपाना शामिल है।

इस योजना में विशेष रूप से अदालत कक्षों को तैयार करने का भी प्रावधान है। इसमें लाइव लिंक, वन वे मिरर, गवाहों और आरोपितों के आने-जाने के रास्तों के बीच स्क्रीन लगाना जैसे उपाय शामिल हैं। अदालत ने सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों से इस संबंध में सभी जिला अदालतों में साल 2019 के आखिर तक विशेष परिसरों के निर्माण का निर्देश दिया है, ताकि संवेदनशील मामलों में गवाहों की सुरक्षा से खिलवाड़ न हो।

देश में हाई प्रोफाइल मामलों में गवाहों को धमकाने और उनकी हत्या के मामले सामने आते रहे हैं। आसाराम बापू मामले की ही यदि बात करें, तो इस मामले में कई प्रमुख गवाहों की संदिग्ध हालत में मौत हो गई या उन पर जानलेवा हमले किए गए। इसी तरह सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और तुलसी प्रजापति फर्जी मुठभेड़ मामले में भी सभी बड़े गवाह पक्षद्रोही हो गए या अपनी गवाही से मुकर गए। इन मामलों के अलावा जेसिका लाल हत्याकांड, गुजरात का बेस्ट बेकरी मामला, मक्का मस्जिद विस्फोट जैसे मामलों में भी गवाह अपने बयान पर आखिर तक कायम नहीं रहे। इसका फायदा अपराधियों को मिला और उनके खिलाफ अदालत में मामले कमजोर पड़ते चले गए। स्वर्ण सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक महत्त्वपूर्ण फैसले में कहा था कि ‘भारतीय कानून के तहत साक्ष्य के आधार पर आपराधिक मामला दर्ज किया जा सकता है। लिहाजा, किसी भी मामले में गवाह बेहद महत्त्वपूर्ण है।’ यही वजह है कि अपराधी और रसूखदार लोग कभी डरा-धमका कर तो कभी प्रलोभन देकर गवाहों को प्रभावित करते हैं। उन्हें अदालत में सही गवाही नहीं देने देते।

कहने को विधि आयोग की चौदहवीं और राष्ट्रीय पुलिस आयोग की चौथी रिपोर्ट में गवाह संरक्षण का जिक्र है। भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों में भी गवाहों को सुरक्षा मुहैया कराने का प्रावधान है। महज आरोपपत्र दाखिल कर देने से जांच एजंसियों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, बल्कि गवाहों को सुरक्षा देना भी उनका दायित्व होता है। लेकिन अफसोस! पुलिस और जांच एजंसियां अपनी जिम्मेदारियों का सही तरह से निर्वहन नहीं करतीं और इस वजह से कई खतरनाक और रसूखदार अपराधी गवाहों को डरा-धमका कर अपने पक्ष में कर लेते हैं और ज्यादातर मामलों में बरी हो जाते हैं। इस तरह के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यही वजह है कि गवाह सुरक्षा के लिए एक अलग कानून बनाने की मांग उठी। अमेरिका, कनाडा समेत कई यूरोपीय देशों में बहुत समय पहले से ही गवाहों को सुरक्षा दी जाती है। आरोपी को यह भी पता नहीं होता कि उसके खिलाफ गवाही देने वाला शख्स कौन है।

न्यायमूर्ति वीएस मलिमथ कमेटी ने तो अपनी रिपोर्ट में सरकार से गवाह सुरक्षा के लिए एक अलग कानून बनाने की सिफारिश की थी, शीर्ष अदालत भी इसके लिए आगे आई। ‘बेस्ट बेकरी’ सहित अनेक चर्चित मामलों में सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से बार-बार गवाह की सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया है। तब जाकर अब सरकार ने इस मामले में पहलकदमी की है और अदालत से वादा किया है कि इस संबंध में वह जल्द ही संसद के अंदर एक पुख्ता कानून लेकर आएगी। इंसाफ की हुकूमत कायम रखने के लिए यह बेहद जरूरी है कि गवाह की हिफाजत के ठोस इंतजाम किए जाएं, ताकि कोई भी अपराधी कानून की गिरफ्त से बच न पाए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App