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कैसे सुधरे पुलिस

पुलिस का काम कानून और व्यवस्था के तंत्र को सुधारना है न कि उसे बिगाड़ना। लेकिन पुलिस के संदिग्ध क्रियाकलापों से न केवल कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है, बल्कि जनता के बीच उसकी छवि भी धूमिल होती है। यह सुनिश्चित करना पुलिस का कर्तव्य है कि समाज में अनावश्यक डर भी पैदा न हो और कानून व्यवस्था भी बनी रहे। कई बार थानों में बलात्कार होने और हिरासत में मौतों के मामले सामने आए हैं।

Author December 28, 2018 3:57 AM
प्रतीकात्मक फोटो, फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

रोहित कौशिक

हाल में पुलिस महानिदेशकों के तीन दिवसीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने पुलिस बल को और अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने की जरूरत पर जोर दिया। पुलिस बल में सुधार की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही है। इस दिशा में कई स्तरों पर काम भी हो रहा है, लेकिन अपेक्षित नतीजे देखने को नहीं मिल रहे। यही कारण है कि एक तरफ आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, तो दूसरी तरफ जनता के बीच पुलिस की छवि भी लगातार खराब होती जा रही है। यह शर्मनाक है कि कई मामलों में पुलिस अमानवीयता की हद पार कर देती है। इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस कब तक अमानवीय बनी रहेगी? यह कटु सत्य है कि एक तरफ हमारे देश की पुलिस पर काम का अत्यधिक बोझ है, तो दूसरी तरफ पुलिस की कार्यप्रणाली आम आदमी को कोई राहत नहीं दे पाती है। इसका सीधा प्रभाव कानून-व्यवस्था पर पड़ता है। इसीलिए समय-समय पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं।

आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि हमारे देश की पुलिस में धर्य और विवेक जैसे मानवीय मूल्यों की भारी कमी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पुलिस अनेक तौर-तरीकों से समाज में बेवजह खौफ पैदा करने की कोशिश करती है। इसी से यह सवाल खड़ा होता है कि पुलिस की भूमिका एक रक्षक की है या फिर भक्षक की? इस माहौल में यह जरूरी हो गया है कि सरकार पुलिस बल को सुधारने की तीव्रता से पहल करे। पुलिस बल में सुधार की प्रक्रिया में जहां एक ओर हमें पुलिस पर काम का बोझ कम करने पर ध्यान देना होगा, वहीं दूसरी ओर पुलिस के व्यवहार को सुधारने पर भी काम करना होगा। तभी पुलिस बल में सुधार का असली उद्देश्य पूर्ण हो पाएगा।

पुलिस का काम कानून और व्यवस्था के तंत्र को सुधारना है न कि उसे बिगाड़ना। लेकिन पुलिस के संदिग्ध क्रियाकलापों से न केवल कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है, बल्कि जनता के बीच उसकी छवि भी धूमिल होती है। यह सुनिश्चित करना पुलिस का कर्तव्य है कि समाज में अनावश्यक डर भी पैदा न हो और कानून-व्यवस्था भी बनी रहे। कई बार थानों में बलात्कार होने और हिरासत में मौतों के मामले सामने आए हैं। यह विडंबना ही है कि कुछ राज्यों में पुलिस मानवाधिकारों की रक्षा तो कर ही नहीं पा रही है, बल्कि एक कदम आगे बढ़ कर जानवरों जैसा बर्ताव कर रही है। समाज के नैतिक मूल्यों को देखने वाली पुलिस को अपने नैतिक मूल्यों पर भी ध्यान देना चाहिए।

अक्सर ऐसी घटनाएं भी प्रकाश में आती रहती हैं कि अति विशिष्ट व्यक्ति के काफिले में गलती से किसी बेगुनाह व्यक्ति के घुस आने पर पुलिस बर्बरता के साथ पिटाई करती है। ऐसे मौकों पर पहले यह जानना जरूरी है कि व्यक्ति गलती से काफिले में घुसा है या जानबूझ कर। संवेदनशील मौकों पर ही पुलिस के असली कौशल की परीक्षा होती है। अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए फुर्ती के साथ सामने वाले की मंशा भांप लेने में ही पुलिस की सफलता और असफलता का पता चलता है। अगर ऐसे समय भी पुलिस अपने विवेक का इस्तेमाल नहीं करेगी तो फिर उसमें और एक आम आदमी में क्या फर्क रह जाएगा? पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति पर जरूर ध्यान देना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम आदमी पर अत्याचार किया जाए।

ऐेसा नहीं है कि पुलिस सराहनीय कार्य नहीं करती। वह अच्छे काम भी करती है, लेकिन पुलिस का अमानवीय चेहरा और व्यवहार उसके अच्छे कामों पर भारी पड़ता है। अपने इसी व्यवहार के कारण ही पुलिस जनता के बीच विश्वसनीय छवि नहीं बनाई पाई है। उत्तर प्रदेश और बिहार में व्यस्त चौराहों पर ट्रक ड्राइवर पुलिस वालों को दस-दस, बीस-बीस रुपए देकर आगे निकल जाते हैं। पुलिस के इन क्रियाकलापों को देख कर समाज में यह धारणा बन गई है कि अपराधी और धनाढ्य लोग पैसे देकर पुलिस को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं। पुलिस द्वारा गरीब और बेबस लोगों की एफआइआर न लिखे जाने की घटनाएं तो अम बात हैं। पुलिस एक आम आदमी से ऐसे बर्ताव करती है जैसे वह कोई आतंकवादी हो। सवाल यह है कि मानवीयता की रक्षा करने वाली पुलिस खुद इतनी अमानवीय कैसे हो जाती है?

दरअसल, पुलिस पर लगातार दबाव बढ़ता जा रहा है। इस दबाव का प्रभाव उसके कार्य पर भी दिखाई दे रहा है। हाल यह है कि पुलिस न तो कानून और व्यवस्था की स्थिति को बेहतर बना पा रही है, न ही जनता की समस्याएं दूर करने में रुचि दिखा रही है। कुछ समय पूर्व मेरठ में नायक फिल्म की तर्ज पर कुछ ऐसा ही दृश्य वास्वविक जीवन में भी दर्शाया गया था। मेरठ के तत्कालीन डीआइजी ने पुलिस पर आरोप लगा रहे एक समाजसेवी को एक दिन के लिए एक चौकी का इंचार्ज बनाने की घोषणा करते हुए कहा था कि वे खुद यह महसूस करें कि पुलिस को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एक दिन का चौकी इंचार्ज बनने के बाद उस समाजसेवी ने महसूस किया था कि पुलिस पर कुछ हद तक तो दबाव है लेकिन कई बार वह टालने वाला रवैया भी अपनाती है।

कुछ समय पहले ह्यूमन राइट वाच ने भारतीय पुलिस से संबंधित विभिन्न विसंगतियों पर एक अध्ययन किया था। यह अध्ययन उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में पुलिस-तंत्र पर किए गए शोध पर आधारित था। इस शोध में बताया गया है कि भारत में पुलिस बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है। पुलिस प्राथमिक रूप से किसी भी समस्या का हल दुर्व्यवहार और समाज में डर बैठा कर करना चाहती है। दुर्व्यवहार पुलिस की संस्थागत समस्या है और सभी सरकारें इस समस्या को दूर करने में नाकाम रही हैं। इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से चार बिंदुओं पर ध्यान देने की बात कही गई थी। ये चार बिंदु हैं- अपराधों के विश्लेषण में पुलिस की असफलता, झूठे आरोप लगा कर गिरफ्तारी, दुर्व्यवहार और यातना देने की आदत और फर्जी मुठभेड़। दरअसल पुलिस की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए अनेक सुधारों की आवश्यकता है। इन सुधारों पर विचार करने के लिए समय-समय पर अनेक समितियों और आयोगों का गठन भी हुआ, लेकिन अभी भी नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही रहा।

दरअसल, अनेक बार सत्ता अपने हित के लिए पुलिस का इस्तेमाल करती है। ऐसी स्थिति में भी पुलिस का रवैया एकपक्षीय हो जाता है और वह न्याय नहीं कर पाती। 1984 के सिख विरोधी दंगों हों या फिर 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद के दंगे हों, या 2002 में हुए गुजरात दंगे और 2008 में ओड़ीशा में होने वाले अल्पसंख्यक विरोधी दंगों रहे हों, सभी में पुलिस की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लग चुका है। इसलिए पुलिस की नकारात्मक भूमिका के लिए अनेक कारक जिम्मेदार हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन इन सब कारकों से अलग जब पुलिस स्वयं ही आगे बढ़ कर अत्याचार करने लगे तो इसे कैसे अमदेखा किया जा सकता है? बहरहाल, पुलिस को अपनी छवि सुधारने के लिए अपने भीतर मानवीय मूल्यों का विकास करना होगा। इस कार्य के लिए एक निश्चित अंतराल पर कार्यशालाएं आयोजित की जा सकती हैं। पुलिस का काम आम आदमी को डराना-धमकाना नहीं है, बल्कि उसके पक्ष में खड़ा होना है। पुलिस बल के सुधार की प्रक्रिया में अनेक स्तरों पर कार्य किए जाने की आवश्यकता है।

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